संघ का वह महान स्वयंसेवक, जिन्होंने विवेकानन्द शिला स्मारक से कन्याकुमारी की सुरत बदल दी
मेरे घर में देश के दो महान सपूतों की खुब चर्चा होती है। एक महान आध्यात्मिक संत स्वामी विवेकानन्द तो दूसरा महान क्रांतिकारी सरदार भगत सिंह। एक दिन मेरे बड़े बेटे ने कहा कि पापा जी, चलिए कन्याकुमारी चलते है। हमने भी देऱ नहीं की, और प्रभु से प्रार्थना की, कि कुछ ऐसा संयोग हो, कि हम सपरिवार कन्याकुमारी के लिए निकल पड़े, क्योंकि जब मेरे बड़े बेटे को छुट्टी मिलती हैं तो छोटे बेटे को नहीं, और जब छोटे बेटे को छुट्टी मिलती है तो बड़े बेटे को नहीं।
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