हा रे बेशर्मों, अपनी मर्जी चलाते-चलाते रांची में गिद्ध टाइप पत्रकारिता की शुरुआत कर दी
हा रे बेशर्मों, कहां से पत्रकारिता का डिग्री लिया है रे, कौन से विश्वविद्यालय का नाम रौशन कर रांची पहुंच गया है रे, ये सब हेडिंग लगाना किसने सिखाया तुमको, ये असंवेदनशीलता कहां से आ गई तुमको, शहीदों और उनके परिवार के प्रति इस प्रकार की धृष्टता कहां से कर गये तुम, अपनी मर्जी चलाते-चलाते रांची के पाठकों को सड़क छाप पत्रकारिता का स्वाद कहां से चखा दिया।
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