वाह रे समाज, बार-बाला के साथ फिल्मी दारोगा का डांस अच्छा और हकीकत में कोई करें तो बहुत खराब

सिनेमा के पर्दों पर जब थानेदार बना हीरो बार-बाला के साथ डांस करें तो सीटी बजायेंगे, कहेंगे वाह क्या रोल किया है और जब सही में किसी थाने का थानेदार वैसा कृत्य कर दें, तो उसका लोग जीना हराम कर देंगे, यह है हमारा समाज और यह है उसका दोहरा मापदंड। भाई अगर कोई काम गलत हैं तो दोनों जगह गलत हैं, पर्दें पर भी, और पर्दे से बाहर भी, लेकिन ये क्या आप पर्दे पर हो रहे कुकृत्य की सराहना करेंगे,

सिनेमा के पर्दों पर जब थानेदार बना हीरो बारबाला के साथ डांस करें तो सीटी बजायेंगे, कहेंगे वाह क्या रोल किया है और जब सही में किसी थाने का थानेदार वैसा कृत्य कर दें, तो उसका लोग जीना हराम कर देंगे, यह है हमारा समाज और यह है उसका दोहरा मापदंड। भाई अगर कोई काम गलत हैं तो दोनों जगह गलत हैं, पर्दें पर भी, और पर्दे से बाहर भी, लेकिन ये क्या आप पर्दे पर हो रहे कुकृत्य की सराहना करेंगे, उससे मनोरंजन प्राप्त करेंगे, वाह-वाह करेंगे और जब उसका विकृत रुप आपके समक्ष आ खड़ा हो, तो आप उसकी आलोचना करना शुरु करेंगे, ये तो सरासर गलत है, इस प्रकार के कुकृत्य का विरोध तो वहीं करें, जिसने कभी जिंदगी में ऐसा कुकृत्य किया ही न हो।

भाई, आजकल तो कई चैनलों- अखबारों में इससे भी गंदे-गंदे कुकृत्य और हरकतें होती हैं, अगर सही मायनों में इन चैनलों-अखबारों में कार्यरत मठाधीशों के लैपटॉप/कम्प्यूटरों/मोबाइलों की जांच हो जाये, तो इनमें से ज्यादातर लोग एक-एक कर कटघरे में खड़े हो जायेंगे, कई मामलों में तो सब कुछ जानते हुए भी कई थानों के थानेदार चुप्पी साध लेते हैं, कि भला इन इज्जतदारों की क्या इज्जत उछाली जाये, पर जब पुलिस की बात हो तो यहीं अखबार और चैनल के लोग सबसे पहले उसकी बैंड बजायेंगे, अब सवाल बैंड बजाने पर नहीं हैं, सवाल है कि वे लोग क्यों बैंड बजायेंगे, जो इसी प्रकार की हरकतों का रिकार्ड बना चुके हैं?

सोशल साइट में तो हद हो गई है, ऐसा लग रहा है कि सोशल साइट सिर्फ इन्हीं चीजों के लिए बना है, जबकि सोशल साइट का उपयोग अच्छे कामों के लिए भी हो सकता है, दरअसल अपने देश व राज्य में टीआरपी और सर्वाधिक लोकप्रिय होने के चक्कर में लोग अपने देश व समाज के प्रति दायित्वों को भूलते जा रहे हैं, जो खतरनाक है। इन दायित्वों के भूलने के कारण ही समाज और देश विभिन्न प्रकार की संकटों से जूझ रहा है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हर वस्तु का दो पक्ष हैं, एक सकारात्मक और दूसरा नकारात्मक। आप एक हाथ से किसी को थप्पड़ भी मार सकते हैं और  उसी हाथ से उसके पांव दबाकर उसके दर्द को कम कर सकते हैं, ये तो आपको सोचना है कि आप, आपने हाथ से कैसा काम ले रहे हैं।

जरा पाकीजा फिल्म देखिये, जहां कोठे पर एक गाने को फिल्माया गया है, जिसमें मीना कुमारी नर्तकी के रोल में हैं, और गाना गाने के क्रम में, वह कह रही हैं – हमरी न मानो सैया, हमरी न मानो सिपहिया से पूछो, जिसने बजरिया में छीना दुपट्टा मेरा, यानी सिपाही-दारोगा और कोठे का संबंध तो सदियों से रहा हैं, ये सिपाही-दारोगा कोई साधु-संत थोड़े ही हैं, जो मंदिरों के घंटे बजाते नजर आयेंगे, इनसे आप अगर संत प्रवृत्ति की कामना कर रहे हैं, तो भाई आप कलियुग में नहीं सतयुग में जी रहे हैं और आपको भी सतयुग जैसे मनोवृत्ति का अनुसरण करना होगा।

