राजनीति

एक पत्रकार ने बहुत सारे नेताओं और मठाधीशी कर रहे पत्रकारों की नींद उड़ा दी

उमाकांत महतो झारखण्ड के वरिष्ठ पत्रकार है। फिलहाल वे राष्ट्रीय सागर से जुड़े हैं। कलम के धनी और बहुत सारे मठाधीशी में लिप्त पत्रकारों-नेताओं की चुनौती वे बखूबी स्वीकार करते हैं। इन दिनों वे चर्चाओं में हैं। सीएनटी-एसपीटी एक्ट को लेकर इन दिनों चल रही उठा-पटक पर उन्होंने अच्छे-अच्छों की क्लास ले ली है। उन्होंने इसी पर एक किताब लिखी है। किताब का नाम है – सीएनटी – एसपीटी एक्ट के परिप्रेक्ष्य में झारखण्ड। इस किताब को बाजार में उतारने का काम किया है – लेखनी प्रकाशन ने। किताब में बहुत सारे सवालों के जवाब है, जो सीएनटी-एसपीटी से जुड़े हैं, कई नेताओँ व पत्रकारों की इसमें पोल भी खोल दी गई है। जिस कारण यह किताब बहुत सारे पत्रकारों-नेताओं की आखों की किरकिरी हो गई है।

किताब में लिखा है कि सीएनटी एक्ट 1908 के बनने के साथ ही इसमें कई बार संशोधन किया जा चुका है। एसपीटी एक्ट में कम संशोधन हुए है। जिन परिस्थितियों में दोनों ही एक्ट को बनाया गया था, उससे आज की परिस्थिति भिन्न है। यह एक्ट कई मायनों में अभिशाप की तरह है। किताब में बताया गया है कि पांच एकड़ जमीन का आदिवासी मालिक आज भी रिक्शा चलाने को मजबूर है, वही दस कट्ठा जमीन का मालिक (गैर-आदिवासी) बहुमंजिली मकान भवन का मालिक बन जाता है। उससे वह लाखों-करोड़ों की आमदनी कर रहा है, वहीं सीएनटी एक्ट के कारण आदिवासी, पिछड़ी व अनुसूचित जाति के लगभग सौ से अधिक जातियों को अपनी जमीन देने के लिए बैंक कर्ज भी नहीं देता।

किताब में लिखा है कि शहरी क्षेत्रों में जहां भी खपरैल मकान दीखे, समझ लीजिये वह सीएनटी एक्ट से संरक्षित जाति का ही घर होगा। कई एकड़ के मालिक होने के बाद भी उनका जीवन स्तर आज की परिस्थितियों के अनुसार नहीं बन पाया है, ना ही उनकी जमीन बच पायी है। ऐसी कानूनी ढाल का क्या मतलब, जो न तो उन्हें बचा सके और न ही उनका जीवनस्तर उठा सकें।

किताब स्पष्ट रुप से लिखता है की धारा 71 ए के प्रावधानों के अनुसार अनुसूचित जनजातियों की अवैध रुप से हस्तांतरित जमीन उन्हें एसएआर कोर्ट से हस्तांतरित करने का प्रावधान है। इस धारा में निहित कुछ प्रावधानों के कारण भू-माफिया/दलाल या जो आदिवासियों की भूमि लेने के कानूनन योग्य नहीं थे फिर भी कंपनसेशन की आड़ में आदिवासियों की भूमि हड़पने में सफल होते रहे हैं। ऐसे लोगों में समाज के हर वर्ग के लोगों के साथ ही मीडियाकर्मी भी पीछे नहीं रहे है।

किताब लिखता है कि वरिष्ठ पत्रकार हरिनारायण सिंह जो पहले प्रभात खबर और फिर हिन्दुस्तान और अब आजाद सिपाही तक पहुंचे है, सबसे ऊपर बताये जाते है। उन्होंने आदिवासियों की जमीन पर अपना पूरा कुनबा बसा लिया है। घर ही नहीं, उन्होंने तो आदिवासी भूखंड पर एक खटाल भी बना रखा है। कोकर के हरिहर सिंह मुंडा की एक एकड़ जमीन हरिनारायण सिंह के सहयोग से मात्र पांच लाख रुपये मुआवजा देकर हस्तांतरित कर दिया गया है। इस जमीन की बाजार भाव से वर्तमान कीमत तीस करोड़ होगी। यह हस्तांतरण सन् 2005 में करवाया गया। हरिनारायण सिंह ने मीडिया का प्रभाव दिखाकर कराया। रैयत हरिहर सिंह मुंडा के अनुसार यह जमीन विश्वेश्वर सिंह नामक व्यक्ति ने मात्र 75 हजार रुपये देकर एग्रीमेंट करवाया था। यह एग्रीमेंट इनकी बगैर सहमति के करमा मुंडा, जो टुनकीटोला का रहनेवाला है, ने किया था। इस पर हरिहर सिंह मुंडा व इनके तीन भाइयों ने जमीन वापसी के लिए मुकदमा भी किया था, पर पत्रकार हरिनारायण सिंह ने मीडिया का प्रभाव दिखाकर इसे वापसी के बदले हस्तांतरित करवा लिया।

और भी कई ऐसे सवाल है, जिसे आप जानना और समझना चाहते है तो यह किताब यत्र-तत्र-सर्वत्र उपलब्ध है। किताब की कीमत मात्र 250 रुपये हैं। जो झारखण्ड में रहते हैं और नेताओं-पत्रकारों-धर्म के ठेकेदारों की सीएनटी-एसपीटी एक्ट पर क्या भूमिका रहीं हैं? उसे जानना चाहते हैं तो इस किताब को जरुर पढ़े।