नहीं चला मोदी मैजिक, कर्नाटक की जनता ने भाजपाइयों की खुशियों पर लगाया ब्रेक

कर्नाटक की जनता ने भाजपाइयों की खुशियों पर जबर्दस्त ब्रेक लगाई हैं। दिल्ली से लेकर बंगलुरु तक, जो भाजपाई समर्थक या भाजपाई पत्रकार ये सोच रहे थे कि कर्नाटक में भाजपा की सरकार बनने जा रही है, उनके दिलों पर दोपहर के बाद से गहरा आघात लगना शुरु हो गया। जो कांग्रेसी समर्थक एवं पत्रकार दोपहर के पहले तक सदमें में दीख रहे थे, जैसे ही पता चला कि भाजपा की सूई 106 से पार नहीं जा रही, उनके चेहरे पर अचानक मुस्कान लौट आई,

कर्नाटक की जनता ने भाजपाइयों की खुशियों पर जबर्दस्त ब्रेक लगाई हैं। दिल्ली से लेकर बंगलुरु तक, जो भाजपाई समर्थक या भाजपाई पत्रकार ये सोच रहे थे कि कर्नाटक में भाजपा की सरकार बनने जा रही है, उनके दिलों पर दोपहर के बाद से गहरा आघात लगना शुरु हो गया। जो कांग्रेसी समर्थक एवं पत्रकार दोपहर के पहले तक सदमें में दीख रहे थे, जैसे ही पता चला कि भाजपा की सूई 106 से पार नहीं जा रही, उनके चेहरे पर अचानक मुस्कान लौट आई, और ये मुस्कान तब और गहरी हो गई, जब उन्हें यह सूचना मिली कि सोनिया गांधी ने गुलाम नबी आजाद को जेडीएस के नेताओं से मिलकर कर्नाटक में अपनी सरकार बनाने का दावा पेश करने को कहा है।

दिल्ली कांग्रेस मुख्यालय से मिली इस सूचना से इन कांग्रेसी पत्रकारों को ऐसा लगा जैसे उनके मन की मुराद मिल गई हो, ठीक यहीं हाल भाजपाई पत्रकारों का था, सबेरे से वे कांग्रेसियों को गरियाये जा रहे थे, भाजपा के मोदी और अमित शाह के चुनावी प्रबंधन के गीत गाये जा रहे थे, शेयर मार्केट दिखा रहे थे कि सेसेक्स 400 अंकों तक उछल गया, और जैसे ही दोपहर हुआ, शेयर मार्केंट कितना उछला ये तो नहीं पता चला पर भाजपाइयों के खिले हुए चेहरे और उन भाजपा समर्थक पत्रकारों के चेहरे मुरझाने लगे।

हद हो गई, भाई कोई जीते, कोई हारे, एक पत्रकार को इससे क्या मतलब? जरा देखिये एक चैनल पर सूचना प्रसारण मंत्री राज्यवर्द्धन सिंह राठौर आये और उनसे सवाल कर रही थी वरिष्ठ पत्रकार नलिनी सिंह और सवाल कर रहे थे आलोक मेहता। दोनों के सवाल इस प्रकार थे, जैसे लगता हो कि ये दोनों राज्यवर्द्धन सिंह राठौर के आगे नतमस्तक है। राज्यवर्द्धन सिंह राठौर, आलोक मेहता को सर-सर बोले जा रहे थे, और जनाब आलोक मेहता और नलिनी सिंह भी पत्रकारिता छोड़, उन्हें नई पारी शुरु करने की शुभकामना देने के साथ-साथ पीआर बनाने का भी काम कर रहे थे। ये जो नेताओं के साथ पीआर बनाने की जो नई कला इन बुजुर्ग पत्रकारों ने जो अपनाई हैं, उससे आज के नये पत्रकारों को क्या सीख मिलेगी, जरा चिन्तन करिये?

वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश को अगर भाजपा को गरियाने का मौका मिल जाये तो ये भाजपा को गरियाने में विश्व रिकार्ड तोड़ देंगे, ये जनाब एक चैनल पर बैठकर बोल रहे थे कि वे कभी कांग्रेस के कटु आलोचक रहे हैं, अरे भाई जब की आप बात कर रहे हो, उस वक्त पूरे देश में कांग्रेस ही कांग्रेस थी, तब आप आलोचना किसकी करोगे, जेडीएस और आम आदमी पार्टी की। हद हो गई। एक जनाब अम्बिका नंद सहाय एक चैनल में दीख गये, वे क्या बोल रहे है? क्या कह रहे हैं? उन्हें खुद ही नहीं मालूम। उनका चैनल पर दीखना यहीं बता रहा था कि वे पत्रकार कम, अधिकारी ज्यादा है।

