अपनी बात

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अपने ही बच्चों के हत्यारे मत बनिए, नवजात शिशुओं को फेंकिए नहीं, सौंप दीजिए…

14 नवंबर को जब एक और बाल दिवस बीत रहा होगा, हम उल्लास के लम्हों को बांट रहे होंगे, मगर उन आधी-अधूरी सांसों में बसी जिंदगियों को एक बार फिर भूल जाएंगे, जिन्हें पाला जा सकता था, नहीं पाला गया, बचाया जा सकता था, नहीं बचाया गया, जिन्हें दफनाया जा सकता था, नहीं दफनाया गया और अब जिन्हें याद किया जा सकता है, लेकिन उन्हें भुला दिया जाएगा।

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जिन्हें ‘योग’ का एबीसीडी नहीं पता, वे योग करने का दावा और कुछ इस पर फतवे भी दे देते हैं

अगर कोई योग को लेकर फतवा जारी करता है, तो उसकी मूर्खता पर गुस्साइये नहीं, बल्कि हंसना सीखिये, क्योंकि उसे पता ही नहीं कि योग क्या है? और ये भी सच्चाई है कि दुनिया का कोई जीव बिना योग किये नहीं रह सकता, अगर वह ईश्वर को प्राप्त करना चाहता है। ईश्वर को प्राप्त करने के लिए उसे योग करना ही पड़ेगा, योग के शरण में जाना ही पड़ेगा, दुनिया का कोई भी इंसान बिना योग के ईश्वर को प्राप्त किया ही नहीं, ये शाश्वत सत्य है।

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एक साल पूरे होने को आये, रघुवर सरकार बताएं कि 28 एलइडी स्क्रीन कहां-कहां लगे?

12 नवम्बर 2016, सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग का कार्यालय, राज्य के 28 स्थानों पर एलइडी स्क्रीन लगाने के लिए एक वित्तीय निविदा खुल रही है। सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग का एक अधिकारी, सबेरे-सबेरे भगवती की विशेष पूजा-अर्चना करके चला है, कि उसी कंपनी को टेंडर मिले, जिस कंपनी से उसके मधुर संबंध आज-कल में स्थापित हुए हैं। लीजिये वहीं हुआ, भगवती सुन ली। वह प्रसन्न है, माथे पर तिलक लगाकर, गर्व से माथा ऊंचाकर,

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तो क्या प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपनी ही बातों पर स्वयं अमल नहीं करते?

तो क्या प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपनी ही बातों पर स्वयं अमल नहीं करते? उनकी हर बातें दूसरों के लिए होती हैं? अगर ऐसा है तो ये तो गलत परंपरा की शुरुआत हो रही हैं, क्योंकि गंगा की सफाई करनी हो, तो हमें पटना या वाराणसी में ही सिर्फ गंगा को साफ नहीं करना होगा, उसकी सफाई गंगोत्री से भी 18 किलोमीटर दूर गोमुख से इसकी सफाई सुनिश्चित करनी होगी, क्योंकि लोगों ने अपनी हरकतों से गंगा को काफी प्रदुषित कर दिया,

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अरे बाबू, नोटबंदी हो या नसबंदी भुगतना तो हमें ही हैं…

याद करिये बहुत पहले इंदिरा गांधी के शासनकाल मे नसबंदी चला था। जिस पर कई फिल्में भी बनी और उस पर बने गाने भी काफी लोकप्रिय हुए थे, नसबंदी का प्रभाव उस वक्त लोकसभा के चुनाव पर भी पड़ा था, इंदिरा जी की सत्ता चली गई थी। नसबंदी और नोटबंदी में कोई ज्यादा का अंतर नहीं, नसबंदी से जनसंख्या प्रभावित होती है तो नोटबंदी से अर्थव्यवस्था। नसबंदी ने उस वक्त इंदिरा की वो किरकिरी थी कि पूछिये मत,

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ये हैं रांची प्रेस क्लब से जुड़े महान पत्रकार, जिनके पास प्रभात का हाल जानने के लिए समय नहीं

