झारखण्ड के CM की बात तो यहां का जैक भी नहीं मानता, मारी पलटी, 400 करोड़ देने पर लगाई ब्रेक

जैक यानी झारखण्ड एकेडमिक कौंसिल के पास 450 करोड़ रुपये हैं, जिसमें 400 करोड़ रुपये कोषागार में जमा करने को जैक को कहा गया। सूत्र बताते है कि जैक ने मुख्यमंत्री के समक्ष हामी भी भरी, कि वह, राज्य कोषागार में 400 करोड़ रुपये जमा करा देगा, पर जैसे ही ये मुद्दा जैक यानी झारखण्ड एकेडमिक कौसिंल बोर्ड में उठा, सदस्यों ने राशि जमा करने से पहले कानूनी सलाह लेने की वकालत कर दी।

जैक यानी झारखण्ड एकेडमिक कौंसिल के पास 450 करोड़ रुपये हैं, जिसमें 400 करोड़ रुपये कोषागार में जमा करने को जैक को कहा गया। सूत्र बताते है कि जैक ने मुख्यमंत्री के समक्ष हामी भी भरी, कि वह, राज्य कोषागार में 400 करोड़ रुपये जमा करा देगा, पर जैसे ही ये मुद्दा जैक यानी झारखण्ड एकेडमिक कौसिंल बोर्ड में उठा, सदस्यों ने राशि जमा करने से पहले कानूनी सलाह लेने की वकालत कर दी।

आश्चर्य है कि जैक राज्य कोषागार से फायदा उठाता रहा है, उसका लाभ लेता रहा है, पर राज्य कोषागार में पैसा न जमाकर वह इतनी बड़ी राशि बैंकों में रख दे रहा है, जिससे राज्य का अपेक्षित विकास अवरुद्ध हो रहा है। जैक केवल अकेली स्वायत्त संस्था नहीं, बल्कि राज्य में ऐसी कई राज्य सरकार द्वारा संपोषित संस्थाएं हैं, जिनके पास ऐसी बड़ी राशि होने का अनुमान बताया जाता है, जिसकी रिव्यू बड़े पैमाने पर हो रही है, हो सकता है, वहां से भी ऐसी समाचार सुनने और देखने को मिले।

सूचना है कि योजना सह वित्त विभाग के संयुक्त सचिव अविनाश कुमार सिंह ने झारखण्ड एकेडमिक कौंसिल के अध्यक्ष डा. अरविन्द कुमार सिंह को राशि जमा कराने को लेकर एक पत्र लिखा था, पत्र में 400 करोड़ रुपये की राशि का भी जिक्र है, पर ये मामला जैसे ही जैक के बोर्ड में उठा, सदस्यों ने झारखण्ड एकेडमिक कौंसिल अधिनियम 2002 का जिक्र करते हुए कहा कि इसमें यह प्रावधान है कि राशि बैंक में जमा की जाये, ऐसे में इतनी बड़ी राशि को राज्य कोषागार में जमा करने के पूर्व कानूनी सलाह ले लें, क्योंकि झारखण्ड एकेडमिक काउंसिल एक स्वायत्त संस्था है।

कुछ अखबारों में जैसे ही ये समाचार आये कि राज्य सरकार ने जैक को 400 करोड़ रुपये ट्रेजरी में जमा करने को कहा है, लोगों ने इसका अर्थ ये लगा लिया कि राज्य सरकार दिवालिया हो गई है, और अब धन संग्रह करने के लिए इस स्तर पर उतर आई है, जबकि अर्थशास्त्रियों का कहना है कि जिस राज्य का 80,200 करोड़ का बजट हो, उसके लिए 400 करोड़ रुपये की ये मामूली राशि, ऊंट के मुंह में जीरा के बराबर है।

उनका ये भी कहना था कि हां, ऐसी छोटी या बड़ी राशि, जिस भी स्वायत्तशाषी संस्थाओं के पास है, और वे संस्थाएं राज्य सरकार द्वारा अनुप्राणित हैं, तो वहां की राशियों पर पहला हक उस राज्य का तथा वहां की जनता का है, आप ये कहकर कि हम स्वायत्तशासी संस्था है, इस राशि पर हम कुंडली मारकर बैठे रहेंगे, सही नहीं ठहराया जा सकता, आपको वो राशि राज्य सरकार को देने ही पड़ेंगे या राज्य सरकार विश्ष परिस्थितियों में ले भी सकती है।

सूत्रों की मानें तो इसमें कोई दो मत नहीं कि राज्य की अर्थव्यवस्था बुरी तरह चरमरा गई है, और राज्य सरकार को अर्थव्यवस्था को सही रास्ते पर लाने के लिए कड़े कदम भी उठाने होंगे तथा स्वयं की फिजूलखर्जी एवं हाथी उड़ाने जैसी योजनाओं को बंद करना होगा, नहीं तो स्थितियां और बिगड़ेंगी। लोकलुभावन योजनाओं पर भी ताले लगाने होंगे, क्योंकि अंततः इन बेकार की लोकलुभावन योजनाओं और स्वयं के लिए प्रचार-प्रसार पर खर्च होनेवाली राशियों से राज्य का ही भट्ठा बैठना तय है। सरकार इन बातों को जितना जल्द समझ लें, उतना ठीक है, पर उन्हें ऐसा कहीं दिखता नहीं है।

Krishna Bihari Mishra

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