ये दर्द केवल पत्रकार राज सिंह का थोड़े ही न हैं, ये तो सभी का है, पर नेता-डाक्टर इस बात को समझे तब न

राज सिंह, रांची में पत्रकारिता करते हैं, आज के युग में जहां लोग माता-पिता को भगवान भरोसे छोड़कर अपना काम करते हैं, ये ठीक उससे अलग है, ये अपने माता-पिता को बेहद प्यार करते हैं, माता-पिता से उनका जुड़ाव मैं महसूस कर चुका है, वह भी तब जब वे कुछ समय के लिए हमारे साथ कशिश टीवी से जुड़े। आज जो उन्होंने सोशल साइट पर जो अपना दर्द उकेरा है, वो हमारे जैसे संवेदनशील व्यक्ति को अंदर से हिलाकर रख दिया है,

राज सिंह, रांची में पत्रकारिता करते हैं, आज के युग में जहां लोग मातापिता को भगवान भरोसे छोड़कर अपना काम करते हैं, ये ठीक उससे अलग है, ये अपने मातापिता को बेहद प्यार करते हैं, मातापिता से उनका जुड़ाव मैं महसूस कर चुका है, वह भी तब जब वे कुछ समय के लिए हमारे साथ कशिश टीवी से जुड़े। आज जो उन्होंने सोशल साइट पर जो अपना दर्द उकेरा है, वो हमारे जैसे संवेदनशील व्यक्ति को अंदर से हिलाकर रख दिया है, क्योंकि मैं भी इसी प्रकार के दर्द को 1997 में झेल चुका हूं। 

जब मेरे पिताजी 29 मई 1997 को ब्रेन हेमरेज के शिकार हुए, और उन्हें लेकर हम सपरिवार पीएमसीएच पटना पहुंचे थे, जहां आपातकालीन सेवा में जुटे जूनियर डाक्टरों के अमानवीय कृत्यों ने हमें अंदर तक हिला दिया था, और डाक्टर नामक शब्द से ही हमें चिढ़ सी हो गई, और बाद में जब हमारे पिताजी को पीएमसीएस के ही डा. गौरी शंकर सिंह की यूनिट में रखा गया तो रही सही कसर भी समाप्त हो गई। ये वो डा. गौरी शंकर सिंह थे, जिनकी आर्टिकल हर सप्ताह उस वक्त के हिन्दुस्तान अखबार में छपा करती थी, जिसे देखकर कोई भी व्यक्ति प्रभावित हुए नहीं रहता। 

हाल ही में कुछ दिन पहले पटना के वरिष्ठ पत्रकार कन्हैया भेलारी ने सोशल साइट पर जब डा. गौरी शंकर सिंह की प्रशंसा में कुछ दो शब्द लिखे, तो मैंने अपनी पीड़ा उनके कमेन्ट्स में लिखकर धर दी थी, कि मैंने अपने पिता को कैसे खो दिया, उस वक्त मैं आर्यावर्त से जुड़ा था, तथा दानापुर से अनुमंडलीय संवाददाता के रुप में कार्य कर रहा था। मैंने अपने पिताजी को मौत से तड़पते देखा था, और यह भी देखा कि एक इंजेक्शन को लगाने के लिए वहां कार्यरत नर्स को सिर्फ पांच कदम की दूरी तय करने में, दस मिनट लग गये और तब तक जो होना था, हो चुका था, अब बस केवल यादें ही शेष हैं।

आज फिर राज सिंह के पिता का दर्द, हमें उस दर्द की ओर ले गया, मैं महसूस कर सकता हूं कि राज सिंह पर क्या बीत रहा होगा? मेरा तो मानना है कि ये दर्द केवल राज सिंह की नहीं, वो तमाम लोगों का दर्द हैं, जो इस प्रकार की पीड़ा समयसमय पर झेलते रहते हैं, पर सरकार और इस सेवा में लगे लोगों का ध्यान इस ओर नहीं जाता।

उसका मूल कारण है कि हमारे जितने भी नेता है, चाहे वे किसी भी दल के क्यों हो, वे विधायक सांसद और मंत्री बन गये या उससे भी उपर ओहदे तक पहुंच गये तो लीजिये, उनकी सारी समस्याएं ही खत्म हो जाती है, क्योंकि फिर वे अपने स्वास्थ्य का इलाज भारत में नहीं कराते, वे सीधे विदेश भागते हैं, जहां भारतीय जनता के टैक्सों से अपना स्वास्थ्य बिल चुकाते हैं, और फिर स्वस्थ होकर, देश की जनता का खून चूसने के लिए भारत धमकते हैं।

ऐसे कई नेता हैं, जो बराबर स्वास्थ्य लाभ के लिए विदेश का दौरा करते हैं, कुछ तो ऐसे है कि वे कब बीमार पड़ें और कब विदेश गये और कब स्वस्थ होकर लौट आये, इसका पता हिन्दू जैसे अखबारों को भी नहीं लगता और वायर जैसे पोर्टल और एनडीटीवी के रवीश कुमार को इस बात की जानकारी मिल पाती है, और रही बात हम जैसे जनता या पत्रकार की तो भारत में पैदा ही लिये हैं, एक मामूली बिमारी से लड़ते हुए बेमौत मर जाने की। 

