लाइफ मैनेजमेंट के बारे में परमहंस योगानन्द ने जो दुनिया को मार्ग दिखाया, वह अविस्मरणीय: हरिवंश

रांची के जगन्नाथपुर स्थित योगदा सत्संग विद्यालय के प्रांगण में योगदा सत्संग विद्यालय के नये भवन की नींव रखने के सुअवसर पर आयोजित कार्यक्रम में अपने विचारों को रखते हुए राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश ने कहा कि भारत एक ऐसा मुल्क है, जहां हमारे ऋषियों ने जीवन जीने, समाज व राष्ट्र्र को चलाने का एक दिव्य मार्ग प्रशस्त किया है, जो अन्यत्र देखने को नहीं मिलता।

रांची के जगन्नाथपुर स्थित योगदा सत्संग विद्यालय के प्रांगण में योगदा सत्संग विद्यालय के नये भवन की नींव रखने के सुअवसर पर आयोजित कार्यक्रम में अपने विचारों को रखते हुए राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश ने कहा कि भारत एक ऐसा मुल्क है, जहां हमारे ऋषियों ने जीवन जीने, समाज व राष्ट्र्र को चलाने का एक दिव्य मार्ग प्रशस्त किया है, जो अन्यत्र देखने को नहीं मिलता। उन्होंने कहा कि उन्हें खुशी हो रही है कि आज ऐसे ही महान गुरुओं की परम्परा से आये महान गुरु स्वामी युक्तेश्वर गिरि जी का अवतरण दिवस है, और ऐसे अद्भुत दिन पर वे इस कार्यक्रम में योगदा सत्संग के सन्यासियों के बीच उपस्थित है।

हरिवंश ने कहा कि परमहंस योगानन्द जी ने बंगाल से रांची और फिर पूरी दुनिया को अपने अद्भुत शिक्षा के द्वारा जो रास्ता दिखाया, वह पश्चिम के एक चिन्तक की उस भावना को बलवती करती है, जिन्होंने कहा था कि जिस प्रकार पश्चिम अपने भौतिकवादी उपभोक्तावादी संस्कृति से स्वयं को नष्ट कर रहा हैं, आनेवाले समय में इस पश्चिम को पूर्व से एक ऐसी रोशनी मिलेगी, जो पूरे विश्व को मानवता का पाठ पढ़ायेगी, प्रकाश दिखायेगी।

हरिवंश ने कहा कि जीवन में उतार चढ़ाव तो आते ही रहते हैं, इससे निकल पाना संभव भी नहीं, पर ऐसे समय में जीवन की परेशानियों से मुक्त रखने का पाठ भी योगदा सत्संग के द्वारा ही हमें प्राप्त होता है। उन्होंने कहा कि वे योगदा सत्संग की एक पुस्तक को रोजाना पढ़ते हैं, उस पुस्तक का नाम है व्हेयर, देयर इज लाइट, जिसमें जीवन की चुनौतियों को सामना करने, रास्ता दिखाने का अद्भुत मार्ग दिया हुआ है, ऐसी पुस्तक उन्हें आज तक नहीं देखी।

उन्होंने कहा कि मैनेजमेंट की पढाई तो बहुत बाद में आयी, उसके पूर्व ही लाइफ मैनेजमेन्ट की बात जो परमहंस योगानन्द ने कही हैं, उनकी जितनी प्रशंसा की जाय कम है। उन्होंने 1991 – द डेथ ऑफ डिस्टेन्स पुस्तक की चर्चा करते हुए कहा कि दुनिया कैसे एक परिवार की शक्ल में आकर दूरियों का अन्त कर दे रही है, अगर ये भी जानना है तो आप परमहंस योगानन्द जी की साहित्यों की ओर मुड़ें। उन्होंने कहा परमहंस योगानन्द जी ने मोटिवेशन व डिप्रेशन की आसन्न चुनौतियों को समझा था, इसलिए उन्होंने जीवन जीने के प्रबंधन पर विशेष ध्यान दिया, उन्होंने कहा कि उन्हें खुशी है कि योगदा सत्संग विद्यालय में जो नये भवन का निर्माण हो रहा है, उस भवन में विद्या ग्रहण करनेवाले बच्चे कुशल जीवन प्रबंधन का पाठ पढ़कर पूरे देश को एक नई राह दिखायेंगे।

आनेवाले समय में योगदा सत्संग विद्यालय का नया भवन दूसरे स्कूलो के लिए भी अनुकरणीय हो जायेगा – ईश्वरानन्द

स्वामी ईश्वरानन्द जी ने इस अवसर पर कहा कि स्वामी युक्तेश्वर गिरि जी के जन्मदिवस पर संपन्न आज का यह विशेष कार्य अर्थात् नये विद्यालय भवन के लिए भूमि पूजन निश्चय ही परमहंस योगानन्द जी के चिरकालिक स्वप्न को पूरा करने के लिए विशेष कदम बढ़ाने को हमें उत्प्रेरित कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि परमहंस योगानन्द जी के सपनों को अगर देखें तो साफ पता चलता है कि उन्होंने बंगाल के एक गांव में सिर्फ सात बच्चों को लेकर एक पाठशाला की नींव रखी, बाद में वे रांची आये और तब से लेकर आज तक के उनके सपनों को पढ़ने की कोशिश करें, तो साफ पता चलता है कि आज का दिन उन्नयन के किस पादान पर आ गये है।

