अपनी बात

अब औपचारिकता मात्र रह गई है, परिमल नाथवानी भगवान को जीतना ही है, इसलिए सभी प्रेम से बोले लक्ष्मी पर अखंड विश्वास रखनेवाले, झारखण्ड उद्धारक, विधायक उद्धारक, समस्त दल उद्धारक, नाथवानी भगवान की जय

बोलिये परिमल नाथवानी भगवान की जय, बोलिये परिमल नाथवानी के लिए सर्वस्व समर्पण करने को लालायित झारखण्ड के आत्मा बेचनेवाले विधायकों की जय, बोलिये परिमल नाथवानी के लिए सभी दलों में बैठे परिमल समर्थक महान आत्माओं की जय, बोलिये उन पत्रकारों की भी जय, जिनके हृदय में परिमल नाथवानी भगवान के रूप में बैठे हैं और अंत में एक बार फिर अपने धन के घमंड में कुछ भी प्राप्त करने का दृढ़ विश्वास रखनेवाले परिमल नाथवानी भगवान की जय।

परिमल नाथवानी युगद्रष्टा है। अगर ये नहीं होते तो झारखण्ड नहीं होता। आदिवासी-मूलवासी नहीं होते। जरा देखिये न ये जब से रांची पधारे हैं, झारखण्ड के विधायकों में आदिवासी-मूलवासी का सारा भेदभाव मिट चुका है। सभी उन्हें जिताने के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपना रहे हैं। हथकंडे वे भी अपना रहे हैं,  जिन पर अपने प्रत्याशी को जिताने के लिए उनके गर्दन पर तलवार लटक रही है। वे लोग ये सोच रहे है कि काश वे भी निर्दलीय होते तो आज बहती गंगा में हाथ धो रहे होते। उन पर भी आधुनिक भगवान परिमल नाथवानी की कृपा बरस रही होती।

दुखी तो वे विधायक भी हैं, जिन्होंने कभी परिमल नाथवानी का पूर्व में प्रसाद ग्रहण करके खुद को तृप्त किया था। बेचारे की शर्म से उनकी गाल लाल है कि इस बार ऐसा प्रसाद उन्हें नहीं मिल रहा। बेचारे प्रणव झा को तो कांग्रेस ने टिकट दे दिया। लेकिन उसकी जीत सुनिश्चित होने में हमें शत प्रतिशत संदेह हैं। संदेह का कारण भी है, आजकल तो पहली बात, ब्राह्मण जाति से होने पर ही बहुत सारे दलों/ब्राह्मणजाति से विरोध करनेवाले पत्रकारों को नाक-भौं टेढ़ा हो जाता है और यह सोचने लगता है कि ये भयानक जीव कहां से आ गया? कौन से देश से आ गया। अगर बिहार से आया है, तो ये तो और खतरनाक हो गया।

लेकिन जैसे ही कोई गुजरात से आता है। परिमल नाथवानी आता है। लक्ष्मी पर अखंड विश्वास रखनेवाला आता है, तो ये सभी दिल खोलकर डांस करने लगते हैं और क्या गाना गाते हैं – मेरा परिमल झारखण्ड आया ओ रामजी…, मेरा नाथवानी झारखण्ड आया ओ रामजी…, कई विधायक/पत्रकार लोग तो परिमल नाथवानी को हृदय में रखकर भजन भी गाते हैं। वो भजन है – हरे परिमल, हरे परिमल, परिमल, परिमल हरे, हरे। हरे नाथवानी, हरे नाथवानी, नाथवानी, नाथवानी हरे, हरे।