कुल मिलाकर देखे तो कर्नाटक विधानसभा के आये चुनाव परिणाम ने जहां भाजपा नेताओं की हेकड़ी बंद कर दी, वहीं पत्रकारों की राजनीतिक दलों के बीच पनप रहे घटियास्तर के संबंधों को जन-जन तक पहुंचा दिया और ये पहुंचानेवाले कोई दूसरे नहीं थे, बल्कि वे पत्रकार और चैनल थे, जिन्हें लग रहा था कि वे जनता के साथ पत्रकारिता के माध्यम से न्याय कर रहे हैं।

कर्नाटक विधानसभा चुनाव परिणाम ने भाजपा नेताओं को एक ट्रेलर दिखा दिया है कि बहुमत के बहुत पास होने के बावजूद भी सत्ता दूर की कौड़ी ही रहेगी, जब तक भाजपा को पूर्ण बहुमत न मिले, क्योंकि आज भी कई पार्टियों के लिए भाजपा अछूत है। जेडीएस और कांग्रेस का मिलन इस बात का संकेत है। हमें लगता है कि आज का दिन अमित शाह और नरेन्द्र मोदी के लिए बहुत ही पीड़ादायक होगा, क्योंकि जिस पार्टी ने कभी गोवा और नागालैंड जैसे छोटे राज्यों में करामात दिखाकर सत्ता हासिल की थी, आज वहीं करामात कांग्रेस ने कर्नाटक जैसे बड़े राज्य में दिखाकर भाजपा से जीती हुई बाजी हासिल करने के लिए दौड़ लगा रही है।

कांग्रेस का यह प्रयास रंग भी ला रहा है। जेडीएस ने कांग्रेस के साथ सरकार बनाने का मन भी बना लिया है, यानी भाजपा सर्वाधिक सीट लाने के बावजूद सत्ता से बाहर और कांग्रेस हार के बावजूद सत्ता के करीब, हालांकि राजनीतिक दलों में चरित्रहीनता ने बहुत गहराई तक कब्जा जमा लिया है, ऐसे में कर्नाटक में किसकी सरकार बनेगी कांग्रेस+जेडीएस का, या भाजपा+जेडीएस का या भाजपा अकेले सरकार बनायेगी और बाद में किसी दल को तोड़-फोड़कर अपने में मिलाकर बहुमत हासिल करेगी। इन सवालों का जवाब भविष्य के गर्भ में हैं।

अब राज्यपाल किसे सत्ता संभालने के लिए बुलाते है, सभी का ध्यान उसी ओर है, पर इतना जरुर है कि सरकार किसी की भी बनेगी, ऐसे हालात में मजे उन विधायकों के हैं, जो खरीद-फरोख्त में ज्यादा विश्वास करते हुए, खुद को बेचने के लिए तैयार होंगे, आम जनता को तो नुकसान ही होगा। इसी नफे-नुकसान के बाद कर्नाटक के चुनाव परिणाम ने यह भी दिखा दिया कि मोदी मैजिक का जादू अब धीरे-धीरे उतर रहा है, ये मोदी भी गांठ बांध लें, नहीं तो 2004 में जैसे अटल बिहारी वाजपेयी को जनता ने फील गुड कराया था, 2019 में भी देश की जनता नरेन्द्र मोदी को फील गुड कराने के लिए प्रबंध कर ली है, बस आम जनता को लोकसभा चुनाव का इंतजार है।

अंत में, अब सब की नजर राज्यपाल की ओर है, कि वे किसे सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करते हैं। जिस दल को भी पहले आमंत्रित किया जायेगा, सच्चाई यहीं है कि वह मजबूत स्थिति में होगी और वह बहुमत साबित करने के लिए कुछ भी कर सकती है, क्योंकि मैंने पहले ही कहा कि अब कोई दल राजनीतिक शुद्धता की ओर ध्यान नहीं देती, वह सिर्फ यह देखती है कि सत्ता कैसे और किस प्रकार उसे मिल सकती है, और इसके लिए किसी एक को दोषी ठहराना पूर्णतः गलत है। भाजपा नेता येदियुरप्पा, कर्नाटक के राज्यपाल से मिल चुके और उन्होंने अपनी सरकार बनाने का दावा पेश किया है, यह कहते हुए कि कर्नाटक में उनकी पार्टी सिंगल लार्जेस्ट पार्टी है, पर क्या गवर्नर उनकी बातों पर अमल करेंगे, सवाल यह है? इधर जेडीएस के नेता भी थोड़ी देर के बाद गवर्नर से मिलेंगे तथा कांग्रेस और जेडीएस के विधायकों की सूची भी देंगे, जो बहुमत से कही अधिक है, ऐसे में गवर्नर के लिए डिसिजन लेना थोड़ा मुश्किल हैं, क्योंकि गवर्नर भी कहीं न कहीं, किसी न किसी राजनीतिक पृष्ठभूमि से ही होता है, इसलिए वेट एंड वॉच में रहिये, देखिये कर्नाटक में आगे कौन सा नाटक प्रारंभ होता है?

Krishna Bihari Mishra

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