कहीं राहुल डोकलाम मामले में दुसरा नेहरु बनने की तैयारी तो नही कर रहे…

अब सवाल उठता है कि जब आप चीन के राजदूत से मिले तो फिर आपने इसे छुपाने की कोशिश क्यों की? आखिर भारत में चीन के दूतावास की ओर से सोमवार को यह दावा क्यों किया गया कि कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने आठ जुलाई को चीनी राजदूत लू झाओहुई से मिले? आखिर चीनी दूतावास ने इस मुलाकात को सार्वजनिक करने के बाद अपने वेबसाइट से इस समाचार को क्यों हटाया?

कांग्रेस के एक बहुत बड़े नेता है – राहुल गांधी। कुछ लोग सोशल साइट पर, इन्हें पप्पू के नाम से भी पुकारा करते है, अपनी हरकतों से ये हमेशा सुर्खियों में रहते है। कभी-कभी कुछ अच्छी बातें भी बोल लेते है, लेकिन आम तौर पर इनकी हरकतें 60-70 की दशक के हास्य कलाकार जैसे – धूमल, राजेन्द्र नाथ, जगदीप, असरानी की तरह होती है, संसद हो या संसद से बाहर, इनकी हरकतों से स्वयं कांग्रेस के बड़े नेता भी हैरान रह जाते है, लेकिन चूंकि कांग्रेस के बहुत बड़े नेता है, इसलिए ये बेचारे न चाहकर भी राहुलभक्ति में राहुल का गुणगान करने को बाध्य रहते है। फिलहाल जनाब नानी के यहां से लौटकर आये है, ननिहाल के लोगों ने जरुर कुछ बुद्धि दिया होगा और उस बुद्धि का कमाल आते ही आते इन्होंने दिखा दिया।

झूठ बोलने और बातों को छुपाने  में माहिर है राहुल

भारत और भूटान ही नहीं पूरे विश्व के एक दो देशों को छोड़कर सारा देश चीन की कुटिल नीति को जानता है कि वह कैसे अपने पड़ोसियों के साथ कुटिल व्यवहार कर अपनी साम्राज्यवादी सोच को जमीन पर उतारने का प्रयास कर रहा है, पर राहुल गांधी को इससे कोई मतलब नहीं, उनकी अपनी सोच है, झूठ बोलने में माहिर है, नहीं पकड़ाये तो उनका झूठ सच भी हो जाता है और जब पकड़ में आ गये तो बेशर्मी से कहेंगे, कि हां हमने ऐसा किया।

चीन के राजदूत से मुलाकात

ताजा उदाहरण है, राहुल गांधी ने भारत भूटान चीन सीमा पर स्थित डोकलाम पर जारी तनाव के बीच भारत में चीन के राजदूत से मुलाकात की। पहले तो जैसा कि होता है, कांग्रेसियों का आजकल चरित्र बन चुका है, कांग्रेसियों ने कहा कि उनके नेता राहुल गांधी ने चीन के राजदूत से मुलाकात नहीं की, पर जैसे ही सच्चाई उभर कर सामने आयी, कांग्रेसियों ने पलटी मार ली और कह दिया, कि हां राहुल गांधी चीन के राजदूत से मिले और यह शिष्टाचार मुलाकात थी। स्वयं राहुल गांधी ने भी स्वीकार किया कि वे चीन के राजदूत से मिले।

अब सवाल उठता है कि

  • जब आप चीन के राजदूत से मिले तो फिर आपने इसे छुपाने की कोशिश क्यों की?
  • आखिर भारत में चीन के दूतावास की ओर से सोमवार को यह दावा क्यों किया गया कि कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने आठ जुलाई को चीनी राजदूत लू झाओहुई से मिले?
  • आखिर चीनी दूतावास ने इस मुलाकात को सार्वजनिक करने के बाद अपने वेबसाइट से इस समाचार को क्यों हटाया?

यह तीन सवाल ही बता देता है कि राहुल गांधी का चीन के राजदूत से मिलना और इस बात को राहुल गांधी और कांग्रेसियों द्वारा छूपाने की कोशिश करना क्या कह रहा है? यह पूरा मामला ही संदेह को जन्म देता है, तथा राहुल गांधी की गतिविधियों पर शक उत्पन्न करता है।

पकड़े जाने पर इनके नेता बड़ी ही बेशर्मी से कह रहे है कि यह सद्भावना मुलाकात थी, तो फिर इस सद्भावना मुलाकात को छुपाया क्यों? भला सद्भावना की बात को भी आजकल छुपाने की जरुरत पड़ रही है, बेशर्मी की हद होती है भाई। क्या यहां की जनता इतनी मूर्ख है, जो राहुल गांधी और उनके नेता के हृदय में चल रहे उछल-कूद को नहीं समझ रही, अगर कांग्रेसी यह समझ रहे है कि राहुल गांधी की इन हरकतों से आम जनता इत्तेफाक नहीं रखती, तो वह भूल कर रही है।

कमाल है, देश की सेना, विपरीत परिस्थितियों में अपनी सीमा पर तैनात है, सैनिक अपने परिवार से कोसों दूर सीमा पर डटे हैं और अपने देश का नेता, कुर्सियों के लिए अपने दुश्मनों के घर जाकर यह पूछ रहे हैं कि जनाब आप कैसे है?  मैं राहुल गांधी, सद्भावना मुलाकात के तहत आपसे आपका कुशलक्षेम पूछने आया हूं। हद हो गई, चीन की वामपंथी सरकार भी सोचती होगी कि यह कैसा देश है और कैसे इसके नेता है? जो अपने ही देश को नीचे ले जाने में, उसकी इज्जत लूटवाने में रुचि रखते है। भारतीय जनमानस ध्यान रखें, याद करिये 1962 कहीं, राहुल गांधी, दूसरा नेहरु बनने की तैयारी तो नहीं कर रहा।

Krishna Bihari Mishra

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