कांग्रेस अपने अंदर झांके कि लाख बुराइयों के बावजूद जनता भाजपा को वोट क्यों दे रही?

मतदाताओं को दोष मत दीजिये, स्वीकार कीजिये कि जनता की नजरों में आज भी आप ग्राह्य नहीं हो रहे, उन कारणों को ढूंढिये, कि आखिर लोकसभा के उपचुनावों में जो जनता भाजपा को ठुकरा रही है, वहीं विभिन्न राज्यों की विधानसभा चुनावों में स्पष्ट बहुमत उसे कैसे थमा दे रही है? ये कहना कि आप बेहतर कर रहे हैं, अच्छा प्रशासन दे रहे हैं, फिर भी जनता आपको ठुकरा रही हैं, इसका मतलब जनता चाहती ही नहीं कि उन्हें बेहतर शासन मिले, वो सांप्रदायिक ताकतों के आगे झूक जा रही हैं, तो ये आपके लिए आत्महत्या करने के समान हैं। जनता की नब्जों को समझिये, क्योंकि भाजपा जनता की नब्जों को समझ चुकी है, और वह वहीं मुद्दे उठाती है, जो जनता को पसंद है, और लीजिये भाजपा आपको हर बार पटखनी दे रही है, जैसा कि कर्नाटक में आज देखने को मिला।

मैंने कई बार कहा कि कांग्रेस और अन्य दलों में जो सबसे बड़ा अंतर है, वह हैं नेताओं का। कांग्रेस और अन्य दलों को मालूम ही नहीं कि आज उनकी लड़ाई अटल बिहारी वाजपेयी या लालकृष्ण आडवाणी जैसे नेताओं से नहीं, बल्कि उनकी लड़ाई नरेन्द्र मोदी और अमित शाह जैसे लोगों से है, जो सिर्फ और सिर्फ जीतना जानते है, और उसके लिए वे बहुत हद तक जा सकते हैं। जरा देखिये प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का कर्नाटक में दिया गया बयान, जो कर्नाटक के हुबली में उन्होंने दिया – “कांग्रेस के नेता सुन लीजिये अगर सीमाओं को पार करोगे तो ये मोदी है, लेने के देने पड़ जायेंगे।” क्या ये एक प्रधानमंत्री की भाषा हो सकती है? इस धमकी भरी भाषा के खिलाफ पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को पत्र भी लिखा है। पत्र में उन्होंने ऐसे धमकी भरी भाषा की कड़ी आलोचना की है, तथा राष्ट्रपति से अनुरोध किया है कि वे प्रधानमंत्री मोदी को कांग्रेस नेताओं या अन्य किसी पार्टी के लोगों के खिलाफ अवांछित और धमकाने वाली भाषा का इस्तेमाल करने से रोके। अब सवाल है कि राष्ट्रपति को पत्र लिख देने से हमारे प्रधानमंत्री की भाषा ठीक हो जायेंगी और वे अपने विपक्षी दल के नेताओं के साथ मर्यादित भाषा का व्यवहार करेंगे?

कमाल है, जिस कर्नाटक में सांप्रदायिकता की आग में कई साहित्यकार-पत्रकार झूलस गये, जहां कई किसानों ने आत्महत्या कर ली, जहां सूखे ने पूरे प्रदेश की हालत खराब कर दी, जहां बेरोजगारी की ऐसी समस्या है, कि पूरे प्रदेश के युवाओं पर बेरोजगारी का अभुतपूर्व संकट मंडरा रहा हैं। भ्रष्टाचार के मुद्दे पर कांग्रेस और भाजपा के नेता एक दूसरे को बचाने में सारी सीमाएं लांघ जा रहे है। वहां का चुनाव परिणाम ऐसा आता है कि इसे देख पूरा देश हतप्रभ है।

जरा सोचिये, अगर कांग्रेस, जेडीएस मिलकर चुनाव लड़े होते तो क्या भाजपा बहुमत के करीब होती? क्योंकि चुनाव परिणाम तो बता रहे है कि जेडीएस ने भाजपा को जीताने और कांग्रेस को हराने में महत्वपूर्ण भूमिका इस बार निभा दी।

आश्चर्य है कि कांग्रेस को मालूम है कि नरेन्द्र मोदी ने अपने चार वर्ष के शासनकाल में सिर्फ हवाबाजी छोड़कर कोई करामात नहीं दिखाया। उनके मंत्रिमंडल के सारे के सारे मंत्री भी कोई ऐसी करामात नहीं दिखा पाये, जिनको लेकर उनकी चर्चा भी कही हुई हो। काला धन तो दूर, जो हमारे घर की महिलाएं अपने सुख-दुख के लिए जो कुछ धनसंचय करके रखी थी, उनके उस धनसंचय पर भी मोदी-जेटली एंड कंपनी ने डाका डाल दिया, स्वच्छता अभियान और सांसदों के गांव गोद लेने की योजना की हालत बहुत ही खराब है। फिर भी मोदी जीत रहे हैं, इसका मतलब क्या कि मोदी लोकप्रिय है ? नहीं।

