जातीय प्रेम के आधार पर आदित्य साहू को टिकट और फिर उसे साधारण कार्यकर्ता बताकर वाहवाही, ये सिर्फ तुम ही कर सकते हो भाजपाइयों

भाजपा के प्रदेश महामंत्री आदित्य साहू को राज्यसभा का टिकट मिलना और इसे भाजपा के साधारण कार्यकर्ता को टिकट मिलने की बात से जोड़ देना, दरअसल भाजपा के उन नेताओं की सबसे बड़ी धूर्तई है, जो इस राज्य में जाति की राजनीति करते हैं अथवा भाजपा को जाति की राजनीति में पूरी तरह से धकेल दिया हैं।

जिसका परिणाम आज नहीं तो कल भाजपा को ही झेलना पड़ेगा, जब भाजपा लोकसभा और विधानसभा की एक-एक सीट के लिये तरस जायेगी, लोग भाजपा के बदले दूसरे दलों को प्राथमिकता देंगे, क्योंकि उनके पास जाति की राजनीति करनेवाले दलों को बहुत बड़ा विकल्प होगा, जिन विकल्पों में से एक को वो चून लेंगे।

जरा देखिये, जैसे ही नई दिल्ली स्थित भाजपा मुख्यालय से आदित्य साहू का नाम राज्यसभा के लिये आया, भाजपा में रह रहे जातिवादी राजनीति का बीजारोपण कर चुके नेता ने इसे आदित्य साहू को साधारण कार्यकर्ता बता दिया, जैसे लगता हो कि आदित्य साहू जैसा कोई साधारण कार्यकर्ता न तो भाजपा में आज तक हुआ और न होगा।

आखिर ये आदित्य साहू है क्या भाई? दरअसल आदित्य साहू राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास के परम भक्त है, ठीक उसी प्रकार जैसे राम भक्त हनुमान है और जब राम अपने हनुमान पर कृपा कर सकते हैं तो रघुवर अपने परम भक्त आदित्य को राज्यसभा भी नहीं पहुंचा सकते, वो भी तब जब उनके जात भाई मोदी-शाह की देश में सत्ता है।

हम आपको बता दें कि कभी रघुवर के जैसी ही भक्ति व निष्ठा, आदित्य साहू रांची के पूर्व भाजपा सांसद राम टहल चौधरी के प्रति रखते थे, वो भी इसलिये कि राम टहल चौधरी ने ही इन्हें भाजपा में अवतरित किया था, यही नहीं अपनी संस्था राम टहल चौधरी इंटर कॉलेज ओरमांझी में लेक्चरर भी बनवाया था, पर जैसे ही आदित्य साहू को रघुवर भक्ति प्राप्त हुई।

राम टहल चौधरी ने भाजपा से स्वयं को अलग किया, आदित्य साहू ने मौके की नजाकत और जातीय प्रेम की डोर को मजबूत करते हुए रघुवर दास की शरण ली। रघुवर ने भी अपने परम भक्त आदित्य साहू को हृदय से लगा लिया, ठीक उसी प्रकार जैसे हनुमान जी को श्रीराम ने किष्किंधा पर्वत पर हृदय से लगा लिया था।

आश्चर्य देखिये, आदित्य साहू भाजपा को छोड़, संघ की किसी आनुषांगिक संगठन से जूड़े नहीं रहे हैं, न ही भाजपा में रहकर कोई कीर्तिमान स्थापित किया है। ये तो जातीय प्रेम है, कि रघुवर ने इन्हें सिल्ली से विधानसभा का चुनाव भी लड़वा दिया और इन्हें वोट कितना मिला, मात्र 2500 लगभग। अब आप इसी से इनकी लोकप्रियता समझ लीजिये। रघुवर की कृपा से ये भाजपा के जिला ग्रामीण अध्यक्ष भी बने और अंत में भाजपा के प्रदेश उपाध्यक्ष होते हुए, प्रदेश महामंत्री भी बन गये और लीजिये अब सीधे राज्यसभा भी पहुंच गये।

कुछ लोग कहेंगे कि अगर रघुवर दास जातीय राजनीति करते तो समीर उरांव को उन्होंने राज्यसभा कैसे भेजा? तो शायद उन लोगों को पता नहीं कि मैं भी विद्रोही24 हूं। दरअसल समीर उरांव को इसलिए राज्यसभा भेजा गया ताकि दिनेश उरांव को नीचा दिखाया जा सकें, क्योंकि दिनेश उरांव जब विधानसभाध्यक्ष थे, तो उस वक्त रघुवर दास की हर बात में हां में हां नहीं मिलाया करते थे, जो रघुवर दास चाहते थे, रघुवर ने समीर को राज्यसभा भेज कर, अपने घमंड को पूरा कर लिया और दिनेश उरांव को नीचा दिखा दिया। नहीं तो रघुवर-रघुवर भजनेवाले बताये कि लोकसभा से संजय सेठ, राज्यसभा से महेश पोद्दार ये कौन वर्ग से आते है।

दरअसल भाजपा के बीज संघ में ही घुन लगना शुरु हो गया है। पहले संघ का भाजपा में दबदबा होता था, पर आज उलटा हो गया, आज कई प्रान्त प्रचारकों को देखा हूं कि वे मुख्यमंत्री आवास तक गणेश परिक्रमा करने में समय ज्यादा लगाते रहे, कई प्रान्त प्रचारकों पर तो भ्रष्टाचार के छीटें तक हैं, वर्तमान प्रान्त प्रचारक पर तो इस बात के भी छीटें है कि उन्होंने अपने रिश्तेदारों को सीयूजे में नौकरी तक दिलवाई और अपने पद का दुरुपयोग किया। जहां ऐसे-ऐसे प्रान्त प्रचारक हो, जहां रघुवर दास जैसे लोग हो, वहां जातीयता नहीं फैलेगी, ये कैसे हो सकता है।

और ये साधारण कार्यकर्ता क्या होता है, वो होता है जो प्रदेश अध्यक्ष बनते ही लोकसभा/विधानसभा का चुनाव लड़ने के लिए अपने लिए टिकट की जुगाड़ करने लगता है, राज्यसभा में अपने लिए सीट आरक्षित करा लेता है, अपने भक्तों/रिश्तेदारों के लिए भी वो हर हथकंडे अपनाने शुरु कर देता है, जिससे वो बमबम रहे।

मैं तो आज भी भाजपा के साधारण कार्यकर्ता को देख रहा हूं जो भाजपा के लिए कभी पीठ पर लाठी खायें, संघर्ष किया, जेल गये, उफ्फ तक नहीं की। विद्वता इतनी कि दीपक प्रकाश व रघुवर दास ही नहीं, बल्कि महेश पोद्दार जैसे लोग उनके घर में पानी भरें, पर उन्हें पूछ कौन रहा हैं, क्योंकि वे आज की जाति की राजनीति में फिट नहीं बैठते, जीवन पर्यन्त भाजपा में रहने का संकल्प लिया हैं, तो ऐसे में इन लोगों की घटियास्तर की राजनीति के आगे सर कैसे झूकायेंगे। याद रखों भाजपाइयों, इस जातीय राजनीति का दंश तुम्हें जल्द ही झेलना पड़ेगा, वो दिन दूर नहीं। लोकसभा/विधानसभा का चुनाव आने दो, एक-एक सीट के लिए न तरस गये, तो फिर कहना।