अपनी बात

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प्रभात खबर ने झारखण्ड स्थापना दिवस में जुटी भीड़ से पर्दा उठाया, भीड़ आई नहीं, लाई गई

झारखण्ड स्थापना दिवस के अवसर पर रांची के मोराबादी मैदान में आयोजित विशेष सरकारी कार्यक्रम में आम जनता ने अपनी दूरी पूर्व की तरह बनाये रखा, इस कार्यक्रम में वे ही लोग आये, जो विभिन्न सरकारी योजनाओं का लाभ ले रहे हैं या उससे जुड़े हैं। प्रभात खबर ने इस बात को बहुत ही शानदार ढंग से उठाया है। आप प्रभात खबर के पृष्ठ संख्या 8 को देखें। शीर्षक है – नौ बजते ही हर कदम बढ़ चले थे, मोरहाबादी की ओर।

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CM रघुवर बताएं कि, ये झारखण्ड स्थापना दिवस के नाम पर उत्सव किसके लिए?

इसमें वे लोग भी शामिल होते है, जिनका काम भीड़ को लाना होता हैं, ये काम जिला के वरीय प्रशासनिक अधिकारी, ठेकेदारों से मिलकर कराते हैं, जिसका मुनाफा जिला के वरीय अधिकारी, उन्हें योजनाओं के क्रियान्वयन की जिम्मेदारी देकर पूरा करते हैं, पर आम जनता इन सबसे दूरे अपने गांवों में अपने किस्मत पर रो रही होती है। वह कहती है, कि सोचा था नई सरकार बनाउंगी तो आराम मिलेगा, पर यहां तो आराम दूर, नींद हराम हो गई।

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पं. जवाहरलाल नेहरु को आम जनता की नजरों से ओझल करने की गलत परंपरा की शुरुआत

जो देश अपने महापुरुषों को याद नहीं करता, उनके जन्मदिन अथवा पुण्यतिथि पर उन्हें श्रद्धा सुमन नहीं अर्पित करता, वो कालांतराल में स्वयं नष्ट हो जाता हैं, इसे स्वीकार करना चाहिए। राष्ट्र को अपने महापुरुषों के प्रति कृतज्ञ होना चाहिए। कल तक अपने महापुरुषों को लोग जातीयता में बांटते थे, अब तो हद हो गई, लोग उन्हें अनादर भी करने लगे हैं, उनकी योगदान पर प्रश्नचिह्न लगा रहे हैं,

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दानापुर में बांगलादेशी सैनिकों को भारतीय सेना आंतकवाद से निबटने के लिए दे रही विशेष ट्रेनिंग

चूंकि दोनों राष्ट्र आतंकवाद और विद्रोही गतिविधियों को समान रुप से झेल रहे हैं। दोनों देशों के सिद्धांत और रणनीति आतंकवाद और विद्रोही गतिविधियों के खिलाफ मिलती-जुलती है। इसलिए ये प्रशिक्षण एक दूसरे के लिए भी लाभदायक हैं। इस प्रशिक्षण का मुख्य उद्देश्य बांगलादेश के सैनिकों को विद्रोह और आतंकवाद से निपटने के लिए सक्षम बनाना है। भारतीय सेना अपने अनुभवों और प्रतिकूल परिस्थितियों से निपटने की गतिविधियों को साझा करेंगे।

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अपने ही बच्चों के हत्यारे मत बनिए, नवजात शिशुओं को फेंकिए नहीं, सौंप दीजिए…

14 नवंबर को जब एक और बाल दिवस बीत रहा होगा, हम उल्लास के लम्हों को बांट रहे होंगे, मगर उन आधी-अधूरी सांसों में बसी जिंदगियों को एक बार फिर भूल जाएंगे, जिन्हें पाला जा सकता था, नहीं पाला गया, बचाया जा सकता था, नहीं बचाया गया, जिन्हें दफनाया जा सकता था, नहीं दफनाया गया और अब जिन्हें याद किया जा सकता है, लेकिन उन्हें भुला दिया जाएगा।