फिलहाल राज सिंह का दर्द को पढ़िये, जो हमने उनके फेसबुक से लिया है, मैं हर उस शख्स के साथ हूं, जो इस प्रकार के दर्द को झेलते हैं, राज सिंह ने लोगों से इस मुद्दे पर समर्थन मांगा है, हम तो समर्थन देने को तैयार हैं, आम लोगों को भी इस पुनीत कार्य में समर्थन देने के लिए आगे आना चाहिए, तभी कुछ सुधार की गुंजाइश हैं, नहीं तो ऐसे ही चलता रहेगा। अरुण जेटली और सोनिया गांधी जैसे नेता विदेश में जाकर अपना इलाज कराकर यहां बड़ीबड़ी बातें बोलेंगे और हमारे और आप जैसे लोग इनकी बेकार की बातों में आकर, स्वयं को बर्बाद करते रहेंगे, लीजिये, पढ़िये एक पत्रकार राज सिंह का दर्द

ये तस्वीर मेरे पिताजी की है, मैं नहीं चाहता था कि ये तस्वीरें आपके साथ साझा करुं, लेकिन इसे आपके साथ साझा करना जरुरी है। इस तस्वीर के पीछे एक कहानी काफी खौफनाक है, दरअसल ये तस्वीर बताती है कि सहरसा जैसे छोटे शहरों में डाक्टरों की जमात कितनी नीच और निर्दयी है, साथ ही ये बताती है, जिस देश का स्वास्थ्य बजट हजारों करोड़ है, वो देश स्वास्थ्य सुविधा के मामले में कितना भिखमंगा है। छह महीने पहले मेरे पिताजी के कान में दर्द शुरु हुआ, पिताजी ने सहरसा के ENT के जाने माने डाक्टर राजीव रंजन और राकेश कुमार से सम्पर्क किया,  दोनों ने ही कहा सिम्पल इंफेक्शन है दवाई से ठीक हो जाएगा, कई जांच भी कराये और झोला भरकर दवाई भी दी। 

इस दावे के साथ कि सब ठीक हो जाएगा। एक महीना बीता, दुसरा महीना बीता, लेकिन कान का दर्द ठीक नहीं हुआ, हाँ इस दौरान दोनों डॉक्टर दावा करते रहे कि नॉर्मल है, ठीक हो जाएगा। छह महीने तक दोनों डॉक्टरों के दवाई से जब दर्द दूर नही हुआ, पिताजी को सहरसा के डॉक्टरों पर इतना भरोसा था की वो सहरसा से बाहर निकलना नहीं चाह रहे थे, जबरन मैं उन्हें पटना लेकर आया। पटना में PMCH के ENT हेड डॉक्टर रमेश चन्द्र ने पिताजी को देखने के बाद जो कहा, वो हमारे पूरे परिवार के लिए क़यामत की खबर की तरह थी।

रमेश चन्द्र ने हमें ये सुझाव दिया की आप अपने पिताजी को मुम्बई लेकर जाइए, मुम्बई यानी कैंसर, 2 जनवरी को पिताजी को पटना में डॉक्टर ने मुम्बई ले जाने की एडवाइस दी और मैं 5 जनवरी को पिताजी के साथ मुम्बई में था। पूरे बाईस दिनों तक टाटा मेमोरियल का चक्कर का नतीजा सामने आया, पिताजी के बेस ऑफ़ टंग में कैंसर के सेल 1 TMH के डॉक्टरों ने सर्जरी की एडवाइस दी,  लेकिन पुरे सवा सौ करोड़ की आबादी वाले महान भारत की गरीब जनता के पास कैंसर जैसी बीमारी के इलाज के लिए TMH के अलावे कोई दुसरा विकल्प नहीं है, नतीजा डॉक्टरों ने 2 महीने के बाद की सर्जरी डेट देने की बात कही।

 TMH की अलग कहानी है, उसे बाद में शेयर करूँगा।  TMH  के सामने वाली फूटपाथ पर पूरा हिन्दुस्तान कैसे सोता है? देश के सिस्टम को हुए कैंसर के साथ ? पिताजी को TMH की डॉक्टर मिताली के पास रेफर किया गया जो इन दिनों पटना के पारस में चुकी हैं। 11 फ़रवरी को पिताजी की सर्जरी हो गई, भगवान् की दुआ से अबतक सब ठीक है, बिमारी से लड़ाई लम्बी है, लेकिन डॉक्टर ने कहा है की जीत सुनिश्चित है। अब असली मुद्दे पर आते हैं, आप बताइये। क्या पिताजी के इस हालात के लिए सहरसा के महान डॉक्टर जिम्मेदार नहीं हैं?

अगर उन्हें बिमारी समझ नहीं रही थी,  तो बाहर रेफर कर सकते थे। अगर छह महीने पहले वो रेफर करते तो शायद इतने मेजर सर्जरी की आवश्यकता ही नहीं पड़ती। रोजाना हजारों मरीज के जीवन के साथ इस तरह के डाक्टर खेलते हैं, ये केवल सहरसा तक सीमित नहीं है। दवा कंपनियों के कमीशन की लालच में झोला भरकर वो दवाई लिख देते हैं, जिनकी जरूरत मरीजों को नहीं होती। अब बस….. अब होगी लड़ाईबड़ी लड़ाई और इसकी शुरुआत करुंगा सहरसा से। क्वेक डॉक्टरफेक डॉक्टरसहरसा छोड़ों

आपके सहयोग से इस लड़ाई को बड़ा बनाया जा सकता है। सरकारी सिस्टम के कैंसर से भी लड़ना हैंजब आप वोट लेने हमारे घर तक आकर बूथ बनाते हैं और देश शीर्ष सत्ता तक पहुंचते है, पिछले अस्सी साल से हर पांच साल परतो इलाज के लिए दिल्ली पटना या मुम्बई क्यों? हमारे घर तक इलाज क्यों नहीं?  नेताओं को राजनीति क्या होती है? ये समझाना होगा इस लड़ाई में आपका साथ मिलेगा?”

Krishna Bihari Mishra

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