यह कैसी पत्रकारिता, जहां हारनेवालों, अलग विचारधारा रखनेवालों के लिए दिल में कोई इज्जत ही नहीं

अब मुझे किसी से पूछने की यह जरुरत नहीं, कि जब हमारे देश के सच्चे सपूत क्रांतिकारी अंग्रेजों के जूल्मों के खिलाफ लड़ते होंगे, और अंग्रेज जब उन्हें निशाना बनाते होंगे, तो अपने ही देश के कुछ लोग यह जरुर कहते होंगे कि इन मूर्खों को क्या जरुरत थी, अंग्रेजों के खिलाफ लड़ने की, भला अंग्रेजों से कोई जीत सकता हैं, जिनका सूर्य कभी अस्त नहीं होता।

अब मुझे किसी से पूछने की यह जरुरत नहीं, कि जब हमारे देश के सच्चे सपूत क्रांतिकारी अंग्रेजों के जूल्मों के खिलाफ लड़ते होंगे, और अंग्रेज जब उन्हें निशाना बनाते होंगे, तो अपने ही देश के कुछ लोग यह जरुर कहते होंगे कि इन मूर्खों को क्या जरुरत थी, अंग्रेजों के खिलाफ लड़ने की, भला अंग्रेजों से कोई जीत सकता हैं, जिनका सूर्य कभी अस्त नहीं होता। ऐसे लोग जरुर अपने बच्चों को कहते होंगे कि देखो रे, अंग्रेजों से नहीं लड़ना, क्योंकि ये बहुत क्रूर होते हैं, शासन में हैं, वे तुम्हारा जीना दूभर कर देंगे, इसलिए जहां अंग्रेज मिले, उन्हें सलाम ठोकना, उनके जूतों पर अपना सर रख देना और आगे बढ़ जाना।

ऐसे लोग चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव, अशफाकउल्लां, खुदीराम बोस आदि शहीदों के वीरगाथा को नहीं सुनाकर, ये कहते होंगे कि देखों ये लोग अंग्रेजों के खिलाफ लड़े और अंग्रेजों ने इनका क्या हाल बनाकर रख दिया और फिर ऐसे लोगों के बच्चे अपने मां-बाप के कहने में आकर, लंद-फंद करते, अपनी जिंदगी को झंड बनाते और जानवरों जैसे बच्चों को पैदाकर स्वर्ग सिधार जाते। ऐसे लोगों की संख्या हर समय रही हैं, आगे भी रहेगी, इसे समाप्त नहीं किया जा सकता। ऐसे लोग ही वीरगति प्राप्त अमरशहीदों के बलिदानों पर पांव रखकर ऐशो-आराम की जिंदगी भी जीते हैं।

ऐसे लोग तो महान वीरांगना लक्ष्मीबाई के खिलाफ बोलने से भी नहीं चूके होंगे कि महारानी को क्या जरुरत थी, अंग्रेजों से लड़ने की, देखों कौड़ी की तीन हो गई और देखों ग्वालियर नरेश को जिन्होंने अंग्रेजों के साथ मित्रता की और वे कितने सुख पूर्वक रहे। आप कहेंगे आज के दिन में ऐसी बात लिखने की आवश्यकता क्यों पड़ गई? मैं कहता हूं कि आज यह आवश्यकता है, इसे समझने की भी आवश्यकता है, क्योंकि लोकतंत्र में हथियारों से लड़ाई नहीं होती, यहां तो वोटिंग के द्वारा सत्ता का हस्तांतरण हो जाता है।

जो लोग सत्ता के दलाल होते हैं, जिनके प्राण सत्ता के बिना जीवित नहीं रह सकते। जिन्होंने सत्ता को अपने प्रेमिकाओं, पत्नियों, बेटे-बेटियों, बहुओं-दामादों को ही सेवा का माध्यम मान रखा हैं, उनके लिए क्या हैं, जो भी हैं, सामने हैं। देश को स्वतंत्र हुए 70 साल से अधिक हो गये और इनसे कम सालों में चीन आज अमरीका जैसे महाशक्ति को चुनौती दे रहा हैं, भारत जैसे देश को आर्थिक रुप से गुलाम बना रखा है, और हम “मोदी-मोदी” चिल्लाने में ही अपनी शान समझते हैं।

