अपनी बात

एक बार फिर विद्रोही24 की बात सच निकलीः झारखण्ड के विधायकों ने झारखण्डी मूल्यों का रखा मान, महान युगद्रष्टा, प्रणव स्वपन तोड़क, परिमल नाथवानी भगवान को राज्यसभा सांसद के रूप में किया पुनः प्रतिष्ठित

बोलिये परिमल नाथवानी भगवान की जय। विधायक उद्धारक की जय। समस्त दल उद्धारक की जय। मोदी प्रिय की जय। अमित शाह प्रिय की जय। बाबूलाल प्रिय की जय। आदिवासी-मूलवासी रक्षक की जय। प्रणव स्वप्न तोड़क की जय। प्रभात खबर उद्धारक की जय। लक्ष्मी अखण्ड विश्वासी की जय। स्वहित रक्षक की जय। यू-ट्यूबर्स उद्धारक की जय। सर्व पत्रकार उद्धारक की जय। ठेकेदार-इंजीनियर प्रतिपालक की जय। सांसद कोटा राशि जनता चटावक की जय और अंत में युगद्रष्टा की जय।

एक बार फिर परिमल नाथवानी भगवान झारखण्ड से सीधे दिल्ली स्थित राज्यसभा में सांसद के रूप में प्रतिष्ठित हो गये हैं। यहां के माननीयों ने अपना बहुमूल्य वोट देकर, उन्हें अपने कंधे पर उठा लिया है। उठाये भी क्यों नहीं, विधायक हित रक्षक जो ठहरें। महान युगद्रष्टा जो ठहरें। शायद यही कारण रहा कि झारखण्ड के विधायकों ने झारखण्ड की परम्परा-संस्कृति का मान रखते हुए प्रणव झा को साइड किया और परिमल नाथवानी भगवान को हृदय में धारण करते हुए उन्हें अंगीकृत कर लिया।

परिमल नाथवानी भगवान तो अंतर्यामी है। वे तो यहां के विधायकों के अंतर्मन में क्या चलता है। वे तो 2008 से जान रहे हैं। इसलिए उन्होंने ज्यादा धमाचौकड़ी नहीं की। धमाचौकड़ी करने से फायदा क्या। जब नामांकन करने के समय नामांकन जब रद्द होने की बात थी, तब नामांकन रद्द नहीं हुआ। उनके नामांकन रद्द होने से बचाने के लिए सभी सक्रिय थे। उनका नामांकन रद्द नहीं हुआ, तो उसी वक्त यह तय हो गया था कि सत्ता व विपक्ष में बैठे कुछ महत्वपूर्ण देवीय शक्तियां हैं, जो परिमल नाथवानी भगवान को जीताने में सक्रिय हैं।

परिमल नाथवानी भगवान तो सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों में लोकप्रिय थे। उभयपक्ष में भी लोकप्रिय थे। देखे नहीं, जिस दिन रांची में उतरें वे सीधे राज्य के मुख्यमंत्री हेमन्त सोरेन के पास पहुंचे और उनके शरणागत हो गये। सीधे कहा – हमारे प्रभु अवगुण चित्त न धरो, समदर्शी है नाम तुम्हारो जोई सो पार करो। ऐसे में राज्य के मुख्यमंत्री हेमन्त सोरेन उन पर कृपा कैसे नहीं बरसाते। कृपा जो बरसी तो ऐसी बरसी की परिमल नाथवानी सीधे राज्यसभा पहुंच गये।

विद्रोही24 के जो पाठक है। उन्हें पता होगा कि विद्रोही24 ने पहले ही लिख दिया था कि प्रणव झा का हारने का मूल कारण उनके टाइटल में झा लिखा होना है। ब्राह्मण समुदाय से होना है और वर्तमान में चाहे वो भाजपा हो या कांग्रेस हो या कोई पार्टी, इस समुदाय के लोगों को प्रथम दृष्टया देखना पसन्द नहीं करता। लेकिन इस समुदाय के लोगों को लगता है कि सभी पार्टियों में उनका सम्मान है। जबकि इनका सम्मान दो कौड़ी का नहीं हैं। लेकिन उछलने के लिए बोलिये, तो ये खुब अपनी-अपनी पार्टी में जाकर उछलेंगे और स्वयं को मठाधीश बनाने में लगे रहेंगे।

