बिहार में राजद नेता तेजस्वी के बढ़ते राजनीतिक कद ने पलटीमार नेता नीतीश की बेचैनी बढ़ाई

नीतीश कुमार बेचैन है। उन्हें 2019 में लोकसभा की 25 सीटें चाहिए। वे अभी से ही एनडीए पर दबाव बनाने की राजनीति शुरु कर चुके है। उन्हें लगता है कि बिहार की जनता आज भी उन्हें उसी रुप में देख रही है, जैसा कि आज से पांच साल पहले देखा करती थी, जबकि ऐसा नहीं है। नीतीश कुमार ने बिहार की जनता का विश्वास बड़ी तेजी से खोया है।

नीतीश कुमार बेचैन है। उन्हें 2019 में लोकसभा की 25 सीटें चाहिए। वे अभी से ही एनडीए पर दबाव बनाने की राजनीति शुरु कर चुके है। उन्हें लगता है कि बिहार की जनता आज भी उन्हें उसी रुप में देख रही है, जैसा कि आज से पांच साल पहले देखा करती थी, जबकि ऐसा नहीं है। नीतीश कुमार ने बिहार की जनता का विश्वास बड़ी तेजी से खोया है। यहीं कारण है कि जदयू को चाहे लोकसभा के उपचुनाव हो या बिहार विधानसभा के उपचुनाव हर जगह उसे हार का सामना करना पड़ रहा है।

मात्र तीन साल में ही दो-दो बार पलटी मारने की नीतीश की मनोवृत्ति ने उनके उपर विश्वास का एक प्रश्न चिह्न भी खड़ा कर दिया है। यहीं कारण है कि जदयू में कई ऐसे बड़े नेता हुए, जिन्होंने जदयू से खुद को किनारा कर लिया। उसमें बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री जीतन कुमार मांझी तो दूसरे शरद यादव भी हैं। अभी बिहार में जदयू के पास वहीं नेता है, जो नीतीश कुमार की ठाकुरसोहाती में लगे है, जिसने भी नीतीश कुमार को आइना दिखाने की कोशिश की, नीतीश ने उन्हें अपमानित करके निकाला, शायद नीतीश कुमार को लगता था कि बिहार की जनता उन पर विश्वास करती है, इसलिए वे जिसे चाहेंगे नेता या विधायक बना देंगे, पर इन दिनों तेजी से राजद की ओर जनता का बढ़ता झुकाव, नीतीश के लिए खतरे की भी घंटी है।

आज लालू प्रसाद यादव के जेल में रहने के बाद, जिस प्रकार नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी प्रसाद यादव ने राजनीति में अपनी भूमिका तय करनी शुरु कर दी, उससे बिहार को तेजस्वी प्रसाद यादव के रुप में नया तेजतर्रार नेता मिल चुका है, जिसे बिहार की जनता और वहां के प्रमुख राजनीतिक दलों ने भी स्वीकार कर लिया है। आप लालू प्रसाद को भ्रष्टाचार के मामले में उन्हें कटघरे में रख सकते है, पर तेजस्वी पर जब भ्रष्टाचार का आरोप लगायेंगे तो शायद ही बिहार की जनता आपकी इस बात को स्वीकार करें।

बिहार में भाजपा की स्थिति तो नीतीश भरोसे है, और जब नीतीश पर ही संकट हैं तो भाजपा की क्या स्थिति होगी? समझते रहिये। रही बात नरेन्द्र मोदी के नाम पर भाजपा को वोट मिलने की, तो भाजपा के नेता को यह मान लेना चाहिए कि बिहार विधानसभा में आये चुनाव परिणाम ने भाजपा के बड़े नेताओं को बता दिया है कि बिहार की जनता को, अब भाजपा से कितना प्रेम है। ले- देकर अब बिहार में जब भी चुनाव होंगे, वे चाहे लोकसभा के हो या विधानसभा के, राजद ही वहां बड़ी पार्टी के रुप में उभरेगी, न की नीतीश की पार्टी। भाजपा नरेन्द्र मोदी के नाम पर कुछ सीटें निकाल भी लें, पर भाजपा में खासकर बिहार में ऐसा कोई नेता नहीं, जो अपनी सीटें भी निकाल सकें।

नीतीश कुमार जिन मुसलमानों के वोट पर अपना अधिकार समझ रहे थे, उन्हें मालूम होना चाहिए कि जोकीहट चुनाव में मुसलमानों ने उन्हें अपना नेता मानने से इनकार कर दिया है, ऐसे में यादव-मुस्लिम गठजोड़ पर राजद ने अपना एकाधिकार पुनः स्थापित कर लिया है, ऐसे में नीतीश कुमार यह सोचते होंगे कि वे एक बार फिर बिहार में सशक्त नेता के रुप में उभर कर केन्द्र या किसी अन्य दल को प्रभावित कर देंगे, तो वे मुगालते में है।

अब बिहार में राजद और उसके नेता तेजस्वी प्रसाद यादव हैं, लालू प्रसाद यादव को भी अब समय ने स्वयं किनारा कर दिया है। वक्त बहुत तेजी से बदल रहा हैं. लालू-नीतीश आनेवाले चुनाव में समाप्ति के कगार पर है। नया चेहरा तेजस्वी के रुप में बिहार देखना चाह रहा है, कल अगर बिहार में तेजस्वी प्रसाद यादव मुख्यमंत्री के रुप मे दिखाई पड़े तो ये अतिश्योक्ति नहीं होगी, क्योंकि बिहार की जनता अब  इस बार न तो पलटीमार नीतीश कुमार को पसंद करने के लिए तैयार है और न ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को।

2014 में जिस भाजपा ने 22 सीटें और उसकी सहयोगी पार्टियां लोकजनशक्ति पार्टी 6 तथा रालोसपा ने 3 सीटें जीती थी, 2019 में भी वह यहीं प्रदर्शन कर लेगी, संभव नहीं हैं और जदयू जो 2 सीटें जीती थी, वह चाह लेगी कि वह इससे अधिक सीटें जीत लेगी, तो ये भी संभव नहीं है, हां पर राष्ट्रीय जनता दल अपनी चार सीटों से इतनी सीटें जरुर बढ़ा लेंगी, जिसे देखकर राजनीतिक विश्लेषक भी चौक जायेंगे क्योंकि बिहार की जनता की नजरों में तेजस्वी पहले स्थान पर तथा उसके बाद ही कोई नेता बिहार की जनता को नजर आ रहा है।

एक बात और बिहार में भाजपा को रसातल में ले जाने के लिए अगर कोई भाजपा का नेता सर्वाधिक जिम्मेवार है तो वे है भाजपा नेता, उप मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी, जिन्हें नीतीश कुमार में तो नूर नजर आता है, पर बिहार भाजपा में उन्हें कोई नेता पसंद नहीं, जो बिहार में भाजपा को मजबूत कर सकें। दूसरी ओर भाजपा में बढ़ती जातिवाद की राजनीति भी भाजपा को मिट्टी में मिलाने के लिए तैयार है, क्योंकि आम जनता अब यहीं मानती है कि जब जाति की ही राजनीति करनी है तो राजद उसमें गलत कहां हैं, इसलिए अब बहकावे में, बिहार की जनता नहीं आनेवाली, सबको सबक सिखायेगी, 2019 के लोकसभा चुनाव  में, बस इंतजार करिये, और क्या?

Krishna Bihari Mishra

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