ऐसे कई युवा हैं, जो हमारे गलियों-मुहल्लों मे रहते हैं, जिन्होंने कभी अपनी जिंदगी में अपने मां-बाप का नाम नहीं लिया होगा, पर उन्हें “मोदी-मोदी” कहने में परमानन्द की प्राप्ति होती है। अब चलिये देश के युवाओं को लगता है कि “मोदी-मोदी” चिल्लाने से ही हर कष्ट से मुक्ति मिल जाती है, और यहीं समस्त सुखों का सार हैं, तो हम और आप क्या कर सकते हैं? यह एक नया देश उभरा इन पांच सालों में, इसका भी रसास्वादन करें।

और अगर आप रसास्वादन नहीं करेंगे तो मीडिया आपको करायेगी, और इसमें काम करनेवाले लोग आपको करवायेंगे, वे बतायेंगे कि “मोदी-मोदी” कहने में ही परम सुख की प्राप्ति है, अद्भुत शांति हैं, इसी का जप करने से अब मुक्ति मिलेगी, ये साक्षात् भगवान के अवतार है, इनका सीधे कनेक्शन केदारनाथ व बद्रीनाथ से हैं, ये आम भी चूसते हैं, तो इनकी कला गजब की होती हैं, ये पत्रकारों और अभिनेताओं में भी समभाव रखते हैं, ऐसे में जो मोदी के खिलाफ बोलेगा, वो जायेगा, चाहे वह कोई हो।

जरा इस फोटो को देखिये, जो साफ बता रहा है कि मीडिया का क्या चरित्र हैं, एक भाजपा के टिकट पर बेगूसराय से चुनाव लड़ रहा व्यक्ति गिरिराज सिंह हैं, जो एक मीडियाकर्मी के कंधे पर अपना बलिष्ठ हाथ रखा हैं, और कैसे गर्व से खड़े होकर फोटो खींचवा रहा हैं, और उक्त मीडियाकर्मी को देखिये, कैसे खुद को गौरवान्वित कर रहा हैं। अब इसी मीडियाकर्मी का दूसरा चरित्र देखिये, वह कैसे बेगूसराय से ही लड़ रहे भारतीय कम्यूनिष्ट पार्टी के उम्मीदवार कन्हैया को लोकसभा चुनाव परिणाम आने के बाद लताड़ रहा हैं।

देखिये वो अपने सोशल साइट पर कन्हैया और अपने विचार से नहीं मेल रखनेवाले लोगों के लिए किस भाषा का प्रयोग कर रहा हैं, देखिये उसने लिखा क्या है “कन्हैया जैसे टूच्चे की पालकी, जबरिया कनहईया पर उठाकर, ‘जय कन्हैया लाल की, मदना गोपाल की’ अलापने वाली सुपारी संपादक टाइप खविश पत्रकारों को भी बधाई” अब सवाल उठता है कि क्या एक पत्रकार की नजर में कन्हैया की औकात यहीं है, और जब कन्हैया की औकात उक्त पत्रकार के नजर में यहीं है, तो जब ये कन्हैया से बात किया होगा और बेगूसराय पर जब वो रिपोर्ट बनाता होगा, तो उसके दिमाग में क्या चल रही होगी, क्या वह अपनी पत्रकारिता के साथ न्याय करता होगा, इस पर विचार करियेगा, क्योंकि ये एक पत्रकार की सोच हैं।

जो बताता है कि आजकल की पत्रकारिता कितनी नीचे गिर चुकी है, क्या सचमुच कन्हैया की कोई इज्जत नहीं। क्या हमारे देश में हमसे अलग विचारवालों की कोई जगह नहीं और अगर ये जगह नहीं हैं, तो फिर भारत कहां है, कोई बतायेगा? हम ये क्यों भूल रहे है कि हमारे यहां चार्वाक के सिद्धांत को भी वही मान्यता है, जो अन्य का है, आप उसको हेय दृष्टि से नहीं देख सकते, ये आपके उपर हैं, जिस सिद्धांत को मानना है, मानिये, नहीं मानना हैं, मत मानिये, पर किसी के प्रतिष्ठा पर सवाल उठाना, अपने समकक्ष मित्रों को खविश की संज्ञा देना क्या कहता है?

