Author: Krishna Bihari Mishra

धर्म

भला गोविंदा, कान्हा की मटकी क्यों फोड़ेंगे?

अरे भाई कान्हा कब से मटकी लेकर इठलाने लगे? कि गोविंदाओं को कान्हा की मटकी फोड़ने की जरुरत पड़ गई। क्या गोविंदा और कान्हा, अलग-अलग हैं, सुबह से माथा खराब हो गया हैं मेरा। एक अखबार है, आंदोलनवाला। इसमें गजब की होनहारों की टीम हैं, जो बेसिर-पैर की हेडिंग लगा देती है और जनता कन्फ्यूज्ड।

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अपनी बात

न खाता न बही, जो झारखण्ड के मुख्यमंत्री और उनके कनफूंकवें कहें, वहीं सहीं

झारखण्ड के मुख्यमंत्री रघुवर दास और उनके कनफूंकवों का कमाल, झारखण्ड विज्ञापन नियमावली 2015 की धज्जियां उड़ाते हुए, नियमों के विरुद्ध एक अखबार को स्वीकृत सूची में डालकर उसे विज्ञापन देना प्रारंभ किया, स्वयं के द्वारा बनाई गई नियमावली को भी, स्वयं ही ठेंगा दिखा दिया।

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अपनी बात

कमर भर बाढ़ का पानी फिर भी शान से तिरंगा लहराया भारत-बांगलादेश सीमा पर BSF के जवानों ने

अभिनन्दन करिये, ऐसे वीर जवानों का जो कमर भर बाढ़ के पानी में दिन-रात समय बीता रहे हैं, और ऐसे विपरीत परिस्थितियों में भी राष्ट्रीय पर्व को धूमधाम से मनाने में, वे नहीं चूंके, भाई तिरंगा और भारतीय स्वतंत्रता दिवस का पर्व हैं ही ऐसा। कल विपरीत परिस्थितियों में भारत-बांगलादेश सीमा पर राष्ट्रीय ध्वज फहराया, राष्ट्रीय गीत गाया, स्वतंत्रता दिवस मनाया, बीएसएफ के जवानों ने।

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राजनीति

वो ढोल पीटकर भी कुछ नहीं कर सकें और सुनीता ने वह कर दिखाया, जिसका अंदेशा ही न था

ये तीन उदाहरण बताते है कि जो लोग करना जानते है, वे ढोल नहीं पीटते, वे करके दिखा देते हैं, और जो ढोल पीटते हैं, उनका मकसद सिर्फ ढोल पीटना होता है, करना कुछ नहीं होता है। जरा देखिये एक पत्रकारों का समूह रांची से चला था, राष्ट्रीय ध्वज फहराने, जानते है कहां, कश्मीर के लाल चौक पर, नारा क्या लगा रहा था – जहां हमारा लहू गिरा है, वो कश्मीर हमारा है, पर इनलोगों से पूछिये कि क्या आपलोगों ने कश्मीर के लाल चौक पर राष्ट्रीय ध्वज फहराया।

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अपनी बात

रोक के बावजूद सरसंघचालक मोहन भागवत ने केरल के एक स्कूल में राष्ट्रीय ध्वज फहराया

15  अगस्त 1947 के पूर्व भारत में राष्ट्रीय ध्वज फहराने में कितनी दिक्कतें आती होगी, समझा जा सकता है, पर स्वतंत्र भारत में भी राष्ट्रीय ध्वज फहराने की मनाही हो जाये, यह कितना कष्टकर है, खासकर उस व्यक्ति के लिए, जिसके हृदय में निरन्तर राष्ट्र धड़कता हो। हम बात कर रहे हैं केरल की। जहां से आज अहले सुबह जानकारी मिली कि केरल के एक जिला कलक्टर ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत को एक विद्यालय में राष्ट्रीय ध्वज फहराने से रोक लगा दी है,

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अपनी बात

याद रखें, उनके लिए भारतीय स्वतंत्रता दिवस कम, विज्ञापनोत्सव ज्यादा हैं…

सच पूछिये, तो अपने देश में 15 अगस्त का दिन, स्वतंत्रता दिवस मनाने का दिन न होकर विज्ञापनोत्सव का दिन होता है। बेकार की बातों के बीच, अखबारों और चैनलों में देश को चूहे की तरह कुतर रहे नेताओं-पत्रकारों-अधिकारियों-पुलिसकर्मियों-ठेकेदारों-अभियंताओं-अधिवक्ताओं के आलेख और अनाप-शनाप विज्ञापनों की ठेलम-ठेल इस दिन रहती है।

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अपनी बात

प्रायोजक झारखण्ड सरकार को लताड़, आयोजक प्रभात खबर से प्यार, वाह रे वामपंथी प्रदर्शनकारी

प्रायोजक झारखण्ड सरकार को लताड़ और आयोजक प्रभात खबर से प्यार, ये कैसा प्रदर्शन कर रहे हैं जनाब? प्रदर्शन में भी भेदभाव, अखबार की गैरजिम्मेदाराना हरकतों को छुपाने का प्रयास, शर्म तो आपको भी आना चाहिए। आज राजभवन के समक्ष ज्यां द्रेज के प्रति अनुराग रखनेवाले वामपंथी विचारधारा के लोगों ने प्रदर्शन किया।

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धर्म

श्रीकृष्ण गोविंद हरे मुरारे, हे नाथ नारायण वासुदेव…

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का हमारे जीवन से गहरा जुड़ाव रहा है। मेरे घर में जन्माष्टमी कई वर्षों से बहुत ही धूम-धाम से भी मनाया जाता रहा है, जो आज भी जारी है। मैं बचपन से देखता आ रहा हूँ कि जन्माष्टमी की सुबह अपने घर में लड्डू गोपाल, वंशीधर और अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमाओं को साफ करने का सिलसिला शुरु हो जाता। बड़ी ही खुबसूरती से उन्हें सजाने का काम, वस्त्र पहनाने का काम, तथा सही जगह पर उन्हें स्थापित करने का कार्य प्रारंभ हो जाता।

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अपनी बात

एक समय ज्यां द्रेज के अपमान पर आसमान उठालेनेवाला अखबार, आज उस खबर को ही चेप दिया

आज एक अखबार अपना जन्मदिन मना रहा है, जिसका झारखण्ड में ध्येय वाक्य है – अखबार नहीं आंदोलन और कोडरमा पार करते ही बिहार पहुंचने पर इसका ध्येय वाक्य हो जाता है – बिहार जागे… देश आगे। ये चरित्र है, इस अखबार का। क्या कोई बता सकता है कि भारत का ध्येय वाक्य है – सत्यमेव जयते, यह सत्यमेव जयते, भारत से निकलते ही कहां जाकर बदल जाता है?

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