आप फिल्म दबंग को देखिये, जिसमें सलमान खान जो दारोगा बने हैं, एक बार-बाला डांसर के साथ कैसे गाना गा रहे हैं – ले झंडू बाम हुई, डार्लिंग तेरे लिए, और आपके घर में जब शादी होती है, और बारात सजता है, तो आप गायक कलाकार से फरमाइश करते है, कि जरा वो गाना बजाओ – मुन्नी बदनाम हुई, डार्लिंग तेरे लिए, और उस गाने के धुन पर बीच सड़क पर अपने घर की लड़कियों और महिलाओं को नचवा रहे होते हैं, और खुद भी उसमें आनन्द लेते हैं, ऐसे में आप कैसे कह सकते है कि महुदा थानेदार नंद किशोर सिंह ने अर्द्धनग्न होकर बार डांसर के साथ जो डांस किया वो गलत है।

हालांकि धनबाद के एसएसपी किशोर कौशल ने उक्त महुदा के थानेदार को इस कार्य के लिए निलंबित कर दिया, पर इस निलंबंन से क्या हो जायेगा, ऐसा थोड़ी ही है कि उसकी नौकरी चली गई, वो यहां न रहकर कहीं भी रहेगा, तो उसका पोजीशन वहीं रहेगा, निलंबन मुक्त होगा फिर वहीं करेगा, क्योंकि वह साधु-संत नहीं हैं, अगली बार करेगा तो इस बात का ध्यान रखेगा कि कोई उसकी विडियो तो नहीं बना रहा, ऐसे कई विडियो पूरे भारत के विभिन्न राज्यों में पुलिसकर्मियों के देखने को मिलते हैं, और हिन्दी फिल्मों में तो दारोगा और हिरोइनों के बीच अर्द्धनग्न डांस तो जगजाहिर है, भोजपुरी फिल्मों में तो हीरो बने दारोगा और नायिकाओं के बीच के अंतर की सारी सीमाएं ही पार कर दी जाती है।

कभी धनबाद के ही कोयला मजदूरों पर फिल्म बनानेवाले बिहारी बाबू शत्रुघ्न सिन्हा ने अपनी फिल्म कालका में एक गाने का फिल्मांकन किया था, बोल थे – दारोगा जी से कहियो, सिपहिया करे चोरी, जो परम्परागत गीतों पर आधारित था, सवाल है कि महुदा थानेदार के इस गंदे विडियो को वायरल कर, बार-बार दिखाकर, आप क्या साबित करना चाहते है, आप को इस न्यूज के द्वारा एक माइलेज मिल सकता है, आप की खबर को लाखों लाइक मिल सकती है, पर देश व समाज को उसका एक बहुत बड़ा नुकसान उठाना पड़ता है।

बार-बार वह विडियो बच्चों और युवाओं तक पहुंच रहा है, जिससे बच्चे व युवा प्रभावित हो रहे हैं, अब ये विडियो कब का है, पता नहीं, हो सकता है कि उसके विरोधियों ने एक सुनियोजित साजिश के तहत उसके चरित्र-हनन का प्रयास किया हो, जो उनके प्रतिद्वंदी या उसके कट्टर विरोधी हो, वे मकसद में अपने कामयाब हो गये हो, पर हमारा भी तो कुछ दायित्व बनता है, समाज और देश के प्रति, भला हम अपने मकसद में क्यों कामयाब नही हो रहे, हम ये क्यों भूल जाते है कि गलत का हर हालत में विरोध करें, चाहे वह गलत कहीं पर हो।

आप एक ओर फिल्मी पर्दें पर उस गलत का समर्थन करेंगे और अपने बच्चों को उसी गाने पर डांस करवायेंगे और जब कोई दूसरा ऐसा करेगा तो आप उसे गलत कहेंगे, ये दोहरा मापदंड जो हैं न, अपने समाज को ले डूबेगा, और फिर वो गाना है न, ले झंडू बाम हुई, डार्लिंग तेरे लिए, पूरा समाज हर जगह यहीं गा-गाकर, अपने आपको गंदी प्रवृत्तियों में समाहित कर देश व समाज दोनों को गर्त में ले जायेगा, शुरुआत तो कब की हो गई, अब तो गर्त में जाने की इमारत खड़ी की जा रही है।

Krishna Bihari Mishra

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