कमाल है, पांच साल नरेन्द्र मोदी ने अपने कार्यकाल पूरे कर लिये, और ये नया टर्म जनता ने उन्हें दिया, जनता ने क्यों दिया, कैसे दिया, दबाव में दिया, कोई विकल्प नहीं था, इसलिए दिया, क्या समझ के दिया, ये भगवान जानें, पर नरेन्द्र मोदी पर कोई सवाल नहीं करें, उनसे कोई सवाल नहीं पूछे, खूली छूट दे दें कि वे जो करें, ये सफल लोकतंत्र के लिए बहुत बड़ा खतरा हैं।

जो आपके विचार से नहीं मेल करता हो, आप उसको झूठे मुकदमें में फंसा दें, किसी की बेटी का बलात्कार कर, उसे जिंदा जला दें और जब वो बेटी का बाप आपसे न्याय मांगने आये तो आप उसे दुत्कार कर भगा दें, उस पर राजनीति करने का आरोप लगा दें, ये नई व्यवस्था की देन हैं, अगर ये व्यवस्था इसी तरह चलती रही, जिसकी संभावना अब शत प्रतिशत बन चुकी है, तो निश्चय ही क्रांति होगी, और उस क्रांति की आग में देर-सबेर उन सब की कीर्तियां ध्वस्त हो जायेगी जो खुद को आज के हालात में मोदी के साथ खड़े हो रहे हैं, ये भूले नहीं।

चुनाव परिणाम आने के बाद जिस प्रकार से गाली-गलौज का प्रकरण बढ़ा है, भाजपा के विरोधियों को नीचा दिखाने का काम भाजपाइयों ने शुरु किया हैं, वे यह नहीं भूलें कि जनता ने उनको सदा के लिए सत्ता की रजिस्ट्री नहीं कर दी, अगर जनता को जगानेवाला सही नेता मिल गया और मोदी के खिलाफ एक सुंदर विकल्प तैयार हो गया तो मोदी को सत्ता से डिगाने में कितना समय लगेगा? क्योंकि लोगों का तो कथन यहीं है कि चूंकि विकल्प नहीं था और अपने यहां एक लोकोक्ति हैं “अंधरा में कनवा राजा” तो हमने समझा कि ये राजा ही ठीक है, दे दिया वोट।

हमें लगता है कि वो दिन दूर नहीं, कि जनता स्वयं एक विकल्प तैयार करेगी और जीत में बौराएं इन तानाशाहों को तथा पूर्व में किये गये इनके लोगों द्वारा कुकर्मों को विशेष सजा देगी, फिलहाल हम उन सारे लोगों को कहेंगे कि जिन्होंने सत्ता पक्ष के खिलाफ अपना जोरदार अभियान पूर्व में जारी रखा था, उसे अब भी जारी रखें, आतताइयों के खिलाफ अपना आवाज बुलंद करें, आज न सही, कल कामयाबी मिलेगी, जरुर मिलेगी, नये सूरज का विहान होगा, वहां कारपोरेट के दुनिया में बैठे लोगों के इशारे पर हमारा पीएम नाच नहीं रहा होगा, उसका अपना मन-मस्तिष्क होगा, जिसके सहारे वह करोड़ों दीन-दुखियों की सेवा कर रहा होगा।

भूलिए नहीं कि महाराणा ने सत्ता के खिलाफ अपना संघर्ष जारी रखा था, सत्ता के इस संघर्ष में महत्वपूर्ण यह नही कि कौन जीता और कौन हारा, महत्वपूर्ण है कि वह संघर्ष किया कि नहीं। लक्ष्मीबाई अंग्रेजों से हारी, फिर भी विश्व उनके आगे नतमस्तक है, महाराणा अकबर से हार गये, पर महाराणा की वीरता पर कोई अंगूली नहीं उठा सकता, इसलिए मोदी के गलत नीतियों का खुलकर विरोध करें, चाहे उसके परिणाम कुछ भी हो, वीर हार-जीत की परवाह नहीं करते, वो तो लड़ते रहते हैं, संघर्ष करते रहते हैं।

Krishna Bihari Mishra

3 thoughts on “यह कैसी पत्रकारिता, जहां हारनेवालों, अलग विचारधारा रखनेवालों के लिए दिल में कोई इज्जत ही नहीं

Comments are closed.

Next Post

धनबाद के कतरास में दो गुटों के मनबढूंओं ने माहौल किया खराब, पथराव, लाठीचार्ज के बाद धारा 144 लागू

Fri May 24 , 2019
पीएम नरेन्द्र मोदी को मिली अपार सफलता और गिरिडीह संसदीय सीट से भाजपा समर्थित आजसू उम्मीदवार चंद्रप्रकाश चौधरी को मिली जीत से बौराएं भाजपा-आजसू के कार्यकर्ताओं ने कतरास में विजय जुलूस क्या निकाला, ये जुलूस कतरास के शांतिप्रिय लोगों के लिए काल बनकर आ गई। बताया जाता है कि जब यह जुलूस गुहीबांध मस्जिद पहुंची, तब वहां तराबीह की नमाज पढ़ी जा रही थी,

You May Like

Breaking News