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CM से भी बड़ा है IPRD का यह अधिकारी, जो सचिव को प्रधान सचिव बना देता है

मुख्यमंत्री के सचिव सुनील कुमार बर्णवाल को प्रधान सचिव के पद पर पदोन्नति नहीं दी गई है, इन्हें केवल मुख्यमंत्री के प्रधानसचिव के कार्य के लिए सिर्फ अधिकृत किया गया है, जो आईपीआरडी के सचिव पद पर रहते हुए सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग का भी कार्य देखेंगे, पर जरा कमाल देखिये, मुख्यमंत्री सचिवालय में कार्य कर रहे एक अधिकारी का जो स्वयं द्वारा संप्रेषित समाचार में सुनील बर्णवाल को मुख्यमंत्री के प्रधान सचिव के रुप में प्रोजेक्ट कर रहा हैं।

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धिक्कार है, ऐसी सोच पर और ऐसी सकारात्मक पत्रकारिता पर

आजकल मुख्यमंत्री रघुवर दास अपनी हर बातों में सकारात्मक पत्रकारिता की बात करते हैं, उनके आगे-पीछे चलनेवाले भारतीय प्रशासनिक सेवा से जुड़े अधिकारियों का दल तथा उनकी बातों में सिर्फ हां में हां मिलानेवाले पत्रकारों की टीम भी सकारात्मक पत्रकारिता की बात आजकल कुछ ज्यादा ही करने लगे है।

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सीएम की फिसली जुबान, सदन में माघ महीने को फागुन बताया

विधानसभा के बजट सत्र का अंतिम दिन, मुख्यमंत्री अपना समापन भाषण दे रहे थे और इसी दरम्यान उन्होंने कह डाला कि आज फाल्गुन शुक्ल पक्ष चतुर्दशी तिथि है, फागुन महीना दस्तक दे चुका हैं, यहीं नहीं वे फागुन की मस्ती में डूबते दीखे।

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राज्यपाल के परेड निरीक्षण समय माइक फेल, मची अफरातफरी, डीसी ने लगाई क्लास

झारखण्ड की राजधानी रांची के मोराबादी मैदान में आयोजित भारतीय गणतंत्र दिवस परेड के दौरान उस वक्त अफरातफरी मच गई, जब सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग के माइक ने काम करना बंद कर दिया। जब माइक काम करना बंद किया, उस वक्त राज्यपाल द्रौपदी मुर्मू परेड का निरीक्षण करने के लिए निकल रही थी। बताया जाता है कि जैसे ही उद्घोषिका ने इस संबंध में माइक द्वारा जानकारी देने की कोशिश की, माइक ने काम करना बंद कर दिया।

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नेतागिरी करनी है, बांस लिया, उसमें तिरंगा बांध दिया, हो गया गणतंत्र दिवस, और क्या?

69 साल का हो गया हमारा गणतंत्र, इन 69 सालों में भारत में काफी बदलाव हुए हैं। हमारे रहन-सहन, खान-पान, सामाजिक परिवेश ही नहीं बल्कि हमारी पूरी जीवन शैली ही बदल गई, जो अंग्रेज 200 सालों में नहीं कर पाये, हमारे नेताओं व भविष्यद्रष्टाओं ने 69 सालों में कर डाला है,  जरा नजर दौड़ाइये…हमने अपना चरित्र खो दिया है। जहां हम रहते थे, वहां आस-पास में एक प्रकार का, एक-दूसरे परिवार से रिश्ता बन जाता था।

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बदल रहे हैं संघ के स्वयंसेवक और प्रचारक, बदल रही हैं उनकी कार्यप्रणाली

एक समय था, जब संघ के स्वयंसेवक और प्रचारकों को देखकर, लोग उन्हें सम्मान देने में लग जाते, पर आज वैसा नहीं हैं। अब माहौल बदला हैं, बदलते माहौल के अनुसार संघ के स्वयंसेवक और प्रचारक भी खुद को बदल चुके हैं। आज का प्रचारक सीएम के साथ बैठकर गुफ्तगू करने में शान समझता है, उसे बड़े-बड़े प्रशासनिक अधिकारियों से मेल-जोल रखने में आनन्द का अनुभव होता है।

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जिस अखबार में प्रमुखता से समाचार छपा, वही कर रहा उक्त समाचार का उल्लंघन

झारखण्ड सरकार ने औद्योगिक और अन्य स्थापनाओं में कार्यरत सभी कर्मचारियों के बैंक खाते में ही वेतन देना अनिवार्य कर दिया है। ऐसा नहीं करने पर छह माह की सजा और पांच सौ रुपये जुर्माना का भी प्रावधान है। राज्य के श्रम नियोजन विभाग ने इसकी अधिसूचना पिछले वर्ष फरवरी माह में जारी कर दी थी, पर राज्य में ऐसे कई संस्थान है, जहां आज भी नकद मासिक भुगतान जारी हैं।

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18 जनवरी 1941 की वो रात जब गोमो स्टेशन पर अंतिम बार नेताजी को देखा गया

18 जनवरी, एक ऐतिहासिक दिन। बहुत कम ही लोग जानते है कि झारखण्ड में गोमो जंक्शन नामक रेलवे स्टेशन पर 18 जनवरी 1941 को, नेताजी सुभाष चंद्र बोस को अंतिम बार देखा गया था। बताया जाता है कि अंतिम दिन दिल्ली जाने के लिए उन्होंने यहीं से गाड़ी पकड़ी थी और उसके बाद फिर उन्हें कहीं नहीं देखा गया।

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प्रेस क्लब, रघुवर दास सरकार का हिस्सा हो गया, लोकतंत्र का छोटा स्तंभ सरकारी हो गया

आज रांची प्रेस क्लब के नवनिर्वाचित पदाधिकारियों व अन्य सदस्यों ने पद एवं गोपनीयता की शपथ ले ली। इनके शपथ ग्रहण के साक्षी बने राज्य के मुख्यमंत्री रघुवर दास तथा वे लोग जिनको रांची प्रेस क्लब तथा सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग के लोगों ने निमंत्रण दिया था। इस कार्यक्रम से राज्य के सभी विपक्षी दलों ने खुद को अलग कर लिया, क्योंकि यह कार्यक्रम रांची प्रेस क्लब का कम और राज्य सरकार द्वारा प्रायोजित ज्यादा लग रहा था।

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का. महेन्द्र सिंह की 13 वीं बरसीं पर, उन्हें श्रद्धांजलि देने को बगोदर में उमड़ा जनसैलाब

बगोदर एक बार फिर इतिहास बना गया, अपने प्रिय नेता को श्रद्धांजलि देने को लेकर। आज बड़ी संख्या में अपने प्रिय नेता कां. महेन्द्र सिंह को श्रद्धांजलि देने के लिए लोग अपने-अपने गांवों से निकल पड़े। ज्ञातव्य है कि कां. महेन्द्र सिंह की हत्या 16 जनवरी 2005 को नक्सलियों द्वारा कर दी गई थी। इस राज्य का दुर्भाग्य है कि जनसंघर्ष के लिए यहां कोई नेता अब महेन्द्र सिंह जैसा नहीं दीखता, जिनके दिलों में आम जनता के लिए संघर्ष करने का दृढ़ निश्चय हो।

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