देश का दुर्भाग्य देखिये, आज का पत्रकार, पत्रकार न होकर राजनीतिक दल का कार्यकर्ता बन चुका है

जब पत्रकार, स्वयं को पत्रकारिता से न जोड़कर, राजनीतिक दल से जुड़ जाये और उक्त राजनीतिक दल या उसके आका या कार्यकर्ताओं की हर अच्छी या बुरी बातों पर बलिहारी जाये तो उसे क्या कहेंगे – पत्रकार या कार्यकर्ता। जाहिर है, ऐसे लोगों को सभी राजनीतिक दल का कार्यकर्ता या अंधभक्त ही कहेंगे। भारत में जितने भी टीवी चैनल्स या पोर्टल्स हैं या अखबार।

जब पत्रकार, स्वयं को पत्रकारिता से न जोड़कर, राजनीतिक दल से जुड़ जाये और उक्त राजनीतिक दल या उसके आका या कार्यकर्ताओं की हर अच्छी या बुरी बातों पर बलिहारी जाये तो उसे क्या कहेंगे – पत्रकार या कार्यकर्ता। जाहिर है, ऐसे लोगों को सभी राजनीतिक दल का कार्यकर्ता या अंधभक्त ही कहेंगे। भारत में जितने भी टीवी चैनल्स या पोर्टल्स हैं या अखबार। उनमें प्रमुख पदों पर कार्यरत कोई भी व्यक्ति ही क्यों न हो, सभी किसी न किसी महत्वाकांक्षा को पूरा करने के लिए, अपनी जमीर तक को बेच खाये हैं, और इसके लिए किसी न किसी राजनीतिक दल से जुड़े हुए हैं।

ये राजनीतिक दल समय-समय पर इन्हें उपकृत भी करते रहते हैं, जैसे ही उनकी सत्ता आती है, ये किसी को राज्यसभा पहुंचवा देते हैं तो किसी के बेटे को किसी निजी अच्छी कंपनी में करोड़ों की वार्षिक पैकेज दिलवा देते है, कोई इन राजनीतिक दलों के नेताओं का सलाहकार बन जाता हैं तो कोई इनकी प्रेमिकाओं के लिए पाठ करनेवाला बहुत बड़ा साहित्यकार बन जाता है और इसी में भारत की करोड़ों जनता की भावनाओं के खिलवाड़ का सारा प्रबंध हो जाता हैं।

इस प्रकार के कांडों में सभी लिप्त हैं, आप किसी को एक को दोषी नहीं ठहरा सकते, क्या भाजपा, क्या कांग्रेसी, क्या समाजवादी, क्या वामपंथी, सब एक से एक हैं। आश्चर्य है कि जिन्हें आप पसंद कर रहे हैं, या जिसके बारे में आपको लग रहा है कि वो निरपेक्ष हैं, दरअसल वो सिर्फ आपकी आंखों का धोखा है, क्योंकि कब कौन सा रुप लेकर आपके सामने प्रस्तुत हो जायेगा, कुछ कहा नहीं जा सकता, उदाहरण एक से एक भरे पड़े हैं, उसकी चर्चा भी मैं करना नहीं चाहता।

कोई पत्रकार भाजपा की नाव में बैठा हैं तो कोई कांग्रेस के नाव में बैठा है तो कोई समाजवादी, बहुजनवादी, तो कोई वामपंथियों के नाव में बैठा है, जो जिस नाव में बैठा है, उसकी सुरक्षा में जी-जान से जुटा है, ऐसे में उसे अपनी नाव तो बहुत अच्छी लगती है पर दूसरे अन्य की नाव में छेद ही छेद दिखाई देती है, उसे लगता है कि वह और उसकी नाव सुरक्षित है, और जिस नाव में वह या उसके साथ लोग बैठे है, वे सुरक्षित हैं, बाकी किसी के नाव सुरक्षित नहीं हैं।

ऐसे भी जान लीजिये, भारत में जितने भी राजनीतिक दल है, उसके नीतियों और सिद्धांतों को देखिये, किसी में आपको खोट नहीं दिखाई देगा, पर उन दलों में जो लोग शामिल है, उसमें आपको नीचे से लेकर उपर तक घटियास्तर के इन्सान दिखाई देंगे, जो धनलोलुप, वासना में लिप्त तथा हर प्रकार के कुकृत्य करने तथा उसे ढकने में निपुण है, ऐसे में इन लोगों से देश के विकास की बात भी सोचना स्वयं को मूर्ख बनाने के बराबर है।

मैं तो कहूंगा कि आप ज्यादा दूर ही नहीं जाये, आप जहां जिस गांव या मुहल्ले या शहर मे रहते हैं, उस समाज को देखिये, और तुलना कीजिये कि 1947 के पहले का समाज कैसा था या लोग कैसे थे? और आज का समाज तथा लोग कैसे है?  दरअसल आज का समाज और लोग ही पतन के कगार पर है, ऐसे में आपका देश भी पतन का शिकार होगा, और हमारे नेता भी चूंकि इसी समाज से जाते है, इसलिए वे भी वैसे ही होंगे, इसलिए इस देश को भगवान भी अब नहीं बचा सकते, क्योंकि सभी नेता और यहां के लोग अपने परिवार-समाज तो दूर, अपनी पत्नी और प्रेमिकाओं से अधिक सोच ही नहीं रहे, ऐसे में देश की बात करना तो बेमानी होगी।

