जो जीवन में रस भर दे, जो जीवन को महका दे, वही सरस्वती है, उन्हें प्रणाम हैं

जो अपनी वीणा की तारों को छेड़कर हमारे जीवन में रस भर दें, जो समस्त प्रकृति में आनन्द ही आनन्द को भर दें, वही सरस्वती है, वही सरस्वती है, ऐसी माता को, ऐसी जगतजननी को हमारा बारम्बार नमस्कार है, प्रणाम है। कहा जाता है कि ब्रह्मा के आवाहन पर सरस्वती ने पूरे जगत में रस का संचार किया, तब जाकर प्रकृति में आनन्द का वातावरण घुलता चला गया।

।।ऊं वीणापुस्तकधारिण्यै श्री सरस्वत्यै नमः।।

जो अपनी वीणा की तारों को छेड़कर हमारे जीवन में रस भर दें, जो समस्त प्रकृति में आनन्द ही आनन्द को भर दें, वही सरस्वती है, वही सरस्वती है, ऐसी माता को, ऐसी जगतजननी को हमारा बारम्बार नमस्कार है, प्रणाम है। कहा जाता है कि ब्रह्मा के आवाहन पर सरस्वती ने पूरे जगत में रस का संचार किया, तब जाकर प्रकृति में आनन्द का वातावरण घुलता चला गया।

माघशुक्ल पंचमी यानी सरस्वती के प्राकट्य का दिन। महाशक्ति के तीन स्वरुपों में एक स्वरुप महासरस्वती का भी है। जो लोग दुर्गा पाठ करते हैं, उन्हें पता है कि महाशक्ति के रुप में सरस्वती का कितना महत्वपूर्ण स्थान है। विभिन्न धर्मग्रंथों जैसे मत्स्य पुराण, ब्रह्मवैवर्त पुराण, मार्कण्डेय पुराण, स्कन्द पुराण आदि अनेक धर्मशास्त्रों में शतरुपा, शारदा, विद्यादायिनी, हंसवाहिनी, पुस्तकधारिणी, वागीश्वरी, वीणापाणि, भारती, वाग्देवी, प्रज्ञापारमिता आदि नामों से जाने जानेवाली मां सरस्वती को कोई भी व्यक्ति ध्यान, आवाहन अथवा पूजा अर्चना करता है, माता उसे क्या नहीं दे देती।

या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता

या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेत पद्मासना।

या ब्रह्माच्युतशंकरप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता

सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा।।

शुक्लाब्रह्म विचारसार परमाद्यां जगदव्यापिनीम्।

वीणा पुस्तकधारिणींभयदां जाड्यान्धकारापहाम्।

हस्तेस्फटिकमालिकां विदधतीं पद्मासनेसंस्थिता।

वन्दे तां परमेश्वरीं भगवतीं बुद्धिप्रदां शारदाम्।।

सरस्वती की कृपा जिस पर पड़ी, उसका जीवन धन्य हो गया और नहीं पड़ी तो समझ लीजिये, उसका जीवन अंधकारमय हो गया। सुप्रसिद्ध कवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की कालजयी रचना जो सरस्वती को समर्पित है, उसे आज कौन गुनगुनाना नहीं चाहेगा…

वर दे, वीणावादिनी वर दे !

प्रिय स्वतंत्र-रव अमृत-मंत्र नव

भारत में भर दे !

काट अंध-उर के बंधन-स्तर

बहा जननि ज्योतर्मय निर्झर

कलुष-भेद-तम हर प्रकाश भर

जगमग जग कर दे !

नव गति नव लय, ताल छंद नव

नवल कंठ, नव जलद- मन्द्ररव

नव नभ के नव विहग-वृंद को

नव पर, नव स्वर दे !

 

Krishna Bihari Mishra

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