सच्चाई यही है कि कांग्रेस में ही कई लोग थे। जो प्रणव झा की उम्मीदवारी से संतुष्ट नहीं थे। लेकिन ताकत इतनी लगा रहे थे। जैसे लग रहा था कि जीत उनकी थाली में परोस कर रखा हुआ है। लेकिन हमारे जैसे जो राजनीतिक पंडित हैं। जो झारखण्ड को नजदीक से जानते हैं। जो यहां के विधायकों-सांसदों और तथाकथित पत्रकारों के मन के अंदर पक रहे घुरकुची को अच्छी तरह जानते हैं, पता था कि ये कांग्रेस और सत्तापक्ष के लोग मिलकर ही प्रणव को राज्यसभा नहीं जाने देंगे और हुआ भी ऐसा ही।

जरा सोचिये। मुंशी प्रेमचंद की लिखी कहानी नमक का दारोगा। कैसे गलत हो सकती है। भला नमक का दारोगा का प्रमुख खलनायक पं. अलोपीद्दीन अर्थात परिमल नाथवानी भगवान कैसे हार सकता है। जिसने सभी को अपने लक्ष्मी के द्वारा कैद कर रखा है। उसके आगे पूंछ न हिलाने की जुर्रत कौन कर सकता है। किसे परिमलानन्द प्यारी नहीं हैं।

आज तो प्रभात खबर में भी मिठाइयां बंटनी चाहिए, क्योंकि वहां का स्टेट एडिटर विजय पाठक ने परिमल नाथवानी भगवान के बारे में लिखा था कि इनके जैसा कोई राज्यसभा का सांसद आज तक हुआ ही नहीं। वाह, क्या बात है। एक अखबार का स्टेट एडिटर सोशल साइट पर ये बात लिखें। इससे बड़ी शर्मनाक बात और क्या हो सकती है। लेकिन इस बात को शर्मनाक कहेगा कौन?

जबकि सच्चाई यही है कि विद्रोही24 ने परिमल नाथवानी भगवान की धज्जियां उड़ा दी। बड़ाम जाकर। जिस बड़ाम को परिमल नाथवानी ने गोद लिया था। वहां जाकर कोई भी देख सकता है कि परिमल नाथवानी द्वारा गोद लिये गये गांव और इनके द्वारा किये गये विकास कार्य कैसे मुंह बिदोर रहे हैं। लेकिन इसके बावजूद भी कोई मूर्खतापूर्ण बाते करें और ऐसे लोगों की प्रशंसा करें तो साफ पता लग जाता है कि ये सारी प्रशंसा क्यों हो रही है। ये लोग परिमल नाथवानी के झारखण्ड में कूदते ही परिमल नाथवानी को ऐसे भज रहे थे, जैसे कोई तारणहार आ गया हो।

‘10 जून को ही विद्रोही24 ने कह दिया था कि जीतेगा तो परिमल नाथवानी भगवान ही’

अंत में विद्रोही 24 ने 10 जून 2026 को ही घोषणा कर दी थी कि झारखण्ड में 18 जून को क्या रिजल्ट आनेवाला है। जो विद्रोही24 के नियमित पाठक हैं – वे इस हेडिंग से जरुर परिचित होंगे – ‘अब औपचारिकता मात्र रह गई है, परिमल नाथवानी भगवान को जीतना ही है, इसलिए सभी प्रेम से बोले लक्ष्मी पर अखंड विश्वास रखनेवाले, झारखण्ड उद्धारक, विधायक उद्धारक, समस्त दल उद्धारक, नाथवानी भगवान की जय’। उस आर्टिकल में विद्रोही24 ने साफ लिख दिया था कि परिमल नाथवानी को कोई नहीं हरा सकता। इनका जीतना उतना ही तय है, जितना प्रतिदिन पूर्व से सूर्य का निकलना। आप खुद आर्टिकल पढ़ लीजिये। मैं इसे पुनः आपके समक्ष रख रहा हूं —

