धर्म

प्रयाग राज का कुम्भ मेला यानी भारत को देखने का एक अलग नजरिया, एक संन्यासी के शब्दों में

दो महीने पहले ही इलाहाबाद यानी प्रयागराज में कुम्भ मेला लगा था, बड़ी संख्या में देश-विदेश के श्रद्धालू संगम में डूबकी लगाने, पाप धोने, आध्यात्मिकता की सुखद अनुभूति प्राप्त करने के लिए पहुंच रहे थे। ऐसे भी कहा जाता है कि भारत के कण-कण में आध्यात्मिकता की पुट छुपी है, आप उस आध्यात्मिकता को कैसे ग्रहण करते हैं, ये आपके उपर हैं, क्योंकि इसे आप जिस प्रकार से ग्रहण करेंगे, आपको वैसा ही प्राप्त होगा।

बहुत वर्षों के बाद एक सुखद संयोग यह था कि पहली बार किसी सरकार ने एक ऐसी व्यवस्था लोगों को दी, जिसे देख लोगों ने दांतों तले अंगूली दबाई, चूंकि सरकार ने अच्छी व्यवस्था की थी, इसलिए देश-विदेश से लोगों को यह कहकर भी बुलाया गया था कि आइये देखिये, भारत को पहचानिये, कुम्भ के माध्यम से जानिये, भारत की सभ्यता व संस्कृति को नजदीक से जानिये। हालांकि यह अर्द्ध कुम्भ था, फिर भी सरकार ने इसे कुम्भ की तरह ही पेश किया, लोग आये भी, लोगों ने इन्जवाय भी किया और बहुत सारे लोगों ने आध्यात्मिकता का रसपान भी किया।

संन्यासी का कहना था कि ऐसे तो वे 1989 से कुम्भ जाते रहे हैं, पर इस बार का कुम्भ जाना, बेहद अविस्मरणीय था। कुम्भ में केवल अच्छे लोग ही नहीं जाते, बल्कि वैसे लोग भी जाते है जिनका काम ही लोगों को तंग करना तथा उन्हें कष्ट देना है, उन्होंने महसूस किया कि एक से एक घटनाएं घटी, एक कार में लोगों ने अपनी सारी वस्तूएं रख दी, चारों तरफ से कार को लॉक भी कर दिया, गये कुम्भ में डूबकी लगाने और जब लौटे तो देखा कि कार तो मौजूद है, पर कार के अंदर रखे सारे सामान गायब है, वे जैसे-तैसे गमछे पहनकर प्राथमिकी दर्ज कराने थाने पहुंचे, यानी वहां ऐसी भी स्थिति थी।

एक महिला भक्त जहां वे ठहरे थे, अपनी शिविर की व्यवस्था देख दंग थी, वो बार-बार कह रही थी कि जिस प्रकार की शांति यहां है, वैसी ही शांति दूसरे जगहों पर क्यों नहीं, क्योंकि सभी शिविर वालों ने बड़े-बड़े लाउडस्पीकर लगा रखे थे, कहीं भजन चल रहा हैं, तो कही प्रवचन चल रहा हैं, सब अपने में मस्त हैं, किसी को किसी के शिविर से नाराजगी है, तो किसी को किसी से प्रसन्नता है, पर इन सबसे अलग कुछ ऐसे भी हैं, कि वे इसमें आनन्द के पल ढूंढ ले रहे हैं, जिसे आध्यात्मिक चिन्तन के द्वारा ही सिर्फ प्राप्त की जा सकती है।

संन्यासी बताते है कि एक से एक सिद्ध पुरुष तो एक से एक ढोंगी भी पहुंच रहे हैं, पहचानना आपको हैं, ग्रहण करना आपको हैं, कभी बड़े-बड़े महात्मा इसी कुम्भ में आकर, अपने शिष्यों को दर्शन देकर, उन्हें परमानन्द दे चुके हैं, उन कहानियों को सुन व देख सभी प्रसन्न है। कुछ साधु ऐसे भी हैं, जैसे उन्होंने मान लिया कि उपद्रव मचाना है, वे जमकर उपद्रव कर रहे हैं, पर उन पर भी प्रशासन के लोगों की नजर हैं, साधुओं पर ज्यादा सख्ती बरतने का मतलब भी वे जानते हैं, इसलिए उनके क्रोध को शांत करने के लिए विशेष प्रबंध भी किये गये हैं।

भारी शोर-शराबे के बीच, जिनको जो प्राप्त होना है, प्राप्त हो रहा है, क्योंकि वहां सभी के लिए सब कुछ था, जिसे जो प्राप्त होना था, उसे प्राप्त हो रहा था, फिर कुम्भ आयेगा, वहां हम और आप उस वक्त रह पायेंगे या नहीं, वक्त बतायेगा, पर एक प्रश्न जेहन में उठता है कि यह कुम्भ कब से लगना शुरु हुआ, इतने लोग कैसे पहुंच जाते हैं, आखिर भारत की इस सभ्यता व संस्कृति तथा अध्यात्म के इस वृहत्तर मंजिल में इस कुम्भ की सार्थकता कब से चली आ रही है, जिस पर शोध की आवश्यकता है।

संन्यासी बताते है कि कुम्भ की चर्चा तो श्रीरामचरितमानस में भी हैं, और हो सकता है कि इसकी चर्चा वाल्मीकि रामायण में भी हो, क्योंकि प्रयाग में भारद्वाज मुनि का आश्रम है, और श्रीराम भारद्वाज मुनि के आश्रम तक गये हैं, ऐसे में कुम्भ की सार्थकता तो प्राचीन समय से हैं, पर कब से हैं, हमलोग सिर्फ सुन ही रहे हैं, और जब तक जीवित रहेंगे, सुनते रहेंगे, कुम्भ में गोता लगाते रहेंगे।