अक्षय तृतीया के दिन पोंगा-पंथियों, अखबारों-चैनलों के झूठे विज्ञापनों के चक्कर में फंसे तो गये

फिर आया अक्षय तृतीया, इस बार व्यापारियों के साथ-साथ केन्द्र सरकार ने भी जनता को उल्लू बनाने का काम अपने हाथों में ले लिया है। अक्षय तृतीया को देखते हुए केन्द्र सरकार का एक विज्ञापन आया है, उसमें प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का फोटो है, और उसमें लिखा है कि अक्षय तृतीया के शुभ अवसर पर, समृद्धि का युग शुरु करें। विद्रोही 24.कॉम का मानना है कि सोना खरीदने से समृद्धि नहीं आती है। समृद्धि आती है, संस्कार एवं चरित्र को ग्रहण करने से।

फिर आया अक्षय तृतीया, इस बार व्यापारियों के साथ-साथ केन्द्र सरकार ने भी जनता को उल्लू बनाने का काम अपने हाथों में ले लिया है। अक्षय तृतीया को देखते हुए केन्द्र सरकार का एक विज्ञापन आया है, उसमें प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का फोटो है, और उसमें लिखा है कि अक्षय तृतीया के शुभ अवसर पर, समृद्धि का युग शुरु करें।

विद्रोही 24.कॉम का मानना है कि सोना खरीदने से समृद्धि नहीं आती है। समृद्धि आती है, संस्कार एवं चरित्र को ग्रहण करने से। जहां संस्कार एवं चरित्र है, वहां समृद्धि स्वतः अपना पांव पसारती हैं, वहां लक्ष्मी स्वतः विराजमान हो जाती हैं। इसी से संबंधित एक बहुत पुरानी लोककथा है, जिसे लोगों ने विस्मृत कर दिया है, पर आज में, उसे आपको सुनाना चाहता हूं। जरा ध्यान लगाकर सुनिये।

एक शहर में एक बहुत बड़ा व्यापारी था। उसका परिवार बहुत बड़ा था। घर में उसकी पत्नी के अलावा, उसके दो बेटे, दो बहुएं, तीन बेटियां, नाती-पोते भरे पड़े थे। घर में अद्भुत शांति थी। व्यापारी अपनी बड़ी बहु को बहुत आदर देता, क्योंकि उसकी बड़ी बहु जब से आई थी, उसका व्यापार और परिवार दिन-दुनी, रात चौगुनी बढ़ता चला जा रहा था। उसकी बड़ी बहु सुसंस्कृत और भगवान की परम भक्त थी, तथा अपने परिवार की सेवा में ही उसे बहुत बड़ा आनन्द प्राप्त होता था।

व्यापारी की एक विशेष आदत थी कि वह जब भी कोई बड़ा या नया काम प्रारंभ करता, तो अपनी बड़ी बहु से राय-विचार जरुर लेता, और इस प्रकार उसका दिन बहुत ही खुशियों और आनन्द से गुजर रहा होता। एक दिन जब वह अपने कमरे में सोने गया, तभी उसे जल्दी नींद आ गई। सपने में देखा कि मां लक्ष्मी उसके घर आई है। मां लक्ष्मी ने व्यापारी से कहा – सेठ, मैं तुम्हारे घर में बहुत दिनों से विराजमान थी, अब हमें तुम्हारे घर से जाने का वक्त आ गया है, जाते-जाते मैं तुम्हें एक वरदान देना चाहती हूं, बोलो तुम्हे क्या चाहिए?

