त्रिपुरा में मिली अपार सफलता से गदगद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का नया डायलॉग सुनिये…

त्रिपुरा में मिली अपार सफलता से गदगद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का नया डायलॉग सुनिये… डूबते सूरज का रंग लाल और उगते सूरज का रंग केसरिया होता है, जबकि हमने छठी कक्षा में संस्कृत की कक्षा में अपने संस्कृत शिक्षक के मुख से यहीं सुना था –

“सम्पत्तौ च विपत्तौ च महतामेकरुपता। उदये सविता रक्तो रक्तःश्चास्तमये तथा।।”

सम्पत्ति आये या सम्पत्ति चली जाये, जो विद्वान हैं, दोनों अवस्थाओं में एक समान दीखते हैं, ठीक उसी प्रकार सूर्य उदय हो रहा हो या अस्त, दोनों अवस्थाओं में लाल ही दिखाई पड़ता है। कुछ विद्वान इस संस्कृत के श्लोक को दूसरी तरह से बोलते हैं।

“उदेति सविता ताम्र ताम्र एवास्तमेति च। सम्पत्तौ च विपत्तौ च महतामेकरुपता।।”

सूर्य उदय काल तथा अस्तकाल में लाल ही होता है, उसी प्रकार प्रत्येक व्यक्ति को सुख-दुख में समभाव में रहना चाहिए, पर हमारे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी को देखिये, त्रिपुरा में उन्होंने वामपंथी ईमानदार मुख्यमंत्री माणिक सरकार की सरकार को पराजित क्या कर दिया? धइले नहीं धरा रहे हैं। खूब उछल रहे हैं। उनके पांव जमीन पर नहीं हैं, दिये जा रहे हैं, और जब प्रधानमंत्री ही इस उपलब्धि पर धइले नहीं धरा रहे हैं तो उनके भक्त लोग क्या करेंगे? वे तो उछलने का रिकार्ड तोड़ने पर लगे हैं, जबकि होना यह चाहिए कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को इसे सामान्य रुप से लेना चाहिए, तथा त्रिपुरा की जनता को इसके लिए साधुवाद देना चाहिए और फिर सेवा भाव से लग जाना चाहिए।

हमें लगता है कि भारत के पहले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी होंगे, जो नगर-निगम और नगरपालिका की चुनाव में जीत मिलने पर भी इसी प्रकार का धमाल दिखाते हैं, जबकि हमें यह नहीं भूलना चाहिए, कि इस देश में प्रधानमंत्री के रुप में पं. जवाहर लाल नेहरु, लाल बहादुर शास्त्री, इंदिरा गांधी, मोरारजी देसाई, राजीव गांधी, पी वी नरसिम्हा राव, अटल बिहारी वाजपेयी, एच डी देवेगौड़ा, मनमोहन सिंह जैसे लोग भी इस देश का नेतृत्व कर चुके हैं। जिन्होंने जीत हो या हार, जीत होने पर न ज्यादा उछल-कूद दिखाई और न ही हारने पर मन में मलिनता।

खैर, अपनी-अपनी सोच हैं, किसी को उछलने-कूदने में ही आनन्द आता हैं, और किसी को जिम्मेवारी का निर्वहण करने पर। ऐसे भी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के इस उछल-कूद पर, प. बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने उन्हें करारा जवाब दिया है, जैसे उन्होंने कहा “कभी-कभी तिलचट्टा भी पंख लगाकर मोर बनना चाहता है। ऐसे राज्य त्रिपुरा में जीत पर खुश होने की बात नहीं है, जहां महज 26 लाख मतदाता हैं और दो संसदीय सीट है। साथ ही वोटों का अंतर केवल पांच फीसदी है।“

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को यह नहीं भूलना चाहिए कि इसी वर्ष कर्णाटक, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में विधानसभा चुनाव होने हैं, जो बड़े राज्य हैं। हाल ही में राजस्थान और मध्यप्रदेश में लोकसभा और विधानसभा के उपचुनाव हुए, उसमें यहां की जनता ने भाजपा का सुपड़ा साफ कर, अपना दृष्टिकोण स्पष्ट कर दिया हैं, राजनीतिक पंडितों की माने, तो यहां जब भी चुनाव होंगे, मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की वापसी तय हैं, ऐसे में 2019 में इन्हीं की सरकार बनेगी, ये ख्याली पुलाव पकाना जितना जल्द छोड़ दे, उतना ही अच्छा हैं।

रही बात, अगर वे यह सोचते हैं कि इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन में छेड़छाड़ कर मतों का अपहरण कर लेंगे, तो वे मुगालते में हैं, क्योंकि परीक्षा में चोरी भी वहीं बच्चा बढ़िया से करता हैं, जो थोड़ा-बहुत भी पढ़ा होता हैं, फिलहाल स्थिति यह है कि नरेन्द्र मोदी की सारी चालाकी को जनता धीरे-धीरे भांप चुकी हैं, वह इंतजार कर रही है, 2019 का, जब लोकसभा के चुनाव होंगे और देश की जनता मतदान द्वारा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तथा उनके सर्वाधिक प्रिय अमित शाह को राजनीतिक अवकाश पर गुजरात भेजकर, थोड़ा सुकुन की सांस लेगी, तब तक के लिए भाजपा के सभी धुरंधरों को उछलने-कूदने की पूरी इजाजत हैं।

ऐसे भी हर कोई यह जान लें, पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को 2004 में यहीं भरोसा था, जो घमंड हमारे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को घर कर गया हैं, और कैसे 2004 में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार की हवा निकल गई? वो सबको पता हैं। अरे, 2004 में इतना भरोसा तो कांग्रेस को भी नहीं था कि वह सत्ता में आयेगी, पर जब जनता ने परिणाम दिया तो सभी हक्के-बक्के थे, यानी जितने हक्के-बक्के अटल बिहारी वाजपेयी, उतने ही हक्की-बक्की सोनिया गांधी की टीम, इसलिए 2019 का इंतजार करिये, और तब तक के लिए भाजपा के सभी महानों से महान धुरंधरों को त्रिपुरा की जीत की खुशी में रसगुल्ले चाभने दीजिये।