नेतागिरी करनी है, बांस लिया, उसमें तिरंगा बांध दिया, हो गया गणतंत्र दिवस, और क्या?

69 साल का हो गया हमारा गणतंत्र, इन 69 सालों में भारत में काफी बदलाव हुए हैं। हमारे रहन-सहन, खान-पान, सामाजिक परिवेश ही नहीं बल्कि हमारी पूरी जीवन शैली ही बदल गई, जो अंग्रेज 200 सालों में नहीं कर पाये, हमारे नेताओं व भविष्यद्रष्टाओं ने 69 सालों में कर डाला है,  जरा नजर दौड़ाइये…हमने अपना चरित्र खो दिया है। जहां हम रहते थे, वहां आस-पास में एक प्रकार का, एक-दूसरे परिवार से रिश्ता बन जाता था।

69 साल का हो गया हमारा गणतंत्र, इन 69 सालों में भारत में काफी बदलाव हुए हैं। हमारे रहन-सहन, खान-पान, सामाजिक परिवेश ही नहीं बल्कि हमारी पूरी जीवन शैली ही बदल गई, जो अंग्रेज 200 सालों में नहीं कर पाये, हमारे नेताओं व भविष्यद्रष्टाओं ने 69 सालों में कर डाला है,  जरा नजर दौड़ाइये…

क.    हमने अपना चरित्र खो दिया है।

ख.    हमारे लिए संस्कार और संस्कृति कोई मायने नहीं रखती।

ग.     पहले जहां हम रहते थे, वहां आस-पास में एक प्रकार का, एक-दूसरे परिवार से रिश्ता बन जाता था, हम उन्हें नानी, दादी, चाची, चाचा, मौसा, मौसी तक बना लेते थे, पर अब हम ऐसा नही करते, अब सिर्फ और सिर्फ एक-दूसरे के लिए लड़का-लड़की या लेडिज एंड जेंटलमेन है।

घ.     जो लोग सत्यनिष्ठ है, ईमानदार है, उन्हें हम महामूर्ख और जो धूर्त, बेईमान, अत्याचारी है, उन्हें हम आला दर्जे के विद्वान समझते हैं।

ङ.      अब हमे रोटी-सब्जी, दाल-चावल अच्छी नहीं लगती, अब हमें खाने में मुर्गा-बकरा, बर्जर, पिज्जा अच्छा लगता है, ये अलग बात है कि इन सबके लिए हमारा पेट तैयार हो अथवा न हो।

च.     हमने धोती-कुर्ता को पुरी तरह से त्याग दिया है, और उसके जगह पर फुलपैंट जीन्स तथा शार्ट सर्टस को अपना लिया है और जब किसी को धोती पहना हुआ देखते है, तो उसकी इज्जत लूटने में लग जाते है, उसका पिछुआ खोलने लगते है, जबकि विदेशों में अब धोती पहनने का दौर चल पड़ा हैं।

छ.    हमें अपने मंदिरों में जाने में लज्जा आती है, राम और कृष्ण को हम कपोल-कल्पित मानते है, जबकि विदेशों में राम और कृष्ण की लोग रट लगा रहे हैं।

ज.    सत्य को खोजने के लिए, उसके अन्वेषण के लिए, एक चौपाई – परहित सरिस धरम नहिं भाई, सुनकर एक पादरी, भारत आने का मन बनाता है, और हम अपने धार्मिक ग्रंथों को कचरा मान बैठे हैं।

झ.    स्वतंत्रता आंदोलन के समय, जो हमारे नेता विदेशी कपड़ों की होली जलाते थे, स्वदेशी आंदोलन किया करते थे, स्वदेशी वस्त्रों, सामग्रियों के उपयोग का आह्वान किया करते थे, आज के नेता विदेशी निवेश के लिए दूसरे देशों में जाकर वहीं के निवेशकों के आगे नाक रगड़ते हैं।