तभी व्यापारी ने कहा कि माता अगर आप प्रसन्न हैं तो मुझे पहले आप थोड़ा समय दें कि, मैं इस संबंध में अपनी बड़ी बहु से बात कर लूं, जैसा बहु कहेगी, मैं आपसे वह वरदान मांग लूंगा। लक्ष्मी ने कहा – ठीक है और यह कहकर अंतर्ध्यान हो गई। इधर व्यापारी का नींद टूटा। उसने अपनी बहु से सपने की बात बताई। बहु ने कहा – पिताजी आप मां लक्ष्मी को कह दीजिये कि वे मेरे घर से शौक से जाये, ऐसे भी वह एक जगह स्थिर रह नहीं सकती, भला उन्हें कौन रोक सकता है, और अगर वरदान देना चाहती है तो सिर्फ यह वरदान दें कि अपने घर में सर्वदा सुमति का वास हो।

दूसरे दिन जैसे ही व्यापारी सोने गया, लक्ष्मी सपने में आ गई। व्यापारी ने कहा कि – मां, मेरी बहु ने आपसे कुछ नहीं मांगा और न रोकना ही चाही, वह सिर्फ इतना ही कहीं कि, पिताजी मां से कहियेगा कि अपने घर में सुमति का वास हो। लक्ष्मी मुस्कुरा दी और कहीं – तुम्हारी बहु बहुत चतुर है, वह ऐसी चीज मांग ली है, कि जहां यह चीज होती है, वहां से मैं कभी जा ही नहीं सकती, इसलिए सेठ तुम्हारी बहु ने हमें तुम्हारे घर से जाने से, सदा के लिए प्रतिबंध लगा दिया, अब मैं तुम्हारे घर पर सर्वदा के लिए वास करुंगी, क्योंकि जहां सुमति हैं, वहीं सम्पत्ति हैं, वहीं धन है, वहीं लक्ष्मी हैं, जो कभी क्षय नहीं होती।

शायद यहीं कारण रहा है कि अपने श्रीरामचरितमानस में गोस्वामी तुलसीदास जी ने लिखा – जहां सुमति तहं संपति नाना। जहां कुमति तहं बिपति निदाना।। अर्थात्, जहां सुबुद्धि है, वहां नाना प्रकार की संपदाएं रहती है और जहां कुबुद्धि है, वहां परिणाम में विपत्ति रहती है।

दुनिया की जितनी भी संपत्ति है, सभी क्षय होनेवाली है। अक्षय सिर्फ परब्रह्म है। जिन्हें आप विभिन्न नामों से जानते हैं। क्या सोने के चक्कर में पड़े हैं? क्या व्यापारियों, अखबारों और चैनलों के चक्कर में पड़े हैं? क्या पंडे-पुजारियों की थोथे-दलीलों में पड़े हैं? सोना-चांदी, हीरे-पन्ने, मोती-जवाहरात, धन-दौलत, विलासिता संबंधी आवश्यकताएं कभी सुख नहीं दे सकते। आप आज इसे खरीदेंगे, दूसरे लालची लोग इस पर कब्जा जमा लेंगे, पर जैसे ही आप ईश्वर की सर्वोच्च सत्ता को स्वीकार करेंगे, आप ऐसा आनन्द को प्राप्त करेंगे, जिसकी कल्पना आप नहीं कर सकते।

अक्षय तृतीया, सोना-चांदी खरीदने का दिन नहीं हैं। यह बताने का दिन है कि आप स्वयं को जाने, और जो अक्षय है, उसे प्राप्त करे। अक्षय सिर्फ भगवत्कृपा है। अक्षय, आपके माता-पिता का आशीर्वाद है। कहां आप आरामदायक और विलासिता संबंधी आवश्यकताओं के चक्कर में पड़कर बड़े-बड़े धन्ना सेठों, अखबारों और चैनलों के आगे अपना सुख-चैन गवां रहे है। हर कोई अक्षय तृतीया के महत्व को समझ नहीं सकता, विरले लोग समझते है और जो समझ लेते है, वे अपने जीवन को धन्य कर लेते हैं, और जो मूर्ख होते है, वे अपने घर में एकत्रित धन को धन्नासेठों तक पहुंचाकर, अपना सुख चैन सदा के लिए गवां देते हैं।

Krishna Bihari Mishra

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