संतोष जो कल पत्रकार थे, आज डाक्टर बन न्यूरो पंचकर्म थेरेपी पद्धति से लोगों को जीवन दे रहे हैं

संतोष कुमार नहीं साहेब, डा. संतोष कुमार कहिये। इन्होंने गजब कर डाला है, जब पत्रकार थे, तब भी गजब ही करते थे, नेता बने तब भी गजब ही करते थे और लीजिये जब से डाक्टरी संभाली है, तब से बहुत सारे लोगों को इन्होंने जीवन दे दी हैं, शुरु से ही जुनूनी रहे संतोष ने स्वयं को इस प्रकार बदला है, कि मैं सोच भी नहीं सकता कि किसी की जिंदगी में इस प्रकार के बदलाव भी आ सकते है।

डा. संतोष कुमार, रांची के लोवाडीह चौक में स्थित स्वर्णरेखा अपार्टमेन्ट में रहते हैं और इनके पास काफी संख्या में लोग, जो सुगर, बीपी, कोलेस्ट्रोल की मात्रा बढ़ने, अर्थराइटिस, साइटिका, साइनस, माइग्रेन, हाथ-पांव का दर्द, घुटनों का दर्द, रीढ़ की हड्डी के नस का अपने स्थान से हट जाने के शिकार हैं, आते रहते हैं और संतोष इन सारी बिमारियों को जड़ से मिटा देते हैं।

इनके हाथों से बड़ी संख्या में मुंबई में रह रहे हिन्दी/भोजपुरी फिल्मों के अभिनेता/अभिनेत्री, नेता व पत्रकार आदि अपनी समस्याओं से निजात पा चुके हैं, जिसके कारण पूरे देश में इन्होंने काफी लोकप्रियता हासिल कर ली है। अब इनके पास समय का भी अभाव हो चला है, फिर भी ये लोगों को सेवा देने से पीछे नहीं हट रहे।

संतोष ने आज विद्रोही24.कॉम को बताया कि वे जब से उत्तराखण्ड स्थित महामृत्युंजय आरोग्य संस्थान के डा. सुशील जोशी, उप-कुलपति गुरुकुल विश्वविद्यालय, उत्तराखण्ड से मिले। मिलने के साथ ही आयुर्वेदिक न्यूरो पंचकर्म थेरेपी पद्धति का लाभ जाना। संतोष ने बताया कि डा.सुशील जोशी ने ही उन्हें स्कॉटलैंड भेजा, जहां उन्होंने छह महीने की ट्रेनिंग ली।

संतोष ने बताया कि उन्हें आश्चर्य हुआ कि भारत की पुरानी पद्धति जिसका लाभ भारतीयों और भारतीय चिकित्सकों को मिलना चाहिए, वो पद्धति स्कॉटलैंड में पुनर्जीवित होकर, भारत में आ रही है। संतोष की पत्नी डा. अम्बिका सिंह, स्वयं एक सुप्रसिद्ध आयुर्वेदिक चिकित्सिका है, और फिलहाल रांची स्थित इएसआई अस्पताल में कार्यरत है। डा. संतोष कुमार का कहना है कि उनके कार्य में तथा इस ओर लाने में उनकी पत्नी की प्रमुख भूमिका रही है।

संतोष का कहना है कि जब उनके पिताजी  सरकारी सेवा से अवकाश प्राप्त किये, तब उन्हें पच्चीस लाख रुपये मिले थे, जिसमें पन्द्रह लाख उन्होंने गृह निर्माण में खर्च किये और बाकी दस लाख अपने रोग पर खर्च कर दिये, तब भी उन्हें बचाया नहीं जा सका। वे बताते है कि बीमारी भी कोई ऐसी नहीं थी, कि उससे उनकी जान चली जाये, पर आधुनिक मंहगी चिकित्सा पद्धति और आज के डाक्टरों द्वारा मरीजों और उनके परिजनों को ग्राहक समझकर पैसा ऐठने की प्रवृत्ति ने उनके पिताजी की जान ले ली।

तभी उन्होंने सोचा कि वे सामान्य बीमारी जिससे लोगों का जीवन दूभर हो जाता हैं, जिसका इलाज आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति न्यूरो पंचकर्म थेरेपी में मौजूद है, इसके द्वारा लोगों का भला करेंगे, और उन्हें खुशी है कि अब तक उन्होंने स्वयं अपने हाथों से बहुत ही कम समय में दो सौ से ज्यादा लोगों को लाभ दिलवाया, जिससे सभी खुश हैं और लोग नाम भी ले रहे हैं।