राज्यपाल व जनदबाव के आगे झूकी रघुवर सरकार, CNT-SPT संशोधन प्रस्ताव पूर्णरुपेण वापस

और अंततः रघुवर सरकार सीएनटी-एसपीटी एक्ट मामले में बैकफूट पर चली गई। विपक्ष के दबाव और जनजातीय परामर्शदातृ पर्षद द्वारा बार-बार संशोधन प्रस्ताव को वापस लेने की मांग तथा भाजपा के अंदर ही एक बड़ा वर्ग जो रघुवर सरकार के इस निर्णय के खिलाफ था, इस संशोधन प्रस्ताव के खिलाफ मुखर होकर अपनी बात रांची से लेकर दिल्ली तक रख रहा था। इस संशोधन प्रस्ताव के खिलाफ पूरा झारखण्ड एक होकर रघुवर सरकार के खिलाफ खड़ा था, रांची में आंदोलन थमने का नाम नहीं ले रहा था।

और अंततः रघुवर सरकार सीएनटी-एसपीटी एक्ट मामले में बैकफूट पर चली गई। विपक्ष के दबाव और जनजातीय परामर्शदातृ पर्षद द्वारा बार-बार संशोधन प्रस्ताव को वापस लेने की मांग तथा भाजपा के अंदर ही एक बड़ा वर्ग जो रघुवर सरकार के इस निर्णय के खिलाफ था, इस संशोधन प्रस्ताव के खिलाफ मुखर होकर अपनी बात रांची से लेकर दिल्ली तक रख रहा था। इस संशोधन प्रस्ताव के खिलाफ पूरा झारखण्ड एक होकर रघुवर सरकार के खिलाफ खड़ा था, रांची में आंदोलन थमने का नाम नहीं ले रहा था। स्थिति ऐसी हो गई कि कई जगहों पर स्वयं मुख्यमंत्री रघुवर दास को अपमान झेलना पड़ा, पर सरकार अपने इस निर्णय से टस से मस नहीं हो रही थी।

रघुवर सरकार ने 23 नवम्बर को विधानसभा में भारी विरोध के बीच पास कराई थी यह विधेयक

हम आपको बता दें कि पिछले साल 23 नवम्बर को सीएनटी-एसपीटी संशोधन विधेयक विपक्ष के भारी विरोध के बीच रघुवर सरकार ने विधानसभा से पास कराया था। उस वक्त भी सत्ता पक्ष के कई लोगों ने इस विधेयक पर अपनी आपत्ति जताई थी, पर सरकार में होने के कारण इसका विरोध नहीं किया, पर अंदर ही अंदर सरकार के इस निर्णय से क्षुब्ध थे, कुछ का उस वक्त कहना था कि ये विधेयक अगली बार उन्हें अपने इलाके से विधायक बनने नहीं देगा। कुछ विधायकों का तो उनके इलाके में विरोध भी शुरु हो गया था। इधर सीएनटी-एसपीटी संशोधन विधेयक का विरोध कर रहे कई सामाजिक संगठनों, राजनीतिक दलों तथा अन्य संस्थाओं से जुड़े लोगों ने राज्यपाल का दरवाजा खटखटाया और अपनी आपत्तियों को लिखित रुप में दर्ज कराना प्रारंभ किया। राज्यपाल द्रौपदी मुर्मू की इस विषय पर प्रशंसा करनी होगी, उन्होंने इस ज्वलंत मुद्दें पर रुचि दिखाई तथा विभिन्न सामाजिक, राजनीतिक तथा अन्य संस्थाओं से जुड़े लोगों की भावनाओं का ध्यान रखा तथा उनकी बातों को ध्यान से सुनी और फिर मंथन करना प्रारंभ किया। ये मंथन का ही परिणाम था कि राज्यपाल द्रौपदी मुर्मू ने झारखण्ड की जनता की अंतरात्मा की आवाज सुनी और रघुवर सरकार को इसी साल 24 मई को उन्होंने सीएनटी-एसीपीटी संशोधन विधेयक को दोबारा विचार के लिए लौटा दिया था।

cnt-spt मुद्दे पर राज्यपाल द्रौपदी मुर्मू द्वारा लिये गये निर्णय ने सभी को चौंकाया

राज्यपाल द्रौपदी मुर्मू द्वारा इस संशोधन विधेयक को लौटाने तथा उस पर हस्ताक्षर नही करने के निर्णय ने रघुवर सरकार को चौंकाया, साथ ही विपक्ष को भी सोचने पर मजबूर किया। विपक्ष यह मानने को तैयार ही नहीं था कि रघुवर सरकार के इस निर्णय को राज्यपाल द्रौपदी मुर्मू मानने से इनकार कर देगी और प्रस्ताव को लौटा देगी, लेकिन ऐसा हुआ, विपक्ष और कई संगठनों ने राज्यपाल द्रौपदी मुर्मू के इस निर्णय की जमकर तारीफ की तथा रघुवर सरकार को चेतावनी दी कि अब इस सीएनटी-एसपीटी संशोधन प्रस्ताव को भूल जाये, पर रघुवर सरकार कहा माननेवाली, मुख्यमंत्री रघुवर दास ने नये तरीके से इस पर काम करना प्रारंभ किया। बार-बार टीएससी की बैठक बुलाई गई, जिसमें हंगामें का दौर चलता रहा, लेकिन 3 अगस्त को टीएसी की अंतिम बैठक में ही पता चल गया कि रघुवर सरकार की स्थिति खासकर इस मुद्दे पर ठीक नहीं, हालांकि इसी साल 3 जुलाई को मुख्यमंत्री ने तीन में से दो संशोधन प्रस्ताव वापस लेने की घोषणा की थी।

