जहां किसी विश्वविद्यालय का कुलपति, सेवा विस्तार के लिए नेताओं/सरकार की चिरौरी करें, वहां…

जिस देश व राज्य में विश्वविद्यालयों के कुलपति पद की बोली लगती हो, जहां कुलपति बनने के लिए प्राध्यापकों का दल किसी राजनीतिक दल के नेताओं की चिरौरी करता हो, जहां कुलपति बनने के लिए किसी संगठन से जुड़ा रहना आजकल प्राथमिकता हो गई हो, वहां इस बात की कल्पना करना, कि इन संस्थानों से स्वामी दयानन्द, स्वामी विवेकानन्द, रवीन्द्र नाथ ठाकुर जैसे महापुरुष, लक्ष्मीबाई जैसी वीरांगना, सुभद्रा कुमारी चौहान जैसी कवयित्री तथा मुंशी प्रेमचंद जैसे साहित्यकार निकलेंगे,

जिस देश व राज्य में विश्वविद्यालयों के कुलपति पद की बोली लगती हो, जहां कुलपति बनने के लिए प्राध्यापकों का दल किसी राजनीतिक दल के नेताओं की चिरौरी करता हो, जहां कुलपति बनने के लिए किसी संगठन से जुड़ा रहना आजकल प्राथमिकता हो गई हो, वहां इस बात की कल्पना करना, कि इन संस्थानों से स्वामी दयानन्द, स्वामी विवेकानन्द, रवीन्द्र नाथ ठाकुर जैसे महापुरुष, लक्ष्मीबाई जैसी वीरांगना, सुभद्रा कुमारी चौहान जैसी कवयित्री तथा मुंशी प्रेमचंद जैसे साहित्यकार निकलेंगे, ये सोचना ही स्वयं को मूर्ख घोषित करने के बराबर हैं।

जिस विश्वविद्यालय में पीएचडी कराने के लिए छात्रों से घरों के काम-काज करानेवाले, खाद्य-पदार्थों की लंबी लिस्ट थमानेवाले और अपनी सिर्फ आरती उतारनेवाले प्राध्यापकों का जन्म हो चुका हो, वहां चरित्र और अनुशासन की आकांक्षा रखना भी मूर्खता है। कल की ही बात है एक छात्र से हमारी बात हो रही थी, छात्र ने कहा कि सर, जब चीन कुछ ही वर्षों में अमरीका जैसे देशों को टक्कर दे सकता है, अपने आस-पड़ोस के देशों को आर्थिक पैकेज देकर, एक तरह से अपना गुलाम बना सकता है, हमारे देश की अर्थव्यवस्था को चुनौती दे सकता है, तो हम ऐसा क्यों नहीं कर सकते? उस छात्र की तड़प देखनेलायक थी, वह चाहता था कि वह कुछ करें, पर उसे नहीं मालूम कि उसकी तड़प को मात्र भ्रष्टाचार रुपी एक इंजेक्शन से खत्म करने के लिए, उसके आस-पास ही लोग खड़े थे।

1947 में स्वतंत्रता प्राप्ति के समय, इस देश के पास सबसे बड़ी पूंजी थी – चरित्र की, और स्वतंत्रता मिलते ही हमने चरित्र का परित्याग कर दिया। उदाहरण आपके सामने है स्वतंत्रता के पूर्व, पूर्व भारत में एक ही प्रेसीडेंसी यूनिवर्सिटी थी, जिसने देश को बहुत कुछ दिया और आज केवल अपने ही राज्य में कई यूनिवर्सिटियां है, पर हमारे पास देश को देने के लिए कुछ भी नहीं, उसका मूल कारण है चरित्र का परित्याग। जिस देश का शिक्षक, जिस देश के विश्वविद्यालय का कुलपतिं राजनीति का शिकार हो जाये, उससे देश के सम्मान और सुरक्षा की बात सोचना ही बेमानी है।

जरा पूछिये, देश के वर्तमान विश्वविद्यालयों के कुलपतियों से कि आप बताओ कि गोस्वामी तुलसीदास की कालजयी रचना श्रीरामचरितमानस, महाकवि कालिदास की कई रचनाएं रघुवंशमहाकाव्यम, मेघदूत आदि, पं. जयदेव की गीत-गोविन्द, रवीन्द्र नाथ ठाकुर के सदृश महाकवि जिन्हें नोबेल पुरस्कार परतंत्र भारत में मिला, आपने अपने जमाने में पैदा किये और अगर नहीं किये तो ये विश्वविदयालयों की अट्टालिकाएं और उसमें हो रही शोर किसके लिए?

