रांची में पीएम मोदी का रोड शो, सुरक्षाकर्मी और भाजपा कार्यकर्ता ज्यादा, जनता की भागीदारी कम

जिन्होंने 1990 और 1995 के लालू प्रसाद और उनके शासनकाल के बिहार को देखा हैं, वे 2014 और 2019 के नरेन्द्र मोदी और उनके भारतीय शासनकाल को भी देख लें। कोई अंतर नहीं, लोकप्रियता वही है। कार्यकर्ताओं में भी समानता यानी उस वक्त लालू प्रसाद के खिलाफ कोई भी बिहार में उनका कार्यकर्ता एक भी शब्द सुनने को तैयार नहीं होता, आज मोदी के भी कार्यकर्ता उनके खिलाफ एक भी शब्द सुनने को तैयार नहीं हैं। समर्थक भी उसी प्रकार के, कोई अंतर नहीं।

जिन्होंने 1990 और 1995 के लालू प्रसाद और उनके शासनकाल के बिहार को देखा हैं, वे 2014 और 2019 के नरेन्द्र मोदी और उनके भारतीय शासनकाल को भी देख लें। कोई अंतर नहीं, लोकप्रियता वही है। कार्यकर्ताओं में भी समानता यानी उस वक्त लालू प्रसाद के खिलाफ कोई भी बिहार में उनका कार्यकर्ता एक भी शब्द सुनने को तैयार नहीं होता, आज मोदी के भी कार्यकर्ता उनके खिलाफ एक भी शब्द सुनने को तैयार नहीं हैं। समर्थक भी उसी प्रकार के, कोई अंतर नहीं।

जिसका फायदा उस वक्त लालू प्रसाद ने जमकर उठाया और ठीक वहीं फायदा हमारे देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी वर्तमान में उठाने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसे भी जब कार्यकर्ता और समर्थक अंधभक्त हो जाये, तो लालू यादव और नरेन्द्र मोदी जैसे नेता क्या करेंगे, उसका फायदा उठायेंगे ही, और जब ज्ञान होगा, तब तक बहुत देर हो चुकी होगी।

इस देश का दुर्भाग्य हैं, जिस-जिस नेता पर यहां की जनता ने सर्वाधिक प्यार लूटाया, उस नेता ने उस जनता को धोखे के सिवा कुछ दिया ही नहीं। लालू और उनकी पार्टी राजद को तो छोड़ ही दीजिये, उनकी तो वर्तमान में स्थिति ऐसी हो गई है कि क्या कहा जाये, और ये सब उनके कर्मों का फल हैं, क्योंकि जब जनता ने प्यार दिया तो उन्होंने उस प्यार को समझा ही नही था, वो तो ये समझ रहे थे कि जनता ने उन्हें सत्ता का रसपान करने के लिए एक विशेष गिफ्ट दिया है, जिसका परम सुख प्राप्त करना उनका जन्मसिद्ध अधिकार है।

जो लोग भारतीय जनता पार्टी या राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को जानते है, वे यह भी जानते है कि यहां व्यक्ति पूजा की प्रधानता नहीं हैं। संघ की एक राजनीतिक इकाई है भाजपा। जिसका नियंत्रण संघ मुख्यालय नागपुर से होता रहता है। जिस प्रकार से इन दिनों नरेन्द्र मोदी ने व्यक्तिवाद को जन्म दिया है, और जिस प्रकार से भाजपा में व्यक्ति केन्द्रित राजनीति प्रारम्भ हो रही हैं, वह भाजपा ही नहीं, बल्कि संघ के लिए भी सुखद संदेश नहीं है, इसलिए संघ को निर्णय करना ही पड़ेगा कि क्या उसने सदा के लिए भाजपा को मोदी के हवाले कर दिया या अभी भी उसका उनके उपर नियंत्रण हैं, क्योंकि सामान्य जनता जिसको न तो मोदी से मतलब है और न ही भाजपा से मतलब हैं, जिसे अपने रोजमर्रे की जिंदगी छोड़कर, दूसरे किसी से कोई मतलब नहीं हैं, उसे अब भय सताने लगा है।

और जब जनता में भय का प्रादुर्भाव हो जाता हैं तो उस पार्टी व उस नेता की क्या हाल होती है? उसका सुंदर उदाहरण खुद लालू प्रसाद यादव और उनकी पार्टी है, यानी जिस लालू और उनकी पार्टी को बिहार की जनता ने माथे बिठाया, आज वे ही जाति के टुकड़ों पर सवार होने की कोशिश कर, अपने चेहरे को चमकाने की कोशिश कर रहे हैं, पर सफलता नहीं मिल रही, आनेवाले समय में भाजपा के साथ भी यहीं होगा, क्योंकि भाजपा के लोग ईश्वर के यहां से अमृत पीकर नहीं आये हैं।

आज ही रांची में मोदी का जो रोड शो आयोजित हुआ, उससे किसको फायदा हुआ, आम जनता को, पार्टी को, पार्टी के कार्यकर्ता को या मोदी को। इसका विश्लेषण तो होना ही चाहिए। आज मुझे किसी कारणवश सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग जाने की आवश्यकता पड़ गई। मुझे आश्चर्य हुआ कि मुझे अपने घर से आइपीआरडी तक जाने में कही भी ट्रैफिक नहीं मिला, जबकि जिस समय मैं जा रहा था या लौट रहा था, उस वक्त रांची के इन सड़कों पर ट्रैफिक जाम की समस्या बनी रहती है। सड़कें सुनसान थी, जैसे लगता हो कि किसी ने कर्फ्यू लगा दिया हो, रांची की सभी प्रमुख सड़कों पर प्रतिदिन चलनेवाली छोटी-छोटी टेम्पू-टैक्सियां गायब थी।