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जिन्हें ‘योग’ का एबीसीडी नहीं पता, वे योग करने का दावा और कुछ इस पर फतवे भी दे देते हैं

अगर कोई योग को लेकर फतवा जारी करता है, तो उसकी मूर्खता पर गुस्साइये नहीं, बल्कि हंसना सीखिये, क्योंकि उसे पता ही नहीं कि योग क्या है? और ये भी सच्चाई है कि दुनिया का कोई जीव बिना योग किये नहीं रह सकता, अगर वह ईश्वर को प्राप्त करना चाहता है। ईश्वर को प्राप्त करने के लिए उसे योग करना ही पड़ेगा, योग के शरण में जाना ही पड़ेगा, दुनिया का कोई भी इंसान बिना योग के ईश्वर को प्राप्त किया ही नहीं, ये शाश्वत सत्य है।

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एक साल पूरे होने को आये, रघुवर सरकार बताएं कि 28 एलइडी स्क्रीन कहां-कहां लगे?

12 नवम्बर 2016, सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग का कार्यालय, राज्य के 28 स्थानों पर एलइडी स्क्रीन लगाने के लिए एक वित्तीय निविदा खुल रही है। सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग का एक अधिकारी, सबेरे-सबेरे भगवती की विशेष पूजा-अर्चना करके चला है, कि उसी कंपनी को टेंडर मिले, जिस कंपनी से उसके मधुर संबंध आज-कल में स्थापित हुए हैं। लीजिये वहीं हुआ, भगवती सुन ली। वह प्रसन्न है, माथे पर तिलक लगाकर, गर्व से माथा ऊंचाकर,

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तो क्या प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपनी ही बातों पर स्वयं अमल नहीं करते?

तो क्या प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपनी ही बातों पर स्वयं अमल नहीं करते? उनकी हर बातें दूसरों के लिए होती हैं? अगर ऐसा है तो ये तो गलत परंपरा की शुरुआत हो रही हैं, क्योंकि गंगा की सफाई करनी हो, तो हमें पटना या वाराणसी में ही सिर्फ गंगा को साफ नहीं करना होगा, उसकी सफाई गंगोत्री से भी 18 किलोमीटर दूर गोमुख से इसकी सफाई सुनिश्चित करनी होगी, क्योंकि लोगों ने अपनी हरकतों से गंगा को काफी प्रदुषित कर दिया,

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अरे बाबू, नोटबंदी हो या नसबंदी भुगतना तो हमें ही हैं…

याद करिये बहुत पहले इंदिरा गांधी के शासनकाल मे नसबंदी चला था। जिस पर कई फिल्में भी बनी और उस पर बने गाने भी काफी लोकप्रिय हुए थे, नसबंदी का प्रभाव उस वक्त लोकसभा के चुनाव पर भी पड़ा था, इंदिरा जी की सत्ता चली गई थी। नसबंदी और नोटबंदी में कोई ज्यादा का अंतर नहीं, नसबंदी से जनसंख्या प्रभावित होती है तो नोटबंदी से अर्थव्यवस्था। नसबंदी ने उस वक्त इंदिरा की वो किरकिरी थी कि पूछिये मत,

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ये हैं रांची प्रेस क्लब से जुड़े महान पत्रकार, जिनके पास प्रभात का हाल जानने के लिए समय नहीं

जिनके शरीर में दिल ही नहीं, वे पत्रकारों के हितों की रक्षा की बात करते हुए प्रेस क्लब पर कब्जा जमाने की कोशिश में हैं, हालांकि उनकी यह इच्छा रघुवर सरकार ने पूरी भी कर दी है, क्योंकि रघुवर सरकार ने इन्हीं महापुरुषों को फिलहाल रांची प्रेस क्लब चलाने का जिम्मा दे दिया है। जरा देखिये, तीन दिन पूर्व की घटना हैं, एक पत्रकार जिसका नाम प्रभात कुमार रंजन है, वह अपनी बीमारी की इलाज के लिए गुरुनानक अस्पताल में भर्ती है,

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