आग लगे ऐसी पढ़ाई को, जो अपने घर-गांव-देश, सभ्यता-संस्कृति तथा अपनी जड़ों से ही हमें काट दें

भाई, आज बहुत दिनों के बाद एक गीत ने हमें अंदर से झकझोर दिया, ये झिंझरी गीत है, जो बिहार के गांवों में खेला और गाया जाता है, जरा इसके बोल देखिये, अगर आप इस गीत को सुनकर न थिरके और इसके बोल न गुनगुना उठे, तो फिर कहिये… बोल है – ‘तोहरे अंगनवा बरम बाबा, जुड़वा बनइलीय हो, ए बरम बाबा जुड़वा बनइलीय हो, ए बरम बाबा जुड़वा पर होइयउ असवार, अबोधवा, बालक तोहर गीतियो रे जनइछ हो…’

भाई, आज बहुत दिनों के बाद एक गीत ने हमें अंदर से झकझोर दिया, ये झिंझरी गीत है, जो बिहार के गांवों में खेला और गाया जाता है, जरा इसके बोल देखिये, अगर आप इस गीत को सुनकर न थिरके और इसके बोल न गुनगुना उठे, तो फिर कहिये… बोल है – तोहरे अंगनवा बरम बाबा, जुड़वा बनइलीय हो, ए बरम बाबा जुड़वा बनइलीय हो, ए बरम बाबा जुड़वा पर होइयउ असवार, अबोधवा, बालक तोहर गीतियो रे जनइछ हो… कुछ बरस पहले लंदन की सड़कों पर बिहार से गये युवाओं की टोलियों को देखा कि वे लंदन के टेम्स नदी के किनारे ये गीत गाये जा रहे थे, उनकी गीतों में इतनी मस्ती थी, वे इतने मस्ती में गा रहे थे कि आज भी यूट्यूब पर पड़े उस गीत को सुनने का बार-बार दिल करता है।

आप माने या न मानें, आप बिहार में रहे या झारखण्ड में, या भारत के किसी भी राज्य में, इस बात को मत भूलिये कि इस देश में अनेक परम्पराएं, अनेक संस्कृतियां, अनेक सभ्यताओं का वास हैं, और यहीं भारत को अन्य देशों से अलग करती है, और जैसे ही आप भारत की इस महान परम्परा, संस्कृति और सभ्यता से खुद को अलग कर देते हैं, आप स्वयं को नष्ट कर डालते हैं, भारत को नष्ट कर डालते हैं, क्योंकि भारत कोई मिट्टी के टुकड़े का नाम नहीं हैं।

मैं देख रहा हूं कि इन दिनों जो भी बच्चे या युवा पढाई कर रहे हैं, वे अपनी जड़ों से कटते चले जा रहे हैं, न तो इस ओर उनके माता-पिता का ध्यान है, न शिक्षण संस्थाओं का और न ही देश व राज्य की सरकारों का, सभी का लक्ष्य पैसा कमाना, भौतिक संसाधनों में खुद को समेट लेना, जीवन पर्यन्त पशुओं की तरह इन्जवाय करना और फिर मर जाना हो गया है, बहुत कम ही लोग हैं, जो जीवन के उद्देश्य को जानते हुए, जीने की कोशिश कर रहे हैं।

हम समाचार संकलन के दौरान कई ऐसे लोगों से मिले, जो जीवन भर पैसे कमाये, और फिर वहीं पैसा उनके जीवन से खेलने लगा और अंत में वे लोगों को ढूंढने लगे, कि कोई उनके पास बैठे, बात करें, उनके साथ समय बिताये, पर फिर दूसरे लोग वहीं करने लगे, जो इन्होंने की थी और फिर इनके साथ भी वहीं घटना, जबकि पहले हमारे घर-परिवार, गांव-मुहल्ले, अपना देश ऐसा नहीं था। जरा सोचिये, पहले हमने अपना घर तोड़ा और फिर गांव-मुहल्ले बांटे और फिर देश को तहस-नहस कर डाला।

हम भूल जाते है कि शुरुआत घर से होती है, अब घर में सोहर नहीं होता, घर में झूमर नहीं होता, घर में कजरी नहीं गाये जाते, लोग होली के गीत भूल चूके हैं, संझा-पराती गायब है, और जो इसे बरकरार रखे हैं, उन्हें ओल्ड जेनरेशन कहकर अपमानित करते नहीं भूलते, और जैसे ही एक समय ऐसा आता है कि उनके द्वारा पाले पोसे गये कान-फाड़ू संगीत, उनकी जीवन लीला को प्रभावित करने लगते हैं तब उन्हें अपने गांव में गाये जानेवाले भजन और गीतों की याद आती है, पर तब तक बहुत देर हो चुका होता है।