सुजाता चौक पर बड़ी संख्या में लोग खड़े थे, धुर्वा जाने के लिए, पर उन्हें कोई गाड़ी नहीं मिल रही थी, बेचारे वृद्ध पुरुष और महिलाओं को कोई उपाय सूझ नहीं रहा था कि वे करें तो क्या करें, मोदी के रोड शो के कारण उनका आज का दिन परेशानी लेकर आ चुका था, अब ये बेचारे कैसे मोदी के लिए वोट करेंगे, जरा बताइये। आम तौर पर तो रोड शो इसीलिए किया जाता है कि जनता पार्टी के साथ जुड़े, उन्हें वोट करें, पर जनता ही नाराज हो जाये तो आप क्या कर लेंगे?

जहां रोड शो होना था, वहां बड़ी संख्या में होर्डिंग लगे थे, जिसमें पीएम मोदी के चेहरे अंकित थे, जोहार लिखा था, एक बार फिर मोदी सरकार लिखा था, विभिन्न चैनलों-पोर्टलों के पत्रकार मोदी स्तुति गा रहे थे, इनके भाव ऐसे छलक रहे थे,  जैसे कोई भक्त कोई भजन गा रहा हो। बड़ी संख्या में भाजपा के कार्यकर्ता अपने पार्टी के झंडों को लेकर, पार्टी की टोपी पहनकर इधर से उधर भटक रहे थे, और इतरा भी रहे थे, इनके साथ आजसू के कार्यकर्ता भी मौजूद थे, सड़कों को भी चमका दिया गया था, बताया जा रहा था, चूंकि मोदी जी को स्वच्छता बहुत ही पसन्द है, इसलिए खूब रोड को झाड़-पोछ कर चमकाने की कोशिश की गई थी।

जिस रास्ते से मोदी को रोड शो करना था, उसकी बीच में बैरिकेटिंग भी कर दी गई थी, सड़क के आस-पास बनी बिल्डिंगों में सुरक्षा के लिए पुलिसकर्मी तैनात थे, यानी रोड शो में भारी संख्या में पुलिसकर्मियों को लगा दिया गया था, पर इस रोड शो में पत्रकार थे, पुलिसकर्मी थे, भाजपा के कार्यकर्ता थे, पर आम जनता की कमी साफ तौर पर देखी गई, यहीं भाजपा के लिए सबसे बड़ी माइनस प्वाइंट है, जो भाजपा समझ नहीं पा रही और न समझने की कोशिश कर रही हैं।

आप रोड शो करके आम जनता के दिलों को जीत लेंगे, संभव नहीं। जनता को जीतने के लिए आपका काम दिखना चाहिए। इसमें कोई दो मत नहीं कि मोदी झारखण्ड में लोकप्रिय हैं, पर उतना ही सच यह भी है कि राज्य के मुख्यमंत्री रघुवर दास को लेकर जनता में भारी नाराजगी हैं, लोग उन्हें देखना तक पसन्द नहीं करते, पर कनफूंकवों का दल चाहता है कि ऐसा प्यारा मुख्यमंत्री सदैव बराबर बना रहे, ताकि उसकी रोजी-रोटी चलती रहे, उसकी दुकान चलती रहे, रही बात जनता की तो वो तो मरने के लिए ही पैदा होती है।

इधर, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का रोड शो भी खत्म हो गया और जो स्थितियां देखने को मिली, वो भाजपा के लिए सुखद नहीं हैं, आम जनता ने इस रोड शो से काफी दूरियां बना ली, शायद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को भी आभास हो गया होगा, कि राज्य में भाजपा और उनके गठबंधन आजसू का क्या हाल होनेवाला है? एक ओर जहां दूसरी जगहों पर पीएम मोदी की सभा व रोड शो में उमड़ती भारी भीड़ और रांची में भीड़ का कोई अता-पता ही नहीं, साफ बता देता है कि जनता का यहां क्या मूड है? यानी भारी-भरकम व्यवस्था करने के बावजूद, जब ऐसी स्थिति हैं, तो समझ लीजिये सामान्य तौर पर रोड शो, होता तो क्या होता?

Krishna Bihari Mishra

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Wed Apr 24 , 2019
कल रांची में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का रोड शो था, सभी की नजर प्रधानमंत्री के रोड शो पर थी, सभी चर्चे कर रहे थे, कैसा रहेगा मोदी का रोड शो, क्योंकि मोदी जहां भी जाते हैं, भीड़ टूट पड़ती है, हाल ही में जब वे दक्षिण भारत के एक शहर में भाषण कर रहे थे, तो वहां का दृश्य ही गजब था, सभी हैरान थे, क्या ऐसा ही दृश्य यहां भी दिखेगा? ये कुछ सवाल रांचीवासियों के जेहन में उठ रहे थे, आखिर इनके जिज्ञासाओं को कौन शांत करेगा?

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