रांची के खादी मेले ने रांचीवासियों के दिलों में जगह बनायी, ग्रामोद्योग पर बढ़ा विश्वास

रांची का खादी मेला किसी भी पहचान का मोहताज नहीं। रांचीवासियों को इस मेला का बहुत ही बेसब्री से इंतजार रहता हैं, क्योंकि यह मेला उनके जीवन को बहुत हद तक प्रभावित करता हैं। स्थिति ऐसी है कि अगर जरुरत के सामान की आवश्यकता पड़ जाये तो लोग यहीं अब कहने लगे है कि अभी कहीं जाकर बाजार से यह सामान लेने की जरुरत नहीं, जब दिसम्बर-जनवरी में खादी मेला लगेगा तो वहीं से ले लेंगे।

रांची का खादी मेला किसी भी पहचान का मोहताज नहीं। रांचीवासियों को इस मेला का बहुत ही बेसब्री से इंतजार रहता हैं, क्योंकि यह मेला उनके जीवन को बहुत हद तक प्रभावित करता हैं। स्थिति ऐसी है कि अगर जरुरत के सामान की आवश्यकता पड़ जाये तो लोग यहीं अब कहने लगे है कि अभी कहीं जाकर बाजार से यह सामान लेने की जरुरत नहीं, जब दिसम्बर-जनवरी में खादी मेला लगेगा तो वहीं से ले लेंगे, यानी खादी मेले में लगनेवाले स्टॉल, आनेवाले विक्रेताओं के बीच यहां के क्रेताओं का इस प्रकार संबंध हो गया है कि इसकी जितनी प्रशंसा की जाय कम हैं, शायद यहीं कारण भी रहा है कि खादी मेले में जो कारोबार होता है, वह कारोबार करोड़ों में चला जाता हैं।

खादी मेले में लगनेवाले विभिन्न सरकारी विभागों के स्टॉल और वहां आसानी से मिलती जानकारी भी लोगों को अपनी ओर आकर्षित करता है, पर सबसे ज्यादा आकर्षण है, इस मेले में महिलाओं-युवतियों और लड़कियों का वर्चस्व। पूरे मेले का एक चक्कर काटें तो आपको पता चलेगा कि इस मेले में 70 प्रतिशत लड़कियों का वर्चस्व रहता है। यहां मिलती सुरक्षा तथा तनाव मुक्त परिवेश यहां के परिवारों को अपनी ओर आकर्षित करता है। लोग बताते है कि यह पहला और आखिरी मेला है, जहां अपने परिवार के साथ आने में कोई कठिनाई नहीं, और इसका अगर श्रेय किसी को जाता है, तो वह हैं खादी मेला के प्रायोजक को। लोग यह भी कहते है कि हालांकि यह मेला काफी वर्षों से लगता रहा है पर पिछले तीन – चार सालों में इसकी गुणवत्ता में और बढ़ोत्तरी हुई है। इससे इनकार भी नही किया जा सकता।

गाजियाबाद के सोहैल बताते है कि मेला में भीड़ तो दिखाई पड़ रही हैं, पर सामान खरीदनेवालों की तादाद उतनी नहीं दिखाई पड़ती, बिक्री भी उस प्रकार नहीं है, जितनी की आशा लेकर गाजियाबाद से चले थे। विभिन्न प्रकार की चीनी-मिट्टी की बनी प्रतिमाओं और अन्यान्य वस्तूओं को बेच रहा बबलू यहां हो रहे व्यवसाय से संतुष्ट हैं। गुजरात के राजकोट से आये किचन सेट का स्टॉल लगाये सुनील राजपूत अपने स्टॉल पर लगी भीड़ से प्रसन्न है, उसका कहना है कि उसके लिए बिक्री उतनी महत्वपूर्ण नहीं, जितना महत्वपूर्ण की लोगों द्वारा उसके सामग्रियों पर रुचि रखना है, जब लोगों की रुचि जग जायेगी तब सामग्रियां स्वयं बिकेगी।

भदोही से आये मैट सेलर एजाज थोड़े मायूस है, मायूसी का कारण बिक्री का नहीं होना है, पर वे खादी मेला में अपने लगाये स्टॉल और खादी मेला के प्रायोजकों से बहुत ही प्रसन्न दीखे, वे साफ बोलते है कि खादी मेला के अध्यक्ष संजय सेठ जी का जवाब नहीं, वे मानवीय मूल्यों से ओतप्रोत हैं। वे कहते है कि पिछले कई वर्षों से वे रांची के खादी मेले में आकर कारोबार करते रहे हैं, पर जब से संजय सेठ जी ने इसे संभाला है, तारीफ करनी होगी, व्यवस्था बहुत अच्छी है, सारे काम कायदे से हो रहे हैं, कारोबार करने आये लोगों को सहूलियत मिल रही हैं और रांची से उन जैसे लोगों का संबंध भी बेहतर हो रहा हैं।

शताक्षी ग्रामोद्योग प्रतापगढ़ से जुड़े सर्वेश मिश्र ने बताया कि वे इस मेले से बहुत ही खुश है, क्योंकि इसमें वे अपनी वस्तुओं को जनता के बीच रखने में कामयाब रहे हैं, ऐसे आयोजनों से सचमुच ग्रामोद्योग को बहुत लाभ है।

झारखण्ड राज्य खादी ग्रामोद्योग बोर्ड के अध्यक्ष संजय सेठ का कहना है कि मेले में आये विक्रेता और रांचीवासियों का संबंध बेहतर हो, यह उनकी पहली प्राथमिकता हैं, इस मेले में चूंकि महिलाओं की संख्या बहुत ही अधिक है, उसका मूल कारण यहां जो भी वस्तुएं खरीदी या बेची जा रही हैं, वह घरेलू उपयोग से संबंधित हैं, ऐसे में महिलाओं का वर्चस्व ज्यादा होना स्वाभाविक है, महिलाएं पूरे परिवार के साथ आ रही हैं और खादी मेले का आनन्द ले रही हैं, यहीं उनके लिए बहुत ही बड़ी बात हैं, वे चाहेंगे कि बड़ी संख्या में लोग आये और इस खादी मेले का अपने मनमुताबिक आनन्द लें ताकि यह आयोजन अपने मकसद में कामयाब हो।

खादी मेला घूमने आये सांसद राम टहल चौधरी भी इस मेले के आयोजनकर्ताओं और मेले में आये आगंतुकों से प्रसन्न है, वे मानते हैं कि जब तक एक स्थान प्राप्त नहीं होगा, क्रेता और विक्रेता के बीच मधुर संबंध स्थापित नहीं होंगे, पिछले कई वर्षों से यह खादी मेला चला आ रहा है, जो बताता है कि खादी मेला अपने मकसद में कामयाब हो रहा है।

समाजसेवी राजा राम महतो भी वे इस खादी मेले के मुरीद हैं, वे कहते है कि एक बेहतर माहौल ही, बेहतर आर्थिक परिस्थितियों को जन्म देता है, सचमुच खादी मेले ने लोगों के बीच इस प्रकार का विश्वास और माहौल पैदा किया कि अब तो यह स्थिति हो गई है कि लोगों के आने से खादी मेला ही छोटा लगने लगा हैं।

Krishna Bihari Mishra

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