किसी भी देश व राज्य सरकार की जिम्मेदारी होती है कि वह अपने देश व राज्य में ऐसी शिक्षा प्रणाली लाये ताकि उस देश व राज्य की परम्परा, सभ्यता-संस्कृति, उसकी जड़ें और मजबूत होती चली जाये, पर इस देश में धर्मनिरपेक्षता के नाम पर जो परम्परा, सभ्यता संस्कृति के साथ खिलवाड़ किया जाने लगा, इसके जड़ें खोदी जाने लगी, उससे इस देश की पहचान को ही खतरा उत्पन्न हो गया।

आज लोक कलाकारों के माध्यम से इन गीतों, परम्पराओं और संस्कृतियों को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया जा रहा है, पर सवाल उठता है कि जिस समाज ने अपने जन्म ले लेकर वृद्धावस्था तक विष ही पीया हो, उसे मरने के समय अगर अमृत भी दिया जाये तो क्या वह उस स्थिति में पहुंचेगा, जब वह युवा था, और अगर ऐसा नहीं हुआ तो फिर अमृत पान का क्या मतलब?

झारखण्ड की तो बात ही निराली हैं, विभिन्न जन-जातीय समुदायों की अलग-अलग परम्पराएं, अलग-अलग गीत, अलग-अलग नृत्य, अलग-अलग भाषाएं, का अगर रसपान करें तो आप आश्चर्यचकित हो जायेंगे, पर यहां भी आधुनिक शिक्षा ने इनकी गीतों, नृत्यों, भाषाओं पर जो सेंध लगाई है, यहां की संस्कृति भी मृत्युशैय्या पर पहुंच चुकी है, और ऐसा करने का श्रेय यहां की सरकार को जाता है, क्योंकि जैसी यहां की शिक्षा नीति होगी, वैसी ही आनेवाले समय में समाज का निर्माण होगा।

जरा पूछिये, लाखों की संख्या में झारखण्ड के विश्वविद्यालयों/महाविद्यालयों/विद्यालयों तथा बिहार के विभिन्न विश्वविद्यालयों/महाविद्यालयों/विद्यालयों में पढ़ रहे छात्र-छात्राओं को, कि क्या उन्हें अपने राज्य की लोककलाओँ-संस्कृतियों का भान हैं, उत्तर होगा – नहीं, क्योंकि इन्हें तो पैसे कमाने की मशीन बनाने का प्रयास किया जा रहा हैं, जबकि पूर्व में हमारे देश में जो भी राजा-महाराजा हुए, उन्होंने अपने शासनकाल में अपने युवाओं को पैसे कमाने की मशीन न बनाकर, उन्हें मनुष्य बनाने पर ज्यादा ध्यान दिया, उन्होंने, उन छात्र-छात्राओं को यह भान कराया कि वे अपने राज्य को कैसे अपने चरित्र और संस्कृति को मजबूत कर, देश को महान बना सकते हैं।

आज क्या है? पूरे देश में जितने भी विश्वविद्यालय/महाविद्यालय/विद्यालय खुल रहे हैं, वहां बच्चों को अपने देश के महापुरुषों/कलाओँ/संस्कृतियों/वेश-भूषा/खान-पान/सभ्यताओं के बारे में नहीं बताया जा रहा हैं, उन्हें सिर्फ ये बताया जा रहा है कि तुम्हें अपने सब्जेक्ट में 100 प्रतिशत नंबर लाना है, फिर डाक्टर-इंजीनियर बनना है, चरित्र भाड़ में जाये, पैसे कमाना है और फिर भारत को छोड़कर, इसकी संस्कृति को लात मारकर अमरीका का ग्रीन कार्ड हासिल करना है, जिंदगी भर ऐश-मौज करना हैं, क्योंकि बाकी के सारे काम फालतू हैं, क्योंकि जिन्हें कोई अच्छी नौकरी नहीं मिलती, वे यहीं सब काम करते हैं।

