तो क्या कंबल घोटाले की रुपरेखा पहले से ही तैयार कर ली गई थी?

27 मार्च 2017 को वाक्-इन-इन्टरव्यू के माध्यम से झारक्राफ्ट में आयोजित मुख्य कार्यपालक पदाधिकारी के पद के लिए 32 आवेदकों ने आवेदन किया था। जिसमें से पांच उम्मीदवारों को वाक् इन इन्टरव्यू के माध्यम से चुना गया। रेणु गोपीनाथ पणिण्कर की शैक्षिक योग्यता मुख्य कार्यपालक पदाधिकारी पद के लिए वाक् इन इन्टरव्यू के समय में मात्र बैचलर ऑफ आर्टस थी। बताया जाता है कि रेणु गोपीनाथ पणिण्कर का उनके मुख्य कार्यपालक पदाधिकारी के कार्यकाल के दौरान समेकित वेतन एक लाख अस्सी हजार रुपये प्रति माह था।

जिन पांच लोगों को वाक्-इन-इन्टरव्यू के लिए चुना गया, उनकी शैक्षिक योग्यता और उनके अनुभवों को देखे, तो रेणु गोपीनाथ पणिण्कर कही नहीं ठहरती। जैसे रवि शंकर की योग्यता को देखे – जनाब इन्टरनेशनल फैशन बिजनेस डेवलेपमेन्ट एंड मैनेजमेन्ट में पोस्ट ग्रेजुएट और फैशन टेक्नोलोजी में मास्टर डिग्री तथा इनके पास उस वक्त 16 साल का अनुभव भी था।

यतीन कुमार सुमन – जनाब, पीजीपी (स्ट्रेटजी एवं पब्लिक पॉलिसी) और इनके पास अनुभव 13 साल का था। शिव प्रताप वर्मा की योग्यता थी एमबीए (मार्केटिंग) डिप्लोमा इन होटल मैनेजमेन्ट केटरिंग टेकनोलॉजी एंड अप्लाइड न्यूट्रिशन और अनुभव 20 वर्ष का था। पंकज चटर्जी की योग्यता थी 1. डिप्लोमा इन होटल मैनेजमेन्ट, केटरिंग एंड अप्लाइड न्यूट्रिशन 2. एमबीए-एचआरएम तथा अनुभव 15 सालों का था, जबकि सबसे कम योग्यता केवल बीए थी रेणु गोपीनाथ पणिण्कर, तथा अनुभव 17 साल, वो उस वक्त बताई थी।

अब सवाल उठता है कि इतनी कम योग्यता को झारक्राफ्ट ने इतने महत्वपूर्ण पद के लिए क्यों और कैसे चूना? क्या खासियत झारक्राफ्ट के लोगों ने देखी? आम तौर पर देखा जाता है कि जहां भी इस प्रकार की नियुक्तियां होती हैं, पहले से ही तय कर लिया जाता है कि किसे उक्त पद पर लाना हैं, और बाकी सारे काम उससे संबंधित केवल कोरम पूरा करने के लिए कर दिये जाते हैं, क्या यह भी इसीलिए किया गया था और उक्त महत्वपूर्ण पद पर रेणु गोपीनाथ पणिण्कर को बैठा दिया गया। ये अलग बात है कि झारक्राफ्ट में कंबल घोटाला जब उजागर हुआ तो रेणु गोपीनाथ पणिण्कर ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया तथा जाते-जाते कई विवादों को भी जन्म दे गई।

ज्ञातव्य है कि पिछले साल महालेखाकार ने अपने रिपोर्ट में इस बात का खुलासा किया था कि झारक्राफ्ट ने बिना कंबल बनाये ही कंबल का वितरण दिखा दिया, जो पिछले साल राज्य सरकार के लिए यह किरकिरी का कारण बन गया था। महालेखाकार ने अपने रिपोर्ट में इस बात का जिक्र किया था कि बुनकर सहकारी समितियां और एसएचजी ने अपनी क्षमता से कई गुणा कंबल बुन दिये, वह भी ऐसे समय में जब उन संस्थाओं के पास न तो कंबल बुनने के लिए करघे थे और न ही लूम।

जैसे ही यह मामला महालेखाकार द्वारा उजागर हुआ एमडी के रवि कुमार और रेणु गोपीनाथ पणिण्कर आपस में उलझ पड़े, हालांकि राज्य सरकार ने इस पूरे मामले के जांच के आदेश दिये हैं, तो क्या इस पर भी जांच होगा कि सबसे कम योग्यता वाले को झारक्राफ्ट के सीइओ पद पर कैसे बिठा दिया गया? ऐसे भी यह मामला सामान्य नहीं हैं, क्योंकि विपक्ष बार-बार इस मुद्दे को जनता के बीच रख रहा हैं और इस मुद्दे पर जनता भी सरकार को कटघरे में रख रही हैं।