10 जून 2026 को विद्रोही24 में प्रकाशित आलेख जो परिमल नाथवानी के जीतने की बात पूर्व में ही प्रकाशित कर दिया था।

“बोलिये परिमल नाथवानी भगवान की जय, बोलिये परिमल नाथवानी के लिए सर्वस्व समर्पण करने को लालायित झारखण्ड के आत्मा बेचनेवाले विधायकों की जय, बोलिये परिमल नाथवानी के लिए सभी दलों में बैठे परिमल समर्थक महान आत्माओं की जय, बोलिये उन पत्रकारों की भी जय, जिनके हृदय में परिमल नाथवानी भगवान के रूप में बैठे हैं और अंत में एक बार फिर अपने धन के घमंड में कुछ भी प्राप्त करने का दृढ़ विश्वास रखनेवाले परिमल नाथवानी भगवान की जय।

परिमल नाथवानी युगद्रष्टा है। अगर ये नहीं होते तो झारखण्ड नहीं होता। आदिवासी-मूलवासी नहीं होते। जरा देखिये न ये जब से रांची पधारे हैं, झारखण्ड के विधायकों में आदिवासी-मूलवासी का सारा भेदभाव मिट चुका है। सभी उन्हें जिताने के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपना रहे हैं। हथकंडे वे भी अपना रहे हैं,  जिन पर अपने प्रत्याशी को जिताने के लिए उनके गर्दन पर तलवार लटक रही है। वे लोग ये सोच रहे है कि काश वे भी निर्दलीय होते तो आज बहती गंगा में हाथ धो रहे होते। उन पर भी आधुनिक भगवान परिमल नाथवानी की कृपा बरस रही होती।

दुखी तो वे विधायक भी हैं, जिन्होंने कभी परिमल नाथवानी का पूर्व में प्रसाद ग्रहण करके खुद को तृप्त किया था। बेचारे की शर्म से उनकी गाल लाल है कि इस बार ऐसा प्रसाद उन्हें नहीं मिल रहा। बेचारे प्रणव झा को तो कांग्रेस ने टिकट दे दिया। लेकिन उसकी जीत सुनिश्चित होने में हमें शत प्रतिशत संदेह हैं। संदेह का कारण भी है, आजकल तो पहली बात, ब्राह्मण जाति से होने पर ही बहुत सारे दलों/ब्राह्मणजाति से विरोध करनेवाले पत्रकारों को नाक-भौं टेढ़ा हो जाता है और यह सोचने लगता है कि ये भयानक जीव कहां से आ गया? कौन से देश से आ गया। अगर बिहार से आया है, तो ये तो और खतरनाक हो गया।

लेकिन जैसे ही कोई गुजरात से आता है। परिमल नाथवानी आता है। लक्ष्मी पर अखंड विश्वास रखनेवाला आता है, तो ये सभी दिल खोलकर डांस करने लगते हैं और क्या गाना गाते हैं – मेरा परिमल झारखण्ड आया ओ रामजी…, मेरा नाथवानी झारखण्ड आया ओ रामजी…, कई विधायक/पत्रकार लोग तो परिमल नाथवानी को हृदय में रखकर भजन भी गाते हैं। वो भजन है – हरे परिमल, हरे परिमल, परिमल, परिमल हरे, हरे। हरे नाथवानी, हरे नाथवानी, नाथवानी, नाथवानी हरे, हरे।