उन्होंने कहा कि सभी जानते है कि एक समय जहां योगदा सत्संग आश्रम है, वहां पूर्व में योगदा विद्यालय हुआ करता था, विशेष परिस्थियों में उस विद्यालय का स्थानान्तरण जगन्नाथपुर करना पड़ा, उस समय की परिस्थितियों को देखते हुए जो कक्ष बनाये गये, उन्हीं में वे कक्ष आज तक चल रहे हैं, पर आज का दिन देखिये, हम ऐसे भवन का निर्माण करने जा रहे हैं, जो अपने आप में अद्वितीय होने जा रहे हैं, अन्य स्कूलों के लिए भी अनुकरणीय होने जा रहा है।

उन्होंने कहा कि भारत सरकार के संस्कृंति मंत्रालय की ओर से मिले छः करोड़ के अनुदान तथा अपने योगदा परिवार के द्वारा संयोजित फंड से मिलकर बननेवाले इस स्कूल भवन का मूल उद्देश्य बच्चों में शारीरिक, आध्यात्मिक और मानसिक विकास को उच्चकोटि के मानक तल तक ले जाना हैं। उन्होंने कहा कि 24 कक्षाएं अपने फंड से बन रही हैं, बाकी दो स्रोतों से ये काम्पलेक्स बनकर तैयार होगा।

स्वामी ईश्वरानन्द ने कहा कि गुरुजी के सोच के अनुसार इस भवन को डिजाइन किया गया है। बच्चों का यह स्कूल केवल भवन ही नहीं होगा, बल्कि जो स्वामी परमहंस योगानन्द जी की धारणा थी कि प्रकृति के सम्पर्क में रहकर ही बौद्धिक व आत्मिक विकास हो सकता है, उसे भी यहां पुष्पवित-पल्लवित करना है। उन्होंने कहा कि उन्हें पूरा विश्वास है कि यह विद्यालय दूसरे विद्यालयों के लिए अनुकरणीय होगा।

उन्होंने बच्चों से मनोविनोद पूर्ण बातें भी की और कहा कि आपको जो यह सुंदर विदयालय भवन मिल रहा है, उसे देखकर उन्हें ईर्ष्या हो रही है, कि ये सुविधा उन्हें कोई नहीं मिली, उन्होंने कहा कि आप अपने शरीर और मन तथा आत्मा का विकास करें। उन्होंने कहा कि आप सभी आदर्श नागरिक बनें, ईश्वर की कृपा आप सभी पर सदैव बनी रहे, यह हमारी कामना है।

गुरुओं के मार्गदर्शन से विद्यार्थियों का जीवन अवश्य आलोकित होगा – स्वामी विश्वानन्द

स्वामी विश्वानन्द ने इस अवसर पर कहा कि दयामाता जब 1958 में रांची आई थी, तो आज जो गेस्ट हाउस हैं, वह उस वक्त विद्यालय भवन हुआ करता था, उसका शिलान्यास उन्होंने उस दौरान किया था उस शिलान्यास में जिस करनी का प्रयोग हुआ, वहीं करनी का प्रयोग आज बन रहे नये योगदा सत्संग विद्यालय भवन के भूमि पूजन पर भी हुआ, जो दयामाता के आशीर्वाद के रुप में प्रयोग हुआ है।

उन्होंने कहा कि अपने गुरु परमहंस योगानन्द जी ने जिस लीची वृक्ष के नीचे अपने योगदा के भक्तों को शिक्षा दी थी, उसकी भूमि से लाई गई मिट्टी का भी यहां प्रयोग किया गया, साथ ही योगदा सत्संग आश्रम से लाई गई ईट का प्रयोग भी इसके आध्यात्मिक पृष्ठभूमि के रुप में, तथा अपने गुरु के आशीर्वाद के रुप में प्रयोग हुआ है, ताकि यह भवन अपने मूल स्वरुप को प्राप्त कर सकें। उन्होंने कहा कि प्रकृति के वातावरण में बन रहे इस विद्यालय भवन में निश्चय ही बच्चे अपने गुरुओं का मार्गदर्शन प्राप्त कर अपने जीवन को आलोकित करेंगे।

स्वामी निर्वाणानन्द ने विद्यालय भवन के इन्फ्रास्ट्रक्चर का जिक्र करते हुए कहा कि विद्यालय भवन के कक्ष माचिस बॉक्स की तरह नही होने चाहिए, बल्कि ये शरीर, मन और आत्मा के विकास के लिए बनाये जाने चाहिए, क्योंकि अगर शरीर, मन और आत्मा का विकास नहीं हुआ तो फिर विद्यालय भवन का कोई औचित्य नहीं रह जाता, उन्हें खुशी है कि आज विद्यालय भवन उस प्रकार का बन रहा हैं, जिसका आजकल सही में चारों और अभाव हैं। उन्होंने आशा व्यक्त की कि यह विद्यालय भवन आनेवाले समय में एक विशेष इतिहास का निर्माण करेगा। सभा को स्वामी शुद्धानन्द जी ने भी संबोधित किया, धन्यवाद ज्ञापन अश्विनी सक्सेना तथा कार्यक्रम का संचालन विनय कुमार झा ने किया।

Krishna Bihari Mishra

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