आग लगे ऐसी पढ़ाई को, जो अपने घर-गांव-देश, सभ्यता-संस्कृति तथा अपनी जड़ों से ही हमें काट दें
भाई, आज बहुत दिनों के बाद एक गीत ने हमें अंदर से झकझोर दिया, ये झिंझरी गीत है, जो बिहार के गांवों में खेला और गाया जाता है, जरा इसके बोल देखिये, अगर आप इस गीत को सुनकर न थिरके और इसके बोल न गुनगुना उठे, तो फिर कहिये… बोल है – ‘तोहरे अंगनवा बरम बाबा, जुड़वा बनइलीय हो, ए बरम बाबा जुड़वा बनइलीय हो, ए बरम बाबा जुड़वा पर होइयउ असवार, अबोधवा, बालक तोहर गीतियो रे जनइछ हो…’
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