स्पीकर दिनेश उरांव ने खोया विश्वास, विपक्षी नेताओं ने बैठक को किया नजरदांज

जिस राज्य का विधानसभाध्यक्ष सदन के प्रति समर्पित न होकर, सत्तारुढ़ दल के प्रति समर्पित हो जाता है, वह विधानसभाध्यक्ष अपना सम्मान ही नहीं खोता, बल्कि वह पूरे सदन का विश्वास भी खो देता है, जिसका परिणाम है, स्पीकर द्वारा बुलाये गये बैठक का विपक्षी दलों द्वारा नजरंदाज करना, उसमें शामिल न होना या कह लीजिये कि एक तरह से विपक्षी दलों ने बहिष्कार ही कर दिया।

जिस राज्य का विधानसभाध्यक्ष सदन के प्रति समर्पित न होकर, सत्तारुढ़ दल के प्रति समर्पित हो जाता है, वह विधानसभाध्यक्ष अपना सम्मान ही नहीं खोता, बल्कि वह पूरे सदन का विश्वास भी खो देता है, जिसका परिणाम है, स्पीकर द्वारा बुलाये गये बैठक का विपक्षी दलों द्वारा नजरंदाज करना, उसमें शामिल न होना या कह लीजिये कि एक तरह से विपक्षी दलों ने बहिष्कार ही कर दिया।

आगामी 16 जुलाई से झारखण्ड विधानसभा का मानसून सत्र प्रारम्भ होने जा रहा हैं, आम तौर पर हर राज्य का विधानसभाध्यक्ष किसी भी सत्र का आहूत करने के एक-दो दिन पूर्व सत्तापक्ष और विपक्ष के नेताओं को बुलाकर बैठक करता है, तथा सदन गंभीरतापूर्वक कैसे चले? इसके लिए सुझाव मांगता हैं, उन सुझावों पर कैसे अमल हो? उस पर विचार करता हैं, पर शायद ये पहला मौका है कि विपक्षी दलों के नेताओं ने विधानसभाध्यक्ष के इस बैठक में शामिल होना, उतना जरुरी नहीं समझा।

कल की बैठक में सत्तापक्ष से मंत्री नीलकंठ सिंह मुंडा, आजसू नेता व मंत्री चंद्रप्रकाश चौधरी तथा विपक्ष से बसपा के एकमात्र नेता शिवपूजन कुशवाहा ही शामिल हुए, जबकि नेता प्रतिपक्ष हेमन्त सोरेन, झाविमो के प्रदीप यादव, मासस के अरुप चटर्जी, भाकपा माले के राजकुमार यादव, कांग्रेस के आलमगीर आलम ने इससे दूरियां बनाई।

सच्चाई यह है कि विपक्ष को लगता है कि स्पीकर सदन को ठीक से नहीं चला रहे, और उनका ध्यान सत्तापक्ष की ओर विशेष रहता हैं, वे उसकी खुलकर मदद करते हैं, आपको याद होगा कि इसी तरह का गंभीर आरोप सदन में ही नेता प्रतिपक्ष हेमन्त सोरेन ने स्पीकर पर लगाया था। पिछले साढ़े तीन सालों से झाविमो के विधायकों द्वारा दलबदल कर भाजपा में शामिल होने का मामला स्पीकर की अदालत में चल रहा हैं, लेकिन इसका हल निकालने में स्पीकर असमर्थ साबित हो रहे हैं, जिसका फायदा स्पष्ट रुप से सत्तारुढ़ दल को मिल रहा हैं।

एक साल बाद चुनाव होने हैं, ऐसे में तो क्लियर है कि स्पीकर जितना दिन इस मामले को अपने अदालत में लटकायेंगे, भाजपा को फायदा मिलेगा, झामुमो के विधायकों के खिलाफ जैसे ही अदालत से फैसला आता है, उनकी विधायकी को खत्म करने में जितनी उत्सुकता स्पीकर दिनेश उरांव दिखाते है, उतनी उत्सुकता तो कहीं नहीं दिखती, जब स्पीकर इस प्रकार से सदन में कार्य करेंगे तो भला विपक्ष स्पीकर पर विश्वास क्यों करें? उनकी बात क्यों सुने?

शायद यहीं कारण रहा कि विपक्ष ने स्पष्ट रुप से स्पीकर द्वारा बुलाई गई मीटिंग से स्वयं को दूर कर लिया, यह सोचकर कि करेंगे आप अपने मन की, करेंगे आप वहीं जो सत्तारुढ़ दल आपसे करायेगा, ऐसे में हम आपकी मीटिंग में जाकर अपना और आपका समय क्यों बर्बाद करें? यहीं नहीं विपक्ष ने एक तरह से सत्तारुढ़ दल को भी संकेत दे दिया कि झारखण्ड विधानसभा का मानसूत्र सत्र उनके लिए भी सरदर्द ही साबित होगा, क्योंकि भूमि अधिग्रहण संशोधन विधेयक को लेकर, संपूर्ण विपक्ष भाजपा सरकार को माफ करने के पक्ष में नहीं।

Krishna Bihari Mishra

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