धर्म

योग आत्मा का विज्ञान है, यह किसी खास धर्म की विरासत नहीं, इस पर सभी का अधिकार – ईश्वरानन्द

भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय और योगदा सत्संग सोसाइटी ऑफ इंडिया के संयुक्त तत्वावधान में आज योगदा सत्संग मठ में अंतरराष्ट्रीय योग दिवस बड़े ही धूमधाम से मनाया गया। इस आयोजन में सम्मिलित योग साधकों को संबोधित करते हुए योगदा सत्संग सोसाइटी ऑफ इंडिया के महासचिव स्वामी ईश्वरानन्द गिरि ने कहा कि चार साल पूर्व भारत सरकार के अद्भुत प्रयास, प्रभु के आशीर्वाद तथा संपूर्ण विश्व के देशों में योग के प्रति जगी भूख ने अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मनाने का संकल्प लिया और उसकी उपयोगिता तथा सार्थकता को लेकर, लोग योग को जाने, उसके रहस्यों को समझे, जीवन क्या है, इसके आदर्शों को समझे आदि विषयों को लेकर 21 जून को पूरे विश्व में एक साथ अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के रुप में मनाने का संकल्प लिया।

स्वामी ईश्वरानन्द गिरि ने कहा कि आज जो योग के बारे में सर्वत्र चर्चा चल रही है, उसके आभास को परमहंस योगानन्द जी ने बहुत पहले ही जान लिया था, यहीं कारण था कि उन्होंने योग को जनजन तक पहुंचाने का संकल्प जो वर्षों पहले लिया था, वो बता दिया कि जल्द ही एक समय ऐसा आयेगा, लोग जानेंगे कि उनके लिए योग कितना आवश्यक है परमहंस योगानन्द जी के योग के बारे में पहलेपहल किये गये अनुप्रयोग ने विश्व को आखिरकार योग की ओर ले ही आया और लीजिये आज आध्यात्मिकता की लहर योग के रुप में फैलने लगी।

स्वामी ईश्वरानन्द गिरि ने कहा कि योग विज्ञान है, आत्मा का विज्ञान है, यहीं बताता है कि जो आत्मा है, वहीं हमारा वास्तविक रुप है, इससे जानने की आवश्यकता है और बिना योग के यह संभव नहीं। उन्होंने कहा कि बिना योग के आप मन के अंधकार और उनकी वृत्तियों पर अंकुश नहीं लगा सकते, अशांत मन पर विजय प्राप्त नही कर सकते, आनन्द को प्राप्त नही कर सकते, जो हम सभी के लिए जन्मसिद्ध अधिकार है। उनका कहना था कि योग का अंतिम लक्ष्य है जीवन को आनन्द से भर देना, जीवन में आनेवाली चुनौतियों पर विजय प्राप्त करना।

स्वामी ईश्वरानन्द गिरि ने स्पष्ट कहा कि योग विज्ञान किसी खास धर्म की विरासत नहीं, इस पर सभी का अधिकार है, पूरे विश्व के उन तमाम लोगों का अधिकार है, जो जीवन के मूल लक्ष्यों को समझने की कोशिश करते हैं, यह संपूर्ण मानवों के लिए एक ऐसा धरोहर है, जिससे सभी लोगों का जीवन आलोकित होता है। हर कोई, इस विज्ञान को अपने जीवन की बेहतरी के लिए प्रयोग में ला सकता है। इसके लिए किसी को भी विशेष योग्यता रखने की भी आवश्यकता नहीं।

स्वामी ईश्वरानन्द गिरि ने कहा कि कुछ लोगों ने इसे बेवजह कठिन योगासनों और प्राणायाम की गलत व्याख्या कर, गलत धारणाओं को जन्म दिया है, जिसे सही नहीं ठहराया जा सकता। हर व्यक्ति जो अपने जीवन को बेहतर करना चाहता है, या जो सांसे ले रहा हैं, वह योग करने में सक्षम हैं, यह बहुत ही सुगम मार्ग है, क्योंकि जो आनन्द प्राप्त करने को इच्छुक है, वह योगी है, योग की ऐसी सुंदर व्याख्या कभी परमहंस योगानन्द जी ने मानव मात्र के लिए की थी।

स्वामी ईश्वरानन्द गिरि ने परमहंस योगानन्द जी के जीवन चरित्र पर प्रकाश डालते हुए कहा कि 1893 में गोरखपुर में जन्मे परमहंस योगानन्द जी ने बहुत ही कम उम्र में 1917 में रांची में योगदा सत्संग मठ की स्थापना कर डाली, योग विद्यालय खोल डाले और योग को जनजन तक पहुंचाने का काम किया, उस योग को जो महावतार बाबाजी ने अपने शिष्य लाहिड़ी महाशय को दिया, लाहिड़ी महाशय ने युक्तेश्वर गिरि जी को दिया और फिर युक्तेश्वर जी ने परमहंस योगानन्द जी के माध्यम से पूरे विश्व में पहुंचाने की ठानी, जो मील का पत्थर साबित हो गया, आज पूरे विश्व में परमहंस योगानन्द जी के इस योग का डंका बज रहा है। उनकी लिखी योगी कथामृत विश्व की सबसे ज्यादा बिकनेवाली पुस्तकों में से एक है, जो अब तक पचास भाषाओं में लिखी जा चुकी है, केवल 13 तो भारतीय भाषाओं में उपलब्ध हैं। उन्होंने बताया कि इस पुस्तक का अब संस्कृत और उर्दू में भी अनुवाद हो चुका है।