ञ.     69 साल पहले चीन की हालत पस्त थी, आज चीन हमें हर प्रकार से घेर रहा हैं और हमारी हिम्मत नहीं कि कुछ कर सकें, और इन्हीं 69 सालों में भारत आर्थिक रुप से आज भी पस्त है।

ट.      कमाल है, आजकल एक नई प्रथा ने जन्म लिया है, एक नेता जो अपने देश के सैनिकों के बारे में भला बुरा कहता है तो एक दल उसे आड़े हाथों लेता है, पर जैसे ही वहीं नेता उस दल में शामिल हो जाता है, जिस दल के नेता ने कभी उसे भला बुरा कहा था, उसके सारे पाप दूर हो जाते हैं।

ठ.      भारत में भ्रष्टाचार कण-कण में व्याप्त है।

ड.      इस देश में नेता का बेटा सिर्फ नेता बनने के लिए पैदा होता है, चाहे वह मुर्ख ही क्यों न हो।

ढ.      इस देश में नेता, आईएएस, आईपीएस के साथ मिलकर नाना प्रकार की योजना बनाता है, और उन योजनाओं में अपने परिवार को शामिल कर उन सारी योजनाओ को अपने हित में क्रियान्वित कर लेता है और जनता को बाबा जी का ठुल्लू थमा देता है।

ण.    आज भी हमारे देश में लोग भूख से मरते हैं, किसान आत्महत्या करते हैं, और यहां का नेता युवाओं को पकौड़ें और चाय का दुकान खोलने के लिए सलाह देता है, और अपने बच्चों के लिए सारी योजनाओं में मची लूट का कमीशन प्राप्त कर, विदेशों में उन पैसों का निवेश करता-कराता है।

त.     जो व्यक्ति ईमानदारी से चल रहा होता है, उसे झूठे केस में फंसाकर उसकी जिंदगी तबाह करने का भी प्लान चलाया जाता है।

थ.     पूर्व में हमारी मां के आंचल होते थे, अब मां के आंचल नहीं होते, क्योंकि इन 69 सालों में आज की मां साड़ी नहीं पहनती तो आंचल कहां से आयेंगे।

द.      अब बच्चे घर में नहीं पढ़ते और बच्चों को बोर्डिंग में डाल दिया जाता है और जब यही बच्चे बड़े होते हैं तो जैसे इन्हें मां-बाप, बचपन में बोर्डिंग में डाल दिये थे, ये अपने माता-पिता को वृद्धाश्रम में डाल देते है, ताकि वे भी आराम से जीवन जी सकें और उन्हें वैवाहिक जीवन में कोई कठिनाई न हो।

ऐसे ही, और कई बदलाव है, जो भारत को बहुत ही आगे ले गये है, आशा ही नहीं बल्कि पूर्ण विश्वास है कि इसी तरह बदलाव चलता रहा, तो जिस आध्यात्मिक शांति तथा आनन्द की खोज के लिए लोग विदेशों से यहां आते हैं, अब यहां के लोग विदेश जाकर अध्यात्म का आनन्द लेंगे, वह दिन दूर भी नहीं, हमें तो दिखाई पड़ रहा। कमाल है, अपने देश में आग लगाकर, दूसरे से अमन व शांति की बात करना, देखना हो तो बस भारत उसका प्रत्यक्ष उदाहरण है।

आज तो कई इलाकों में गणतंत्र दिवस समारोह मनाया गया, जो नेता झंडा फहरा रहा है, उसे खुद पता नहीं कि गणतंत्र के क्या मायने हैं, चूंकि 26 जनवरी है, नेतागिरी करनी है, भाषण देना है, मिठाई खानी है और कपड़े का झंडा, जिसे तिरंगा कहा जाता हैं, बांस में डाल कर फहरा देना है, लीजिये हो गया, गणतंत्र दिवस और क्या?

Krishna Bihari Mishra

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