जिनके शरीर में दिल ही नहीं, वे पत्रकारों के हितों की रक्षा की बात करते हुए प्रेस क्लब पर कब्जा जमाने की कोशिश में हैं, हालांकि उनकी यह इच्छा रघुवर सरकार ने पूरी भी कर दी है, क्योंकि रघुवर सरकार ने इन्हीं महापुरुषों को फिलहाल रांची प्रेस क्लब चलाने का जिम्मा दे दिया है। जरा देखिये, तीन दिन पूर्व की घटना हैं, एक पत्रकार जिसका नाम प्रभात कुमार रंजन है, वह अपनी बीमारी की इलाज के लिए गुरुनानक अस्पताल में भर्ती है,

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रांची के पत्रकारों का जवाब नहीं, दिल तो सिर्फ और सिर्फ इन्हीं के पास हैं और कहीं नहीं…

आज रांची के पत्रकारों ने वह किया है, जो अब तक देखने को नहीं मिला, बहुत ही कम समय में सबने अपने-अपने स्तर से प्रयास किये और 9000 रुपये जमा कर लिये। यहीं नहीं आज गिरिजा शंकर ओझा, ब्रजेश राय और सुरेन्द्र सोरेन तथा कई गण्यमान्य पत्रकारों ने गुरुनानक अस्पताल जाकर बीमारी का इलाज करा रहे प्रभात कुमार रंजन से भेंट कर उसका कुशलक्षेम पुछा और आर्थिक मदद पहुंचाई।

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एक ने पूछा – Is it journalism? मैंने कहा – Yes, It is journalism.

झारखण्ड के कभी किसी भाजपाई मुख्यमंत्री के राजनीतिक सलाहकार रह चुके तथा फिलहाल एक एनजीओ के माध्यम से अपने कार्य को आगे बढ़ा रहे अति सम्मानित व्यक्ति ने मेरे फेसबुक पर दिये गये एक पोस्ट पर पुछ दिया कि क्या जो मैं लिख रहा हूं, वह पत्रकारिता है? तो हमें लगा कि इसका जवाब देना चाहिए, पर जवाब चूंकि अतिलघुत्तरीय हो नहीं सकता, विस्तृत उसका जवाब है, तो मैंने सोचा कि इसका जवाब विस्तार से देना चाहिए,

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न पोथी-पतरा, मिल गया दो ठो नेता, बेटी की करा दी शादी, हो गई क्रांतिकारी शादी, गोलू याद रखना

कन्हैया भेलारी बहुत भारी भरकम पत्रकार है, उन्होंने कल फेसबुक पर एक पोस्ट डाला, जिसमें दो राजनीतिज्ञ जो बिहार के नमूने भर हैं, का फोटो हैं, और उसमें कुछ पन्द्रह बीस पंक्तियों लिखी है, जिसमें क्रांतिकारी शादी की चर्चा है,  क्या लिखा है उन्होंने, जरा उस पर ध्यान दें…“जनतंत्र की खुबसुरती और क्रांतिकारी शादी – वाह मजा आ गइल। जनतंत्र की खुबसुरती आज कई वर्षों के बाद देखने को मिला, अच्छा लगा, यहीं होनो भी चाहिए।

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पूछिये, झारखण्ड के CM रघुवर दास से, उड़ता हाथी का क्या समाचार हैं?

बात उन दिनों की है, जब राज्य में मोमेंटम झारखण्ड की चर्चा चारों ओर थी। झारखण्ड के मुख्यमंत्री रघुवर दास और उनके कनफूंकवों को लगता था कि बस मोमेंटम झारखण्ड संपन्न हुआ कि उधर हाथी उड़ा, लेकिन भला हाथी भी कहीं उड़ता है, हाथी तो भारी भरकम जीव है, जो ठीक से दौड़ भी नहीं सकता, वो उड़ेगा क्या? इसी को लेकर कभी पत्रकारों ने प्रेस कांफ्रेस के दौरान सीएम रघुवर दास से पूछ दिया कि आपके दिमाग में ये उड़ता हाथी का कन्सेप्ट कैसे आया?

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