अगर आपको लगता है कि ये गलत है। तो जरा आप खुद ही सोचिये। यहां सरकार किसकी है? यहां तो सरकार महागठबंधन की है। जिसमें झामुमो, कांग्रेस, राजद, माले आदि शामिल है। जिनके कुल 56 विधायक है। 56 विधायकों के बावजूद भी कांग्रेस प्रत्याशी को जीतने पर संकट मंडरा रहा हैं तो फिर आप समझ लीजिये कि यहां क्या होने जा रहा है? यहीं नहीं, यहां पर कांग्रेस के विधायकों-मंत्रियों और नेताओं के साथ गैर-जिम्मेदाराना व्यवहार होता है, वो भी विधानसभा में। वो भी विधानसभा के मार्शल द्वारा। यहीं नहीं संसदीय कार्य मंत्री राधाकृष्ण किशोर का बयान है कि रिटर्निंग ऑफिसर के ऑफिस के बाहर भाजपा कार्यालय का बोर्ड लगा देना चाहिए और फिर भी आपको लगता है कि परिमल नाथवानी नहीं जीतेगा, तो आप शायद महामूर्ख है।

सच्चाई है। स्वीकार कीजिये। सत्तापक्ष में भी बैठे हुए लोग नहीं चाहते कि यहां से कांग्रेस प्रत्याशी जीते। कांग्रेस में भी कुछ विधायक है, जो नहीं चाहते कि यहां से प्रणव झा जीते। झामुमो वाले तो कांग्रेस से ऐसे ही बिदके हुए हैं। जो समय-समय पर दिख भी जाता है। हाल ही में झामुमो के केन्द्रीय महासचिव व प्रवक्ता सुप्रियो भट्टाचार्य ने ताल ठोक कर कहा था कि बिहार में कांग्रेस और राजद के लोगों ने उन्हें उनका उचित हक नहीं दिया। ऐसे में राज्यसभा में दोनों सीटों पर उनकी ही पार्टी का हक बनता है।

अब आइये राजद। राजद में किस विधायक का दम है कि वो लालू प्रसाद के खिलाफ जाये। लालू प्रसाद का एक फोन आयेगा और सीधे वोट परिमल नाथवानी को जायेगा। क्योंकि परिमल नाथवानी ही वर्तमान में उन्हें आर्थिक संकट से बचा सकते हैं, क्योंकि पिछले लगभग 21-22 साल से बिहार की राजनीति से बाहर रहने के बाद लालू प्रसाद के पास अब बचा ही क्या है?

और अंत में आ जाइये पत्रकारिता, तो जब रांची में खुद को अखबार नहीं आंदोलन में काम करनेवाला स्टेट एडिटर ही अपने सोशल साइट फेसबुक पर परिमल नाथवानी भगवान की स्तुति गाता है, तो फिर अन्य छुटभैये अखबार/इलेक्ट्रानिक मीडिया/यू-ट्यूबर्स की मजबूरी हो जाती है कि वो भी परिमल नाथवानी भगवान की स्तुति गाये और जो नहीं गा रहा, वो कर्म अभागा है। उसे कभी लक्ष्मी की प्राप्ति नहीं होगी। आनन्द प्राप्त नहीं होगा।

इसलिए लक्ष्मी और आनन्द किसे नहीं चाहिए, इसलिए बेचारे सभी परिमल नाथवानी भगवान जीते, इसके लिए कड़ी मेहनत कर रहे हैं। समझिये, परिमल नाथवानी भगवान की जीत हो चुकी है। बस औपचारिकता मात्र हैं। आज जिस प्रकार से मार्शलों ने विधानसभा में करामात दिखाया है। वो भी परिमल नाथवानी की जय-जयकार होने की भविष्य गाथा बता रहा है। मतलब सरकार में रहते, सरकार में शामिल मंत्रियों और विधायकों को विधानसभा में रिटर्निंग ऑफिसर के कार्यालय के समक्ष चिरौरी करनी पड़ जाये, तो समझ लीजिये, रिजल्ट क्या आनेवाला है।

रिजल्ट यही है कि परिमल नाथवानी जीतने जा रहा है। केवल रिजल्ट घोषित होने की औपचारिकता मात्र बची है। उसे जीतने के लिए कोई मेहनत नहीं करनी पड़ रही, उसे जीताने के लिए यहां के विधायक और पत्रकार कड़ी मेहनत कर रहे हैं। यहीं झारखण्ड का दुर्भाग्य है और इस दुर्भाग्य को मैं आज से नहीं पिछले 40 वर्षों से देखता रहा हूं।