Author: Krishna Bihari Mishra

राजनीति

मैं भी 32, तू भी 32, सब कोई 32 हो जा, ले ले नौकरी झारखण्ड में, राज बेच के सो जा

मैं भी 32, तू भी 32, सब कोई 32 हो जा, ले ले नौकरी झारखण्ड में, राज बेच के सो जा। गजब है रघुवर दास और गजब है उनके द्वारा बनाई गई कमेटी, जिसने प्रस्ताव दिया है कि झारखण्ड में सरकारी नौकरियों में उन्हें ही आरक्षण मिले, जिनके पास 1932 का खतियान हो। अब सवाल उठता है कि आज से 15-16 साल पहले इसी बात को कभी झारखण्ड के प्रथम मुख्यमंत्री बाबू लाल मरांडी कहा करते थे,

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धर्म

भगवान परशुराम का परशु और उनके पद चिह्न देखने के लिए झारखण्ड पधारें

आज भगवान परशुराम जयंती है, पर बहुत कम लोगों को मालूम है कि भगवान परशुराम का संपर्क झारखण्ड से भी हैं। झारखण्ड की राजधानी रांची से करीब 160 किलोमीटर दूर हैं, टांगीनाथ धाम। दरअसल झारखण्ड में परशु यानी फरसे को टांगी कहा जाता है और लोगों का मानना है कि टांगीनाथ धाम में जो टांगी हैं, वह भगवान परशुराम का है और यहां भगवान परशुराम के पदचिह्न भी हैं।

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अपनी बात

भाजपा के परंपरागत वोटों में झामुमो ने सेंध लगाई, ब्राह्मणों ने बड़े पैमाने पर झामुमो को दिया वोट

भाजपा के परंपरागत वोटों में झामुमो ने सेंध लगा दी है। इस बार नगर निकाय के चुनाव में झामुमो ने भाजपा के परंपरागत वोट माने जानेवाले ब्राह्मणों और अन्य सवर्णों के वोटों पर अपना कब्जा जमाने में सफलता प्राप्त कर ली है। झारखण्ड के कई इलाकों में ब्राह्मणों ने इस बार भारी संख्या में झामुमो के पक्ष में मतदान कर भाजपा की नींद उड़ा दी।

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धर्म

अक्षय तृतीया के दिन पोंगा-पंथियों, अखबारों-चैनलों के झूठे विज्ञापनों के चक्कर में फंसे तो गये

फिर आया अक्षय तृतीया, इस बार व्यापारियों के साथ-साथ केन्द्र सरकार ने भी जनता को उल्लू बनाने का काम अपने हाथों में ले लिया है। अक्षय तृतीया को देखते हुए केन्द्र सरकार का एक विज्ञापन आया है, उसमें प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का फोटो है, और उसमें लिखा है कि अक्षय तृतीया के शुभ अवसर पर, समृद्धि का युग शुरु करें। विद्रोही 24.कॉम का मानना है कि सोना खरीदने से समृद्धि नहीं आती है। समृद्धि आती है, संस्कार एवं चरित्र को ग्रहण करने से।

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अपनी बात

नगर निकाय चुनाव में भाजपा को शिकस्त मिलना तय, झामुमो-कांग्रेस की बल्ले-बल्ले

पूरे प्रदेश में आज नगर निकाय का चुनाव शांतिपूर्वक संपन्न हो गया। पहली बार राज्य की मतदाताओं ने राज्य निर्वाचन आयोग की कड़ी आलोचना की तथा अपना आक्रोश व्यक्त किया। यहीं नहीं रांची में तो यहां के उपायुक्त पर विभिन्न मतदान केन्द्र के मतदाताओं ने अपना गुस्सा निकाला। कई मतदान केन्द्रों पर जब मतदाता पहुंचे तो उन्हें पता चला कि उनका मतदान केन्द्र बदला जा चुका है।