अब एक घटना देखिये, एक समाचार आई कि पाकिस्तान की जेल में छह साल गुजारने के बाद मंगलवार को हामिद निहाल अंसारी भारत लौट आया, दरअसल हामिद एक दोस्त से मिलने के लिए गैर कानूनी ढंग से अफगानिस्तान के रास्ते से पाकिस्तान में प्रवेश कर गया, अब होना क्या था, जैसा कि होता है, पाकिस्तानियों ने इसे भारतीय जासूस समझ लिया और इसे जेल में बंद कर प्रताड़ना देना शुरु कर दिया।

जैसे ही हामिद के परिवार वालों को पता चला, उसने भारत सरकार और विदेश मंत्रालय से संपर्क साधा, भारत सरकार ने खुलकर मदद की, पाकिस्तान सरकार के सामने इस मुद्दे को बार-बार उठाया, नतीजा सकारात्मक निकला, और हामिद आज भारत में हैं। इसके पूर्व हम आपको बता दें कि जैसे ही भारत की सरजमीं पर हामिद ने पैर रखे, उसने भारत की जमी को चूम लिया, जिस पर कुछ वामपंथी पत्रकारों ने चुटकी ली और कह डाला कि हामिद ने हिन्दुत्व की परीक्षा पास कर ली, यानी उन्होंने इस घटना को भी हिन्दू-मुसलमान से जोड़कर, अपनी घटियास्तर की मानसिकता का परिचय दे दिया।

इधर जब से कांग्रेस पार्टी ने मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में सफलता क्या प्राप्त कर ली, ज्यादातर पत्रकारों का झुकाव कांग्रेस की ओर हो गया, उन्हें लगता है कि अब केन्द्र में छह महीने के बाद कांग्रेस आ जायेगी, अब आयेगी कि नहीं आयेगी ये समय और भारत की जनता बतायेगी, जब वोट के दिन आयेंगे, पर आज ही की बात है पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने नरेन्द्र मोदी पर तंज कस दिया कि वे मीडिया से घबरानेवाले पीएम नहीं थे, और लीजिये कुछ पत्रकारों ने उनकी वाह-वाही, शुरु कर दी, अरे भाई भारत की मतदाता ने पीएम नरेन्द्र मोदी को या मनमोहन सिंह को मीडिया से बात करने के लिए तो वोट नहीं दिया था, भारत की जनता ने तो अपनी सेवा कराने के लिए तथा देश को बेहतर ढंग से चलाने के लिए वोट दिया था, ऐसे में मोदी मीडिया से बात करें या न करें, उससे आम जनता को क्या मतलब?

कमाल की बात है कि भारत की कौन ऐसी पार्टी है या वाद है, जो दूध की धूली है, अरे सरसो में ही जब भूत समा गया है तो अन्य जगहों पर जो भूत व्याप्त है, वो भूत जायेगा कैसे? इसलिए जब तक नये ढंग से परिवार और समाज को नहीं बेहतर बनाया जायेगा, जब तक यहां संस्कार और हाई मोरलिटी के लोग पैदा नहीं होंगे, देश और समाज कभी आगे नहीं बढ़ सकता। जिस देश में एक रुपये किलो चावल खानेवाले लोगों की संख्या, मुफ्त में तीर्थयात्रा करनेवालों की संख्या, मुफ्त में गैस कनेक्शन लेनेवालों की संख्या, मुफ्त में मोबाइल यूज करनेवालों की संख्या की तादाद बढ़ने लगे तो समझ लो, देश कितना आगे बढ़ा है, या बढ़ेगा।

जिस देश के लोगों की आबादी बढाने में बहुत आनन्द आता है, वह भी धर्म के नाम पर, क्योंकि परवरदिगार ने ऐसा ही करने को कहा है, जहां धर्म के नाम पर हर प्रकार के अपराध करने की विशेष छूट मिल जाती है, जहां लोग धर्मनिरपेक्षता को भी अपने-अपने चश्मे से देखते है, उस देश की अन्य देशों के सामने या वहां के नेताओं की अन्य देश के नेताओं के सामने औकात क्या?

और रही बात आज के पत्रकारों की, तो इन पत्रकारों को भारत की जनता बेपेंदी के लोटे से ज्यादा कुछ नहीं समझती, ये पत्रकार भी खूब समझते है, इसलिए ये आजकल नेताओं के साथ जोंक जैसे चिपककर, महानगरों में अपने रहने-जीने, खाने-पीने के लिए सात पुश्तों तक इंतजाम कर ले रहे हैं, पर जैसे ही ये आंख मूंदते हैं, इनकी कमाई पर दूसरों का कब्जा हो जाता है, क्योंकि भला धन का तो एक ही सिद्धांत है, जिसके पास गया, उसका हो गया, चाहे आपने नैतिकता से प्राप्त किया हो या अनैतिक तरीके से, अगर नैतिकता के आधार पर प्राप्त किया तो सोचना ही नहीं है, और अगर अनैतिक तरीके से कमाया है, तो निश्चित है कि आज न कल, देर-सबेर, उसे नष्ट हो ही जाना है।

Krishna Bihari Mishra

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