जब दैनिक भास्कर जानता है कि “दुष्कर्म किसी जाति, धर्म या मजहब की नहीं पूरी इंसानियत की समस्या है”, तो फिर इसे खुद पर अमल क्यों नहीं कर रहा?
जब ‘दैनिक भास्कर’ के ही राजस्थान के एक स्टेट एडिटर लक्ष्मी प्रसाद पंत यह स्वीकार करते हैं कि “दुष्कर्म किसी जाति, धर्म या मजहब की नहीं पूरी इंसानियत की समस्या है”, तो फिर ‘दैनिक भास्कर’ ही बताएं कि उसने हाथरस मामले में जातीय उन्माद को बढ़ावा देनेवाले हेडिंग्स का इस्तेमाल क्यों किया? जरा देखिये ‘दैनिक भास्कर’ ने क्या लिखा है – “जातिगत टकराव की ओर हाथरस, पीड़िता के घरवाले बोलेः ठाकुर-ब्राह्मण के गांव में डर कर जी रहे हैं, पर इंसाफ लेंगे”
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