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धिक्कार ‘जागरण’ और ‘हिन्दुस्तान’ को, अभिनन्दन ‘दैनिक भास्कर’ और ‘प्रभात खबर’ को

सारे देश को पता था कि झारखण्ड के मुख्यमंत्री रघुवर दास ने झारखण्ड विधानसभा में अमर्यादित शब्द का प्रयोग विपक्षी नेताओँ के लिए किया, पर रांची से प्रकाशित दो राष्ट्रीय अखबारों हिन्दुस्तान  और दैनिक जागरण को इसकी जानकारी नहीं थी, पर रांची से ही प्रकाशित दो अखबारों दैनिक भास्कर और प्रभात खबर ने जो झारखण्ड विधानसभा में देखा, उसे जनता के समक्ष परोस दिया, कि आप निर्णय करें कि सहीं क्या हैं? और गलत क्या है?  

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मूड में हैं दैनिक भास्कर, सीएम और कनफूंकवों को दिखा रहा आइना

अपनी-अपनी ताकत हैं, किसी को सत्ता की ताकत, तो किसी को कलम की ताकत। कुछ लोग सीएम की आरती उतारने को ही पत्रकारिता कहते हैं और कोई जनसरोकार से जुड़ी हुई बातों को पत्रकारिता कहते हैं। इन दिनों दैनिक भास्कर मूड में हैं। दैनिक भास्कर लगातार मुख्यमंत्री रघुवर दास और उनकी सरकार को बता रहा हैं कि आप गलत है, आप गलत दिशा में जा रहे हैं।

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जुम्मा चुम्मा दे दे, जुम्मा चुम्मा दे दे चुम्मा, झामुमो नेताओं के सामने हुई चुम्बन प्रतियोगिता

कौन कहता है कि झारखण्ड प्रगति नहीं कर रहा हैं, प्रगति के बारे में झारखण्ड में हर दल, यहां तक की हर नेता का अपना-अपना दृष्टिकोण है। झारखण्ड के अति पिछड़े इलाके पाकुड़ के डुमरिया मैदान में चुम्बन प्रतियोगिता के आयोजन ने उन सारे मिथकों को तोड़ा है कि आदिवासी अब वो आदिवासी नहीं रहे, उनकी सोच बदली है, वे भी अब नये माहौल में जीना चाहते है,

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न रेलयात्रियों को और न ही परीक्षार्थियों को परेशानी, रांची जं. पर RPF-GRP ने संभाली कमान

बहुत दिनों के बाद, रांची जंक्शन पर देखने को मिला कि न तो परीक्षार्थियों को परेशानी हो रही थी और न ही रेलयात्रियों को। आरपीएफ और जीआरपी ने पूरी तरह से कमान संभाल लिया था। परीक्षार्थियों को सेफ जर्नी करने की हिदायत दी जा रही थी, कहीं कोई ऐसी गतिविधियां नहीं दिखी, जिस पर आप अंगूली उठा सकें, चूंकि कल आइआरबी की परीक्षा थी, विभिन्न सुदुरवर्ती इलाकों से लाखों की संख्या में परीक्षार्थी रांची पहुंचे थे।

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रघुवर सरकार का कमाल, ‘बदलता झारखण्ड’ बन गया ‘लुढ़कता झारखण्ड’

जी हां, ये रघुवर सरकार के काम-काज के तीन साल का कमाल है। अपना बदलता झारखण्ड ‘लुढ़कता झारखण्ड’ में बदल गया है। जो सरकार ये कहते नहीं थकती थी कि व्यापार सुगमता सूचकांक में हम तीसरे स्थान पर हैं, आज वह लुढ़क कर 12 वें स्थान पर चल गया हैं, यानी झारखण्ड टॉप टेन में भी नहीं हैं, यानी ‘मोमेंटम झारखण्ड’ और ‘झारखण्ड माइनिंग शो’ के आयोजन के बाद झारखण्ड की यह स्थिति है।

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जिन्हें सुनने के लिए लाखों आते हैं, कल उन्हें सुनने के लिए रिम्स सभागार में मात्र 20-25 थें

जिन्हें सुनने और जिनके संगीत में डूबने के लिए सारी दुनिया लालायित रहती है, उन्हें सुनने के लिए रिम्स सभागार में मात्र 20 से 25 लोग थे, इससे बड़ा दुर्भाग्य और क्या हो सकता है?  झारखण्ड के कला संस्कृति विभाग ने पूरे देश के सामने झारखण्ड का नाम डूबा दिया, जरा सोचिये राज्य के बाहर के लोगों को जब यह समाचार मिलेगा तो वे क्या सोचेंगे?

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तो क्या भारत में रहनेवाले लोग बहुत तेजी से कृतघ्न होते जा रहे हैं?

19 नवम्बर। इसी दिन भारत में दो महान नारियों का जन्म हुआ था। पहली महान वीरांगना झांसी की रानी लक्ष्मीबाई और दूसरी देश की पहली महिला प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी। एक ने अंग्रेजों के दांत खट्टे किये तो दूसरी ने पाकिस्तान को उसकी औकात बताते हुए उसके दो टुकड़े करते हुए एक नये देश बांगलादेश का जन्म कराया। यहीं नहीं भारत को हर क्षेत्र में मजबूत बनाया और अंत में दोनों ने देश के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी।

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रांची प्रेस क्लब के कोर कमेटी में शामिल लोगों को धनबाद के पत्रकारों से सीखना चाहिए

धनबाद के पत्रकारों ने वो कार्य कर दिया, जिसकी परिकल्पना नहीं की जा सकती। जहां राजधानी रांची के पत्रकारों का समूह झकझूमर गाने में व्यस्त है, वहीं धनबाद के पत्रकारों ने मिलकर शानदार तरीके से सारी समस्याओं को दरकिनार कर, लोकतंत्र में विश्वास करते हुए, धनबाद प्रेस क्लब का निष्पक्ष चुनाव कराने का संकल्प लिया और इसे मूर्त देने में लग गये।

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साहित्य अकादमी पुरस्कार वापसी जानबूझकर किया गया नाटक था : अशोक वाजपेयी

वरीय साहित्यकार अशोक वाजपेयी बहुत अच्छा नाटक कर लेते हैं, हम सभी को उनके नाटकों से सीख लेना चाहिए कि कौन सा नाटक कब और कैसे करना चाहिए?  खासकर साहित्यकारों को तो जरुर सीख लेनी चाहिए कि वे नाटकों का कैसे सदुपयोग कर सकें। खुद अशोक वाजपेयी ने रांची में एक अखबार और टाटा कंपनी द्वारा आयोजित झारखण्ड लिटरेरी मीट में स्वीकार किया कि साहित्य अकादमी पुरस्कार वापसी जानबूझकर किया गया नाटक था।

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खबरें प्रभात खबर की, पढ़े दैनिक भास्कर में, सीपी-प्रदीप भिड़े, किया अपशब्दों का प्रयोग

कमाल है, कोई अखबार ये कैसे सोच लेता है कि उसके घर में घटना घटेगी और दूसरों को पता ही नहीं चलेगा। वह यह क्यों सोचता है?  कि इस इंटरनेट युग में समाचारों को कोई पचा लेगा, अच्छा तो ये रहता कि वह इस समाचार को भी उसी प्रकार से प्रमुखता देता और जनता को निर्णय करने का अधिकार देता कि कौन सहीं है और कौन गलत? पर जब अखबार खुद ही न्यायाधीश बन जाये, तो इसमें कौन क्या कर सकता है?

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