अपने जमीर को बेचियेगा और कहियेगा कि हमारा शहर गंदा है, यह ठीक नहीं

आप युवा है न। मतदाता है न। …और जब मतदान का समय आयेगा, या किसी दल के लिए आपको पोलिंग एजेंट बनने की बात आयेगी या उसके प्रचार-प्रसार में उतरने की बात आयेगी, तो आप उक्त दल या प्रत्याशी से खुलकर एक दिन के हिसाब से दो हजार रुपये का डिमांड करेंगे, बिना दो हजार का नोट लिये आप टस से मस नहीं होंगे और चुनाव संपन्न हो जाने के बाद, जब उक्त दल या प्रत्याशी जीत जायेगा

आप युवा है न। मतदाता है न। …और जब मतदान का समय आयेगा, या किसी दल के लिए आपको पोलिंग एजेंट बनने की बात आयेगी या उसके प्रचार-प्रसार में उतरने की बात आयेगी, तो आप उक्त दल या प्रत्याशी से खुलकर एक दिन के हिसाब से दो हजार रुपये का डिमांड करेंगे, बिना दो हजार का नोट लिये आप टस से मस नहीं होंगे और चुनाव संपन्न हो जाने के बाद, जब उक्त दल या प्रत्याशी जीत जायेगा और जीतने के बाद जब वह मनमानी करेगा तो आप चौक-चौराहों पर बैठकर उक्त दल या प्रत्याशी पर अपना गुस्सा उतारेंगे, ये तो बात हजम नहीं हुई।

जब आपके पास समय आया, तब आपने मुर्गा, बकरा और दारु में अपना समय बिताया। रुपये गिनते नजर आये और बाद में वहीं प्रत्याशी आपकी छाती पर मूंग दलता है तो आपको खराब लगता है, ऐसा होना भी नहीं चाहिए, क्योंकि आपने अपने वोट की कीमत लगा दी थी, कीमत आपको मिल गया आपने वोट दे दिया, फिर आपका वार्ड या नगर गंदगी की ढेर पर बैठ जाये, इससे आपको क्या मतलब?

विद्रोही 24. कॉम देख रहा है, चाहे लोकसभा का चुनाव हो या विधानसभा का चुनाव या नगर निकाय का चुनाव, सभी में अब चरित्र गौण हो गया और सभी ने चुनाव को भी व्यवसाय समझ लिया। अखबार वाले या चैनल वाले उसी प्रत्याशी का समाचार छापेंगे या दिखायेंगे जो विज्ञापन देगा और जो विज्ञापन नहीं देगा, वह मुड़ी पटक के मर जाये, उसकी बात न तो अखबार में आयेगी और न चैनल में दीखेगा।

विद्रोही 24. कॉम कल रांची के चुटिया इलाके में देखा कि एक प्रत्याशी प्रचार करने के लिए निकला था, उसके समर्थक उसके साथ थे और उसके आगे-आगे कई चैनलों के कैमरामैन, बूम लेकर उसके आगे-आगे दौड़ रहे थे, जबकि सच्चाई यह है कि वह प्रत्याशी चुनाव मैदान में कहीं दिखाई ही नहीं दे रहा है, वो अपना जमानत भी बचा पायेगा, मुश्किल है। अब सवाल उठता है कि जहां पत्रकारों के हालात ये हो, वे विज्ञापन प्राप्त करने के लिए अपने जमीर से समझौता कर लेते हो, वहां के नगर निकाय के चुनाव हो या न हो, क्या फर्क पड़ता है?

रांची नगर निकाय चुनाव में ही एक ऐसा वार्ड है, जहां एक महिला प्रत्याशी को विद्रोही 24.कॉम ने चुनाव प्रचार करते नहीं देखा, न वह महिला अपने घर से निकली, न किसी मतदाता के घर पर वोट मांगने गई, पर सच्चाई यह  है कि उसे जीताने के लिए अच्छे-अच्छे महारथी लगे है, और उसकी जीत की संभावना भी प्रबल है। अब सवाल उठता है कि जो प्रत्याशी चुनाव के दौरान मतदाताओं से नहीं मिला है, वह जीत भी जायेगी तो इसकी क्या गारंटी की वह मतदाताओं के कार्यों को कराने में सफल रहेगी।

जिस देश का युवा मुर्गा-बकरा और दारु में ही अपना भविष्य सुरक्षित समझ रहा हो, वहां चुनाव तो बेइमानी है। विद्रोही 24.कॉम, ये नहीं कहता कि रांची के सारे युवा या सारे मतदाता ऐसे ही हैं, पर सच्चाई यह भी है कि पूरा रांची ऐसे लोगों के गिरफ्त में दिखाई पड़ रहा हैं, और ज्यादातर अच्छे लोग ऐसे में घर में बैठकर ही अपने काम को इतिश्री समझ लेते है, और वोट देने नहीं जाते, इसलिए अगर आप चाहते है कि आपका नगर निगम, आपकी नगरपालिका स्वच्छ और सुंदर दीखे तो मुर्गा, बकरा और दारु से उपर उठिये, चरित्रवानों को वोट करिये और अपने नगर ही नहीं, बल्कि पूरे देश को एक संदेश दीजिये, हम हैं झारखण्डी, जो वोट करते हैं तो अच्छे को चुनते है, हमें कोई दल या कोई प्रत्याशी खरीद नहीं सकता, क्योंकि हमारे अंदर जमीर अभी भी जिंदा हैं। याद रखिये, कल ही मतदान है, ये मौका हाथ से जाने मत दीजिये।

Krishna Bihari Mishra

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