पूछिये विश्वविद्यालयों के कुलपतियों से कि स्वतंत्रता के बाद आपने विश्व को अपने देश से कौन से छात्र दिये, जिन्होंने पूरे विश्व के समक्ष देश का मान बढ़ाया। याद रखिये, पांच करोड़ के पैकेज या दस करोड़ के पैकेज प्राप्त करनेवाले छात्र भी आप नहीं पैदा कर पा रहे हैं, और सच्चाई यह भी है कि इन पैकेजों से भी देश का कुछ भला नहीं होनेवाला। एक समय लगा था कि नरेन्द्र मोदी के शासनकाल में आने से कुछ बदलाव होगा, पर इनके शासनकाल में भी वहीं दिखा, इनके दल से आनेवाले जिन-जिन लोगों ने राज्यपाल पद संभाला, इन्होंने भी इसमें आमूल-चूल परिवर्तन नहीं किये, बल्कि वे भी उसी धारा में बहें, जिस धारा में पूर्व से लोग चलते आ रहे थे। परिवर्तन के नाम पर हुआ ये कि जो पहले लोग तरमाल खा रहे थे, उनका स्थान नये लोगों ने ले ली। सिर्फ मुखौटा और ब्रांड बदलने मात्र से देश में विकास नहीं होता।

इन विश्वविद्यालयों की स्थिति इतनी खराब है कि सामान्य कोर्स और वोकेशनल कोर्स में पढ़नेवाले छात्रों को डिग्रियां तो मिल जा रही हैं, पर इन डिग्रियों को प्राप्त करनेवाले छात्रों के पास ज्ञान का घोर अभाव हैं, क्योंकि संविदा पर शिक्षा दे रहे, ये शिक्षक खुद भी अज्ञानता के शिकार हैं, ऐसे में शिक्षा की क्या स्थिति होगी और छात्र कितने विद्वान बनेंगे, समझा जा सकता है।

जो संविदा पर शिक्षक तैनात हैं, वे इन छात्रों को क्या शिक्षा देंगे? उन्हें तो हमेशा अपनी नौकरी कैसे बचानी हैं? एक्सटेंशन कैसे लेना हैं? किस नेता को पकड़ना हैं? किस संगठन को पकड़ना हैं? फायदेमंद कौन सी सरकार होगी? इसी पर उसका ध्यान रहता है, ऐसे में बेहतर शिक्षा की परिकल्पना करना संभव नहीं है।

हमने देखा है कि कई बार कुलपतियों की बैठक, राज्यपाल के द्वारा बुलाया जाता है/बुलाई जाती रही है, पर उसका नतीजा ढांक के तीन पांत हैं। सच्चाई यह हैं कि जो धनाढ्य हैं, वे अपने बच्चों को दूसरे देश भेजकर, उच्च शिक्षा दिलवा दे रहे हैं, पर जो गरीब हैं, लाचार हैं, बेबस हैं, उनके पास तो इन विश्वविद्यालयों के अट्टालिकाओं के आगे सर फोड़ने के सिवा कोई विकल्प ही नहीं।

और जिस देश की शिक्षा व्यवस्था ही चौपट हो, जहां का कुलपति ही खुद के एक्सटेंशन के लिए सरकार के आगे नाक रगड़ता हो, और बिना किसी उपलब्धि के, 70 साल के व्यक्ति को राज्य सरकार की कृपा पर कुलपति बना दिया जाता हो, जहां दस महीने से संविदा पर तैनात शिक्षकों को मानदेय के लाले हो, वह देश क्या खाक आगे बढ़ेगा? जहां घंटी आधारित लेक्चरर को रखकर घंटों आधारित काम लिया जाता हो और उसे मानदेय के लिए नाक रगड़वाया जाता हो, और ऐसे-ऐसे कुलपतियों को एक-दो महीनों के लिए नहीं, बल्कि तीन-तीन साल के लिए एक्सटेंशन मिल जाता हो, उस राज्य का या उस देश का भगवान ही मालिक है।

Krishna Bihari Mishra

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