मैं देख रहा हूं, कि जैसे-जैसे हमारी उम्र बढ़ती जा रही है, प्रत्येक दिन एक नये सूरज को पूरब से उगता देखता हूं और जब वह सूरज पश्चिम में डूब रहा होता है, तो यह ऐहसास कराता है कि भारत भी अब धीरे-धीरे सदा के लिए डूब रहा है, उसके लक्षण भी दिख रहे हैं, क्योंकि किसी को भी देश की चिन्ता, उसकी संस्कृति, उसकी परम्परा, उसके मूल्यों की चिन्ता नहीं है, सभी धन-पशु हैं, नेताओं/अधिकारियों का दल चरित्र खोकर भारत के प्रमुख पदों पर प्रतिष्ठा के साथ कायम हैं और जो सत्य हैं, वह प्रतिदिन इन चरित्रहीनों के हाथों लज्जित हो रहा हैं, अपना सम्मान खो रहा हैं, ऐसे में यह देश कैसे बचेगा?

मेरे पास ऐसे कई प्रमाण है कि जो खुद को कभी काबिल बनते थे, जब वे मृत्यु शैय्या पर होते हैं, तब उन्हें अपनी भूल का ऐहसास होता हैं, पर जब वे युवा थे, तब उन्हें कोई बताने की कोशिश करता था, तब वे उसे जाहिल कहकर लौटा देते थे। उसका उदाहरण देखिये, जहां मैं रहता हूं वहा दो परिवार रहते है, दोनों परिवारों के दो-दो बच्चे हैं, दोनों कॉन्वेन्ट स्कूल में पढ़ते हैं, एक के माता-पिता को सिर्फ चिन्ता इस बात की है कि उनका बच्चा बहुत अच्छा नंबर लाये और लीजिये उनका बच्चा अच्छा नंबर ला भी रहा हैं, जबकि दूसरे परिवार के माता पिता को इस बात की चिन्ता है कि उनका बच्चा भले ही अच्छा नंबर न लाएं, पर इतना जरुर बने कि वह अपने घर, गांव, समाज और देश को जान सकें, वे सुबह उठते ही अपने बच्चों को हर प्रकार से ख्याल रखते हैं, वे अपने बच्चों को अपने दादा-दादी की कहानी, खुद के संघर्ष की कहानी, अपने मुहल्ले में रह रहे अच्छे लोगों की कहानी, देश के वीर-बालक, वीर-बालिकाओं की कहानी, भजन-कीर्तन, तथा जब मुहल्ले में कोई आध्यात्मिक कथा हो रही होती है, तो ये सुनिश्चित करते हैं कि प्रत्येक दिन उनका बच्चा उस कार्यक्रम में शामिल हो तथा लोगों को सहयोग करें और लीजिये उसका फायदा भी उन्हें मिल रहा है, समय बीत रहा हैं, ये इनके दोनों बच्चें मनुष्य बन रहे हैं और उनके बच्चे पैसा छापनेवाली मशीन।

मैं फिर कह रहा हूं, देश की जो स्थिति हैं, यहां कोई नेता चाहे उसे भारत रत्न का खिताब ही क्यों न मिल जाये, सच्चाई यह है कि वह देश से प्यार नहीं करता, जितना प्यार वह अपने आस-पास के चिरकूट लोगों को करता है, और जिसका फायदा वह उन्हें और खुद को पहुंचाता रहता है। हाल ही देश में एक प्रधानमंत्री हुए, जिन्हें हाल ही में भारत रत्न दिया गया। इस प्रधानमंत्री ने खुद के लिए तथा खुद जैसों के लिए तो पुरानी पेंशन की व्यवस्था कर ली और करा दी और बाकी देश के सरकारी और राज्य के कर्मचारियों को नई पेंशन स्कीम में झोंक दिया, यानी खुद जब तक जिंदा रहा, तरमाल खाया, भारत रत्न भी लिया और अंतिम में मरने के बाद कलश यात्रा का भी आनन्द लिया और देश की जनता को क्या मिला और देश को क्या नुकसान पहुंचा? अगर चिन्तन करेंगे तो सब क्लियर हो जायेगा? इसलिए वर्तमान में देश की चिन्ता करिये, इसकी संस्कृति की चिन्ता करिये, इसकी सभ्यता-संस्कृति की चिन्ता करिये, क्योंकि अगर ये बचेगा तभी भारत बचेगा, नहीं तो यहां के नेताओं और अधिकारियों ने भारत को बर्बाद करने की अच्छी व्यवस्था कर दी हैं और कर भी रहे हैं।

Krishna Bihari Mishra

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