स्वामी ईश्वरानन्द गिरि के अनुसार, परमहंस योगानन्द जी ने योग को जनजन तक पहुंचाने के लिए ईश्वरीय कृपा से पाठों के माध्यम से लोगों को योग की महत्ता बताई। उनका मानना था कि अपने अन्तर्ज्ञान से जो भी योग के बारे में जानना चाहेंगे, वे इस पाठ के माध्यम से बेहतर ज्ञान प्राप्त करेंगे, क्योंकि जो पाठ बनाये गये हैं, वे उनके द्वारा प्राप्त अनुभवों के आधार पर लिखे गये हैं, न कि येन-केन-प्रकारेन जनता के बीच रख दिया गया। उनका कहना था कि योग साधना का मार्ग हैजिसे हम अपने जीवन को आनन्द से भर देते हैं। जिस प्रकार विज्ञान निरपेक्ष है, उसी प्रकार योग विज्ञान भी सभी के लिए निरपेक्ष है, यह सभी के लिए बना है।

उन्होंने कहा कि जो भी व्यक्ति यह जानना चाहता है कि वह कौन है? कहां से आया है? यहां जो जीवन का नाटक जब समाप्त हो जायेगा, तो फिर वह कहां जायेगा? इन प्रश्नों को वास्तविक उत्तर जानना चाहता है तो उसे अंत में योग का ही ध्यान करना होगा, क्योंकि फिर इसके लिए आत्मा को जानना आवश्यक है और उस आत्मा को जानने के लिए मन को नियंत्रित करना जरुरी है और मन तभी नियंत्रित होगा, जब आपका आत्मसाक्षात्कार होगा, और ये तभी संभव है, जब आप नियमित योगसाधक हो।

उन्होंने सभी से कहा कि आप गांठ बांध ले, कि आप शरीर नहीं है, आप सिर्फ और सिर्फ आत्मा है, जो शरीर से बंधी है, इस आत्मा को शरीर से एक एक दिन जुदा होना है, उसके पहले योग के माध्यम से खुद को जानना आवश्यक है, जिसके लिए योग सहायक है, क्योंकि जहां भौतिक विज्ञान समाप्त होता है, वहीं से योग विज्ञान प्रारम्भ होता है।

उन्होंने कहा कि याद रखें, आत्मा तो मरती है और जन्म लेती है, आत्मा साक्षात परमात्मा का ही अंश  है। ऐसे में हम क्यों नहीं परमात्मा के आनन्द में समाने के लिए तत्पर रहे। उन्होंने कहा कि जो लोग यह समझते है कि योगासन ही योग है, तो वे भूल कर रहे हैं, योगासन योग का एक छोटा सा अंश है, इससे ज्यादा कुछ नहीं। उन्होंने कहा कि योगासन से शरीर को स्वस्थ रखा जा सकता है, जो आप को योगसाधना में सहायक होता है। जो व्यक्ति निरन्तर नियमित प्रतिदिन योगसाधना में लगा रहता है, वही परम आनन्द को प्राप्त कर सकता हैं, दूसरा नहीं।

उन्होंने एक उदाहरण देते हुए कहा कि मनुष्य का मन उस बंदर की तरह है, जिसने शराब पी रखी है, और उस बंदर को किसी बिच्छू ने काट रखा हैं, ऐसे हालत में वह बंदर किस प्रकार की हरकत करेगा, आप समझ सकते है, इसलिए आप मन की चंचलता पर काबू पाना चाहते हैं तो योग की शरण में आइये, खुद को जानिये, इसके लिए योगदा सत्संग ऑफ सोसाइटी के संन्यासियों का दल आपकी मदद करने के लिए हमेशा तैयार है। अब यह आपके उपर निर्भर है कि आप उसे प्राप्त करने के लिए कितना तैयार है।

उन्होंने महाभारत के एक प्रसंग को सुनाते हुए कहा कि अर्जुन ने एक बार श्रीकृष्ण से कहा कि वह मन को स्थिर कैसे करे? भगवान कृष्ण ने अर्जुन को यही उत्तर दिया था कि केवल योगाभ्यास और वैराग्य से ही मन को स्थिर किया जा सकता है, इसलिए मन की चंचलता पर काबू पाये और यह तभी संभव है जब आप नियमित योगाभ्यास करें, आनन्द को प्राप्त करें, क्योंकि इसे प्राप्त करना आपका अधिकार है। उन्होंने कहा कि दैहिक, मानसिक और आध्यात्मिक सुख प्राप्त करने के लिए लोग लगे हैं, पर सभी को यह चीजें प्राप्त नही होती, पर जो लोग निरन्तर योगसाधना में लगे रहते हैं, उन्हें ये सारी चीजें प्राप्त हो जाती है।

स्वामी ईश्वरानन्द गिरि के व्याख्यानों के बाद योगसाधना के व्यवहारिक पक्ष का रसास्वादन ब्रह्मचारी आद्यानन्द ने कराया, जबकि शाम्भवानन्द जी ने योगदा साधकों के बीच बहुत ही सुंदर भजनों से योगधारा बहाई। उनके गाये भजन चरण कमल बंदौ हरिराई, ओम् नमः शिवाय, हरे कृष्ण हरे राम, जयजय राम, जयजय राम आदि भजनों को सुनकर योगदा साधक योग साधना की भक्ति धारा में डूबकी लगाने लगे, तथा स्वयं को धन्य भी किया।