अगर आपको लगता है कि ये गलत है। तो जरा आप खुद ही सोचिये। यहां सरकार किसकी है? यहां तो सरकार महागठबंधन की है। जिसमें झामुमो, कांग्रेस, राजद, माले आदि शामिल है। जिनके कुल 56 विधायक है। 56 विधायकों के बावजूद भी कांग्रेस प्रत्याशी को जीतने पर संकट मंडरा रहा हैं तो फिर आप समझ लीजिये कि यहां क्या होने जा रहा है? यहीं नहीं, यहां पर कांग्रेस के विधायकों-मंत्रियों और नेताओं के साथ गैर-जिम्मेदाराना व्यवहार होता है, वो भी विधानसभा में। वो भी विधानसभा के मार्शल द्वारा। यहीं नहीं संसदीय कार्य मंत्री राधाकृष्ण किशोर का बयान है कि रिटर्निंग ऑफिसर के ऑफिस के बाहर भाजपा कार्यालय का बोर्ड लगा देना चाहिए और फिर भी आपको लगता है कि परिमल नाथवानी नहीं जीतेगा, तो आप शायद महामूर्ख है।

सच्चाई है। स्वीकार कीजिये। सत्तापक्ष में भी बैठे हुए लोग नहीं चाहते कि यहां से कांग्रेस प्रत्याशी जीते। कांग्रेस में भी कुछ विधायक है, जो नहीं चाहते कि यहां से प्रणव झा जीते। झामुमो वाले तो कांग्रेस से ऐसे ही बिदके हुए हैं। जो समय-समय पर दिख भी जाता है। हाल ही में झामुमो के केन्द्रीय महासचिव व प्रवक्ता सुप्रियो भट्टाचार्य ने ताल ठोक कर कहा था कि बिहार में कांग्रेस और राजद के लोगों ने उन्हें उनका उचित हक नहीं दिया। ऐसे में राज्यसभा में दोनों सीटों पर उनकी ही पार्टी का हक बनता है।

अब आइये राजद। राजद में किस विधायक का दम है कि वो लालू प्रसाद के खिलाफ जाये। लालू प्रसाद का एक फोन आयेगा और सीधे वोट परिमल नाथवानी को जायेगा। क्योंकि परिमल नाथवानी ही वर्तमान में उन्हें आर्थिक संकट से बचा सकते हैं, क्योंकि पिछले लगभग 21-22 साल से बिहार की राजनीति से बाहर रहने के बाद लालू प्रसाद के पास अब बचा ही क्या है?

और अंत में आ जाइये पत्रकारिता, तो जब रांची में खुद को अखबार नहीं आंदोलन में काम करनेवाला स्टेट एडिटर ही अपने सोशल साइट फेसबुक पर परिमल नाथवानी भगवान की स्तुति गाता है, तो फिर अन्य छुटभैये अखबार/इलेक्ट्रानिक मीडिया/यू-ट्यूबर्स की मजबूरी हो जाती है कि वो भी परिमल नाथवानी भगवान की स्तुति गाये और जो नहीं गा रहा, वो कर्म अभागा है। उसे कभी लक्ष्मी की प्राप्ति नहीं होगी। आनन्द प्राप्त नहीं होगा। इसलिए लक्ष्मी और आनन्द किसे नहीं चाहिए, इसलिए बेचारे सभी परिमल नाथवानी भगवान जीते, इसके लिए कड़ी मेहनत कर रहे हैं।

समझिये, परिमल नाथवानी भगवान की जीत हो चुकी है। बस औपचारिकता मात्र हैं। आज जिस प्रकार से मार्शलों ने विधानसभा में करामात दिखाया है। वो भी परिमल नाथवानी की जय-जयकार होने की भविष्य गाथा बता रहा है। मतलब सरकार में रहते, सरकार में शामिल मंत्रियों और विधायकों को विधानसभा में रिटर्निंग ऑफिसर के कार्यालय के समक्ष चिरौरी करनी पड़ जाये, तो समझ लीजिये, रिजल्ट क्या आनेवाला है।

रिजल्ट यही है कि परिमल नाथवानी जीतने जा रहा है। केवल रिजल्ट घोषित होने की औपचारिकता मात्र बची है। उसे जीतने के लिए कोई मेहनत नहीं करनी पड़ रही, उसे जीताने के लिए यहां के विधायक और पत्रकार कड़ी मेहनत कर रहे हैं। यहीं झारखण्ड का दुर्भाग्य है और इस दुर्भाग्य को मैं आज से नहीं पिछले 40 वर्षों से देखता रहा हूं।”

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