अपनी बात

मुकेश कुमार गुप्ता की मां का परलोकगमन व मृत्योपरांत निर्गुण की पुनर्जीवित होती परम्परा

मुकेश कुमार गुप्ता तीन भाई है। मुकेश कुमार गुप्ता बड़े हैं। दूसरे नंबर पर संजय कुमार गुप्ता और तीसरे नंबर पर अभिषेक कुमार गुप्ता। मैं संजय कुमार गुप्ता और अभिषेक कुमार गुप्ता को नहीं जानता। लेकिन मुकेश कुमार गुप्ता को जानता हूं। सामाजिक है। सामाजिकता में रुचि लेते हैं। केवल इन्हें बोलने की जरुरत है या इन तक आपकी बात पहुंचने तक की देर है। ये सभी की मदद करने में रुचि लेते हैं। खिलाने-पिलाने की बात हो तो ये सबसे आगे हैं। मैं जब भी इनसे मिला हूं। देखते ही मुस्कुरायेंगे। भले ही इनके ऊपर कितना भी कष्ट क्यों न हो?

हाल ही में इनकी मां देवन्ती देवी का निधन हुआ। ये ऐसा रोएं, जैसा कि एक अबोध बच्चा अपनी मां को न देख रोता है। विह्वलता ऐसी कि आज तक मैंने एक प्रबुद्ध व्यक्ति को ऐसा रोता नहीं देखा। हाल ही में उनकी मां का श्राद्ध था। वे मेरे घर आये निमंत्रण दिये, कहा कि आना है। मैं ऐसे भी कही जाने पर हिचकता हूं। लेकिन मुकेश कुमार गुप्ता का निमंत्रण था, सो जाना ही था। मैं विकेश कुमार सिन्हा जी के सौजन्य से, जहां श्राद्ध का कार्यक्रम था। वहां पहुंचा और जो वहां का दृश्य देखा। वो देखता ही रह गया। क्योंकि मैंने श्राद्ध के अवसर पर इस प्रकार का दृश्य नहीं देखा था।

पूर्व में आम तौर पर बिहार में जब किसी का निधन होता था, तो उस वक्त जब अंतिम यात्रा निकलती थी। तो गांवों या मुहल्लों में निर्गुण गानेवालों की मंडली हाथों में झाल-करताल तथा कमर में ढोलक बांधकर निर्गुण गाते चलती थी और इस प्रकार किसी की अंतिम यात्रा श्मशान घाट तक पहुंचती थी। इस अंतिम यात्रा में गाई जानेवाली निर्गुण बताती थी कि व्यक्ति का जन्म किसलिए हुआ है? उसे करना क्या है? कैसे अपने जीवन को गति देनी है और अंत में कैसे स्वयं को ईश्वर के साथ एकाकार कर लेना है और जो व्यक्ति ऐसा नहीं करता। उसे अंत में क्या कष्ट झेलना पड़ता है। फिर भी लोग इस ओर ध्यान न देकर, वहीं करते हैं, जो उनके मन को भाता है।

लेकिन अब गांवों व मुहल्लों में गाई जानेवाली ये निर्गुण और निर्गुण मंडलियां इस विकास के दौर में कब खत्म हो गई, पता ही नहीं चला। पर जैसे ही मुकेश कुमार गुप्ता के मां के श्राद्ध कार्यक्रम पहुंचा तो वो निर्गुण और निर्गुण गानेवाली मंडलियां दूसरे रूप में हमारे सामने थी। झाल-करताल की जगह आधुनिक वाद्ययंत्रों ने ले लिया था। पूर्व में गाई जानेवाली निर्गुण की जगह आधुनिक कलाकारों के निर्गुणों ने स्थान ले लिया था। लेकिन भाव करीब-करीब वहीं थे।

वहां पहुंच रहे लोग वहां बैठते और आराम से निर्गुण सुनते और बगल में ही भोजन की व्यवस्था थी। भोजन करते और अपने घर को लौटते। किसी ने ठीक ही कहा है कि कोई ये सोच ले कि कोई चीज समाप्त हो गई। वो समाप्त नहीं होती, बल्कि वो दूसरे रूप में हमारे सामने आ जाती है। मृत्यु भी यही है। लोग कहते है कि फलां व्यक्ति दुनिया से चला गया। लेकिन सच्चाई यही है कि वो दुनिया से चला गया तो फिर आयेगा भी।

लेकिन उसका रूप बदल जायेगा। जो पहचानने वाले भगवान कृष्ण की तरह होंगे या आध्यात्मिक रूप से उच्च अवस्था में रहनेवाले सिद्ध पुरुष होंगे, वे जान जायेंगे। पर सामान्य व्यक्ति उसे नहीं पहचान पायेंगा। सचमुच विलुप्त हो रही इस निर्गुण प्रथा को मुकेश कुमार गुप्ता ने जो नये तरीके से रांची की आम जनता के सामने प्रस्तुत किया। वो प्रंशसनीय होने के साथ-साथ अनुकरणीय भी है।

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