विधानसभाध्यक्ष दिनेश उरांव ने राज्यपाल द्वारा संशोधन वापस लिये जाने का संदेश  सदन में पढ़कर सुनाया

इधर कल विधानसभा में विपक्ष की मांग पर विधानसभाध्यक्ष दिनेश उरांव ने राज्यपाल द्वारा संशोधन वापस लिये जाने का संदेश पढ़कर सुनाया। राज्यपाल ने सीएनटी-एसपीटी में संशोधन खारिज करते हुए कहा कि

  • इसकी जरुरत, लक्ष्य और उद्देश्य को स्पष्ट नहीं किया गया है।
  • सीएनटी की धारा 21, धारा 49(1) व 49(2) में किये गये संशोधन स्पष्ट नहीं है। वहीं एसपीटी की धारा 13 में संशोधन पर भी आपत्ति जताई है।
  • बड़ी संख्या में इन संशोधन के खिलाफ आवेदन मिले, जिसमें सीएनटी की धारा 71 में संशोधन पर भी सवाल उठाया गया है।
  • सरकार सीएनटी की धारा 71 में तो संशोधन कर रही है लेकिन ऐसा कोई संशोधन एसपीटी में नहीं किया गया है, यह आंशिक संशोधन है, पूरे राज्य में इस संशोधन को लागू नही किया जा सकता।

संसदीय कार्य मंत्री सरयू राय की माने तो रघुवर सरकार के पास इस मुद्दे पर दो ही विकल्प थे –

पहला विकल्प यह था कि सरकार सदन में राज्यपाल द्वारा दर्ज करायी गई आपत्तियों पर विचार करती या दूसरा विकल्प इसी संशोधन को दोबारा राज्यपाल के पास भेज देती। वर्तमान में इसे विधानसभा में रखने की आवश्यकता महसूस नहीं की गई, क्योंकि राज्यपाल ने स्पष्ट कह दिया कि संशोधन के लिए कम से कम उद्देश्य तो साफ होना ही चाहिए।

जब राज्यपाल द्रौपदी मुर्मू यह कह दें कि संशोधन प्रस्ताव का उद्देश्य और लक्ष्य स्पष्ट नहीं है, तो रघुवर सरकार बताये कि फिर इस सीएनटी-एसपीटी संशोधन विधेयक को लाने के लिए इतनी उतावली क्यों थी?  कई संगठन तो आज भी कहते है कि सरकार कहती है कि विकास कार्यों के लिए जमीन की आवश्यकता होती है, तो क्या पूर्व में विकास कार्यों के करने में आपत्ति होती थी, अगर आपत्ति होती तो फिर बोकारो स्टील प्लांट, एचईसी प्लांट कैसे लग गये, सवाल विकास का नहीं, सवाल यहीं के लोगों के जीवन को प्रभावित कर, ऐसे लोगों को जमीन उपलब्ध कराना था, जो विकास के नाम पर यहां के लोगों के जीवन के साथ खेल जाते।

ऱघुवर सरकार की सीएनटी-एसपीटी मु्ददे पर हुई किरकिरी

कुल मिलाकर, रघुवर सरकार की इस मुद्दे पर काफी किरकिरी हुई है, वर्तमान समय में रघुवर सरकार ने जनता के बीच अपनी प्रतिष्ठा पूर्णतः खो दी है। सीएनटी-एसपीटी मुद्दे पर रघुवर सरकार की हठधर्मिता ने उसे कहीं का नहीं छोड़ा, भाजपा को जो नुकसान होना था, हो चुका। इससे ज्यादा नुकसान हो भी नहीं सकता। आनेवाले समय में जब भी चुनाव होंगे – भाजपा का नुकसान तय है। हां, एक बात सत्य है कि राज्यपाल द्रौपदी मुर्मू ने पूरे देश में अपनी अलग पहचान जरुर बना ली है, सीएनटी-एसपीटी एक्ट संशोधन पर जो उन्होंने निर्णय लिया, उसकी सर्वत्र प्रशंसा हो रही है। ऐसे भी अन्य कार्यों जैसे शिक्षा के क्षेत्र में भी जो कदम राज्यपाल उठा रही है, वह भी साफ दीख रहा है, यानी की राज्यपाल द्रौपदी मुर्मू झारखण्ड की जनता के बीच अपनी सर्वश्रेष्ठ पहचान बना ली है। लोग उन्हें आनेवाले दिनों में वर्षो तक याद रखेंगे, खासकर तब जब सीएनटी-एसपीटी संशोधन विधेयक तथा रघुवर सरकार की हठधर्मिता की बाते याद आयेंगी।

Krishna Bihari Mishra

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