धन्य है धनबाद पुलिस, पहले तो रेप मामले में फंसे भाजपा नेता के बेटे को बचाने का प्रयास करती हैं, और फिर…

16 दिसम्बर धनबाद की एक घटना, शहर के एक होटल में निर्भया की बरसी पर एक कार्यक्रम आयोजित की जा रही है, उस कार्यक्रम में एक छात्रा ताल ठोक कर कह रही है कि उसकी सहेली के साथ कल ही यानी 15 दिसम्बर को, वह भी पुलिस थाने के समीप एक निर्माणाधीन इमारत में रेप किया गया, पर उसके परिवारवाले लोकलाज के भय से पुलिस के पास नहीं जा रहे।

16 दिसम्बर धनबाद की एक घटना, शहर के एक होटल में निर्भया की बरसी पर एक कार्यक्रम आयोजित की जा रही है, उस कार्यक्रम में एक छात्रा ताल ठोक कर कह रही है कि उसकी सहेली के साथ कल ही यानी 15 दिसम्बर को, वह भी पुलिस थाने के समीप एक निर्माणाधीन इमारत में रेप किया गया, पर उसके परिवारवाले लोकलाज के भय से पुलिस के पास नहीं जा रहे।

जैसे ही इस घटना का खुलासा होता है, धनबाद पुलिस हरकत में आती है, और इस घटना से संबंधित युवाओं को गिरफ्तार कर लेती है, जिसमें एक भाजपा नेता का पुत्र है तो दुसरा बीसीसीएल कर्मी का बेटा। जल्द ही पीड़िता और उसकी सहेली जिसने इस कांड का खुलासा किया था, पुलिस थाने में बुलाती है और लड़कियों पर दबाव बनाती है कि वह लिखकर दें कि रेप जैसी घटना घटी ही नहीं, और वह ऐसा लिखवाकर छात्रा का हस्ताक्षर भी ले लेती है, जबकि लड़कियां साफ कहती है कि ऐसा दबाव बनवाकर किया गया और पहले के आवेदन को फाड़ दिये गये, शायद लड़कियां और उनके परिवारवालों को लगता था कि जब सिस्टम ही गंदा है तो वे किससे-किससे लड़ेंगे।

इधर 18 दिसम्बर को एसएसपी पीड़िता और उसकी सहेली से अपने आवासीय कार्यालय में पुछताछ करते हैं और भूली ओपी प्रभारी प्रवीण कुमार को प्राथमिकी दर्ज करने का आदेश देते है, प्राथमिकी दर्ज करते ही, नये तरीके से कार्रवाई प्रारम्भ होती है और दोनों पकड़े गये युवकों को जेल भेज दिया जाता है। अब सवाल उठता है कि आखिर भूली ओपी पुलिस किसके दबाव में, आकर लड़कियों पर दबाव बना रही थी कि वह रेप का केस वापस ले लें और उसके साथ ऐसी घटना घटी ही नहीं, इसका लिखित आवेदन ले लिया?  क्या पुलिस का काम आरोपियों को बचाना है या पीड़िता को न्याय दिलाना है? क्या भाजपा नेताओं ने इसके लिए पुलिस पर दबाव बनाया था?  क्योंकि ऐसे मामलों में तो ऐसी बाते सामान्य सी हो जाती है, लेकिन इतना तो तय है कि जिस प्रकार की ऐसी घटना घट रही है, वह भाजपा जैसी पार्टियों के लिए तो गर्त में ले जानेवाली बात है।

इधर खुशी इस बात की है कि इस घटना को लेकर धनबाद के बुद्धिजीवियों ने एकरुपता दिखाई और इसको लेकर हाउसिंग कॉलोनी में एक विशेष बैठक की, तथा रेप के विरुद्ध कलम से जंग विषयक संगोष्ठी का आयोजन किया। बैठक में मुख्य रूप से साहित्यकार श्रीराम दूबे, वरिष्ठ समाजसेवी विजय झा, राजनीतिज्ञ  हरि प्रकाश लाटा,  गौतम मंडल, अनिल पाण्डेय, राम प्रवेश शर्मा, सादिक अमीन ने भाग लिया। श्रीराम दूबे का कहना था कि दुष्कर्म की घटना को जो भी लोग छुपाते हैं, चाहे वे पीड़िता के परिजन ही क्यों न हों, दुष्कर्म जैसे जघन्य अपराध को बढ़ावा ही देते हैं।

वरिष्ठ समाजसेवी विजय झा ने कहा कि दुष्कर्म की शिकार लड़कियों के परिवारों को यह समझना होगा कि यह एक सामाजिक अपराध है। सिर्फ उनके परिवार का मामला नही है। समाज उनके साथ है। ऐसी घटना किसी के भी साथ घट सकती है। संगोष्ठी में दो दिन पूर्व महिलाओं की एक सभा में एक छात्रा द्वारा अपनी  सहेली के साथ हुए दुष्कर्म की चर्चा पर संज्ञान भी लिया गया। बैठक में इस पर भी चिंतन व आक्रोश व्यक्त किया गया ।

श्रीराम दूबे ने स्वरचित एक लघु कथा भी पढ़ा। इसमें बताया गया कि एक गाँव में एक लड़की के साथ दुष्कर्म हुआ। पीड़िता को ही दोषी मान लिया गया।  उसके छुए हैंड पंप को लड़कियां धोने के बाद ही पानी भरती थी। इस गलत सोच में जो लड़की अगुवा थी, उसके साथ भी दुष्कर्म हुआ और उसने आत्महत्या कर ली।

हरि प्रकाश लाटा ने कहा कि इस प्रकरण पर जनजागरण की आवश्यकता है, ताकि पीड़िता और उसके परिवार को दुष्कर्मियों के विरुद्ध लड़ने का हौसला बने। गौतम मंडल ने कहा कि ऐसे विषयों पर लगातार गोष्ठियां होती रहनी चाहिए, ताकि गलत करनेवालों के खिलाफ समाज में एक वातावरण बने। अनिल पाण्डेय ने कहा कि असल यंत्रणा रेप के बाद शुरू होता है। कलम से ही पीड़िता सहित सभी लड़कियों को ताकत दी जा सकती है। जनजागरण हेतु छात्राओं और कामकाजी महिलाओं के बीच साहित्यिक पर्चा बांटने का कार्यक्रम करने का निर्णय भी लिया गया।

Krishna Bihari Mishra

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देश का दुर्भाग्य देखिये, आज का पत्रकार, पत्रकार न होकर राजनीतिक दल का कार्यकर्ता बन चुका है

Wed Dec 19 , 2018
जब पत्रकार, स्वयं को पत्रकारिता से न जोड़कर, राजनीतिक दल से जुड़ जाये और उक्त राजनीतिक दल या उसके आका या कार्यकर्ताओं की हर अच्छी या बुरी बातों पर बलिहारी जाये तो उसे क्या कहेंगे – पत्रकार या कार्यकर्ता। जाहिर है, ऐसे लोगों को सभी राजनीतिक दल का कार्यकर्ता या अंधभक्त ही कहेंगे। भारत में जितने भी टीवी चैनल्स या पोर्टल्स हैं या अखबार।

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