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लालू जी, अभी राजनीति का समय नहीं, बिहार को बचाने का समय हैं, जनता का दर्द समझिये…

लालू जी अभी राजनीति का नहीं, बिहार को बचाने का समय हैं, बिहार की जनता के दर्द को समझिये, जिन्होंने आपको वोट देकर आज आपको इस लायक बनाया कि आप गरज रहे हैं, वे संकट में हैं, अभी राजनीति नहीं, केवल बाढ़ पीड़ितों के जख्म पर मरहम लगाने का समय हैं, अगर आपने अभी इस दर्द को नहीं समझा तो जान लीजिये 27 अगस्त की रैली में जुटी भीड़ भी, आपको आनेवाले समय में सशक्त नहीं कर पायेंगी

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न खाता न बही, जो झारखण्ड के मुख्यमंत्री और उनके कनफूंकवें कहें, वहीं सहीं

झारखण्ड के मुख्यमंत्री रघुवर दास और उनके कनफूंकवों का कमाल, झारखण्ड विज्ञापन नियमावली 2015 की धज्जियां उड़ाते हुए, नियमों के विरुद्ध एक अखबार को स्वीकृत सूची में डालकर उसे विज्ञापन देना प्रारंभ किया, स्वयं के द्वारा बनाई गई नियमावली को भी, स्वयं ही ठेंगा दिखा दिया।

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कमर भर बाढ़ का पानी फिर भी शान से तिरंगा लहराया भारत-बांगलादेश सीमा पर BSF के जवानों ने

अभिनन्दन करिये, ऐसे वीर जवानों का जो कमर भर बाढ़ के पानी में दिन-रात समय बीता रहे हैं, और ऐसे विपरीत परिस्थितियों में भी राष्ट्रीय पर्व को धूमधाम से मनाने में, वे नहीं चूंके, भाई तिरंगा और भारतीय स्वतंत्रता दिवस का पर्व हैं ही ऐसा। कल विपरीत परिस्थितियों में भारत-बांगलादेश सीमा पर राष्ट्रीय ध्वज फहराया, राष्ट्रीय गीत गाया, स्वतंत्रता दिवस मनाया, बीएसएफ के जवानों ने।

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रोक के बावजूद सरसंघचालक मोहन भागवत ने केरल के एक स्कूल में राष्ट्रीय ध्वज फहराया

15  अगस्त 1947 के पूर्व भारत में राष्ट्रीय ध्वज फहराने में कितनी दिक्कतें आती होगी, समझा जा सकता है, पर स्वतंत्र भारत में भी राष्ट्रीय ध्वज फहराने की मनाही हो जाये, यह कितना कष्टकर है, खासकर उस व्यक्ति के लिए, जिसके हृदय में निरन्तर राष्ट्र धड़कता हो। हम बात कर रहे हैं केरल की। जहां से आज अहले सुबह जानकारी मिली कि केरल के एक जिला कलक्टर ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत को एक विद्यालय में राष्ट्रीय ध्वज फहराने से रोक लगा दी है,

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याद रखें, उनके लिए भारतीय स्वतंत्रता दिवस कम, विज्ञापनोत्सव ज्यादा हैं…

सच पूछिये, तो अपने देश में 15 अगस्त का दिन, स्वतंत्रता दिवस मनाने का दिन न होकर विज्ञापनोत्सव का दिन होता है। बेकार की बातों के बीच, अखबारों और चैनलों में देश को चूहे की तरह कुतर रहे नेताओं-पत्रकारों-अधिकारियों-पुलिसकर्मियों-ठेकेदारों-अभियंताओं-अधिवक्ताओं के आलेख और अनाप-शनाप विज्ञापनों की ठेलम-ठेल इस दिन रहती है।

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प्रायोजक झारखण्ड सरकार को लताड़, आयोजक प्रभात खबर से प्यार, वाह रे वामपंथी प्रदर्शनकारी

प्रायोजक झारखण्ड सरकार को लताड़ और आयोजक प्रभात खबर से प्यार, ये कैसा प्रदर्शन कर रहे हैं जनाब? प्रदर्शन में भी भेदभाव, अखबार की गैरजिम्मेदाराना हरकतों को छुपाने का प्रयास, शर्म तो आपको भी आना चाहिए। आज राजभवन के समक्ष ज्यां द्रेज के प्रति अनुराग रखनेवाले वामपंथी विचारधारा के लोगों ने प्रदर्शन किया।

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एक समय ज्यां द्रेज के अपमान पर आसमान उठालेनेवाला अखबार, आज उस खबर को ही चेप दिया

आज एक अखबार अपना जन्मदिन मना रहा है, जिसका झारखण्ड में ध्येय वाक्य है – अखबार नहीं आंदोलन और कोडरमा पार करते ही बिहार पहुंचने पर इसका ध्येय वाक्य हो जाता है – बिहार जागे… देश आगे। ये चरित्र है, इस अखबार का। क्या कोई बता सकता है कि भारत का ध्येय वाक्य है – सत्यमेव जयते, यह सत्यमेव जयते, भारत से निकलते ही कहां जाकर बदल जाता है?

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क्या सरकार को मालूम है, गांधी ने धर्मांतरण के साथ-साथ ग्राम स्वराज्य पर भी कुछ बयान दिया है?

गांधी ने केवल धर्मांतरण के उपर ही नहीं, और भी बहुत सारी विषयों पर ज्ञान दिया था, क्या जनाबे आली को वे सारे ज्ञान भी याद है, या केवल धर्मांतरण पर ही जाकर उनकी ज्ञान अटक गयी है? यह सवाल जनता इसलिए पूछ रही है,  क्योंकि गत 11 अगस्त को जनाबे आली ने जो अपने सत्ता के गुरुर में रांची से प्रकाशित विभिन्न प्रमुख अखबारों में गांधी का हवाला देते हुए गलत विज्ञापन छपवाया,

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ना मुंह छुपा के जियो और न सर झुका के जियो….

छठी कक्षा में पढ़ रहा छोटा राजू, अपनी बड़ी बहन सविता को पहली बार दुपट्टा को नकाब का शक्ल देकर उससे मुंह छुपाकर निकलते हुए घर से बाहर जाते देखा था, तभी उसने मां से पूछा कि मां आज दीदी दुपट्टा से मुंह ढक कर क्यों निकली? पहले तो मैंने ऐसा उसे करते नहीं देखा था। बड़ी ही सहजता से राजू ने ये सवाल अपनी मां से पूछे थे। मां ने भी बड़ी सरलता से जवाब दिया था कि ये तुम जो सवाल हमसे पूछ रहे हो, इसका जवाब तुम स्वयं अपनी दीदी से क्यों नहीं पूछ लेते?

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