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अपनी बात

EC द्वारा मतदाताओं को जागरुक करने के उद्देश्य से चलाये गये अभियान पर पत्रकारों का कब्जा

बहुत सारे पत्रकार, उनके परिवार और इसे पेशे से जुड़े लोग प्रथम मतदाता का सर्टिफिकेट लेकर इतरा रहे हैं, और उसके साथ फोटो खींचाकर फेसबुक पर डाल रहे हैं, शायद वे नहीं जान रहे कि उन्होंने मतदाताओं का हक छीना है। इस बार पहली बार, राज्य निर्वाचन आयोग ने मतदाताओं में जागरुकता लाने के लिए यह सुंदर प्रयास प्रारंभ किया था, ताकि वह आम मतदाता, जो अपने वोट देने के अधिकार को, उसके महत्व को नहीं समझता,

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अपनी बात

अपने जमीर को बेचियेगा और कहियेगा कि हमारा शहर गंदा है, यह ठीक नहीं

आप युवा है न। मतदाता है न। …और जब मतदान का समय आयेगा, या किसी दल के लिए आपको पोलिंग एजेंट बनने की बात आयेगी या उसके प्रचार-प्रसार में उतरने की बात आयेगी, तो आप उक्त दल या प्रत्याशी से खुलकर एक दिन के हिसाब से दो हजार रुपये का डिमांड करेंगे, बिना दो हजार का नोट लिये आप टस से मस नहीं होंगे और चुनाव संपन्न हो जाने के बाद, जब उक्त दल या प्रत्याशी जीत जायेगा

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राजनीति

नगर निकाय चुनाव में आसन्न हार से घबराई भाजपा पूनम ढिल्लो की शरण में

नगर निकाय चुनाव में आसन्न हार से घबराई भाजपा आज सुप्रसिद्ध फिल्म अभिनेत्री पूनम ढिल्लो की शरण में चली गई, और नगर निकाय चुनाव को प्रतिष्ठा से जोड़ दिया। पूनम ढिल्लो के शरण में जाने से यह भी स्पष्ट हो गया कि भाजपा के पास राज्य में कोई ऐसा नेता नहीं है, जो जनता को अपनी ओर आकर्षित कर, उनके आशीर्वाद को वोट में बदल दें।

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अपनी बात

सतुआनी यानी बचपन में “टुइयां” खरीदने और  “नाच बगइचां” जाने की जिद करने का दिन

पटना से 12 किलोमीटर की दूरी पर है – दानापुर कैंट। दानापुर कैंट से करीब तीन से चार किलोमीटर दूर पर है – नासिरीगंज। ऐसे यह नासिरीगंज, दानापुर कैंट और गांधी मैदान पटना मार्ग पर पड़ता हैं। इसी नासिरीगंज इलाके करीब 40 वर्ष पूर्व तक एक बहुत बड़ा खुला खेत हुआ करता था, जिसे लोग “नाच बगइचां” कहा करते थे। ये “नाच बगइचां” कैसे नाम पड़ा? मैं नहीं जानता और न ही किसी बाग-बगइचां को नाचते देखा, पर चूंकि नाम था – “नाच बगइचां”

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अपनी बात

एक ब्राह्मण ने जमशेदपुर साकची में स्थित अम्बेदकर प्रतिमा को अपने हाथों से साफ किया

आम तौर पर विभिन्न दलित तथा विभिन्न तथाकथित स्वयंसेवी संगठनों, पिछड़ों तथा अतिपिछड़ों के नाम पर राजनीति करनेवाले विभिन्न संगठनों और उनके नेताओं की ये धारणा रहती है कि ब्राह्मण वर्ग दलितों को सम्मान नहीं देता अथवा उनके महापुरुषों को सम्मान नहीं करता, पर सच्चाई देखा जाय, तो इस तरह का भेदभाव अब आधुनिक समाज में नहीं देखने को मिलता।

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