कभी ऐसी ही जीत को लेकर बिहार के एक पूर्व क्षेत्रीय एवं लोकप्रिय नेता कर्पूरी ठाकुर ने कहा था कि कभी भी विकास के नाम पर चुनाव नहीं जीता जा सकता, विकास अलग चीज है और चुनाव में जीत पाना अलग चीज। हाल ही में 1990 से लेकर 2005 तक लालू-रावड़ी बिहार में राज करते रहे, कोई बता सकता है क्या कि विकास के नाम पर लालू-रावड़ी का बिहार पर शासन चलता रहा? लालू-रावड़ी का शासन पूरी तरह जातीयता को समर्पित रहा। अभी भी बिहार में जो नीतीश कुमार का शासन चल रहा है, वह विकास को समर्पित है क्या? अगर बिहार में विकास को लेकर ही चुनाव जीतना था तो फिर नीतीश को भाजपा को छोड़कर लालू के साथ क्यों चलना पड़ा? और फिर लालू को छोड़कर भाजपा की गोद में नीतीश कैसे और क्यों बैठ गये? क्योंकि नीतीश जानते है कि जातिगत समीकरण में बिहार में वे एक खास जाति के नेता है और बाकी जातियों को अगर उन्हें साथ नहीं मिला तो उन्हें सत्ता से बाहर जाने में ज्यादा देर नहीं लगेगी, इसलिए कभी कुर्मी-यादव-मुस्लिम और दलित का सहारा लिया तो कभी कुर्मी-सवर्ण-दलित-मुस्लिम का सहारा लिया।

कभी इसी प्रकार की राजनीति कांग्रेस भी किया करती थी। कांग्रेस सवर्ण-दलित-मुस्लिमों और अन्य पिछडों को मिलाकर बहुत वर्षों तक पूरे देश तथा देश के अन्य राज्यों में शासन करती रही, पर अब वहीं राजनीति भाजपा भी करने लगी है, पर भाजपा मुस्लिमों के जगह हिन्दूत्व का झंडा पकड़ ली है, जिसका फायदा उसे मिल रहा है, पर ये फायदा ज्यादा दिनों तक नहीं चलेगा, क्योंकि देश में कोई भी चीजें ज्यादा दिनों तक नहीं चलती। जिस जनता ने 1984 में राजीव गांधी को शानदार सफलता दी, वहीं जनता ने 1990 में उन्हें बाहर का रास्ता भी दिखाया। जिस जनता ने लगातार अटल बिहारी वाजपेयी को तीन बार लगातार सत्ता दिलाया, उसी जनता ने 2004 में बाहर का रास्ता भी दिखाया, जिस जनता ने 1977 में जनता पार्टी की सरकार बनायी फिर उसी जनता ने 1980 की मध्यावधि चुनाव में कांग्रेस को सत्ता भी सौंपी।

जो लोग ये सोचते है कि नरेन्द्र मोदी का कोई विकल्प नहीं हैं, वे मूर्ख हैं, क्योंकि किसी भी नेता का कौन नेता विकल्प बनेगा, ये नेता या पार्टी नहीं चुनती, जनता चुनती है, क्या कोई बता सकता है? कि 2004 के लोकसभा के चुनाव में किसी को पता था कि भारत का अटल बिहारी वाजपेयी के बाद प्रधानमंत्री कौन होगा, पर मनमोहन सिंह लगातार दस वर्षों तक प्रधानमंत्री बने रहे, आप भले ही पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को गलत बोलते रहे, पर ये भी सत्य है कि कई देशों ने उनकी दूरदर्शिता और ईमानदारी की सराहना भी की है।

सच्चाई तो यह है कि जिन लोगों ने 2014 के लोकसभा चुनाव में भ्रष्टाचार का मुद्दा बनाकर चुनाव लड़े, सफलता पाई, चार साल से सत्ता का स्वाद चख लिये फिर भी उनकी भी हिम्मत नहीं कि वे कांग्रेस के किसी नेता को भ्रष्टाचार के आरोप में जेल भिजवा दें, जबकि भाजपा के ही शासनकाल में कई ऐसे घोटाले हुए, जिसे सुनकर देश का सर शर्म से झूक जाता है, कौन नहीं जानता कि कारगिल युद्ध के दौरान हमारे देश के कितने जवानों ने अपने प्राणों की आहुति दे दी, आखिर कारगिल युद्ध किसकी देन थी?

कांग्रेस और अन्य दलों को कर्नाटक चुनाव परिणाम के बाद चिन्तन करने की जरुरत है, क्योंकि 2019 का लोकसभा का चुनाव आने में कोई ज्यादा दिन नहीं है, उसके पहले मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में विधानसभा के चुनाव होने है, जो इन तीन प्रदेशों की स्थिति है, वहां भाजपा का सत्ता में आना मुश्किल सा लग रहा है, ये भाजपा के लोग भी जानते है, पर जो स्थिति हैं, कहीं ऐसा नही कि आप इन प्रदेशों से भी हाथ धो दें। अभी से चुनावी रणनीति बनाइये, सोचिये, और उन लोगों से सम्पर्क बनाइये जो आपको बेहतर स्थिति में निशुल्क प्लानिंग करने को तैयार है, क्योंकि ये मत भूलिये कि मात्र चार सालों में इस नरेन्द्र मोदी सरकार ने केवल अपना चेहरा चमकाने में 4,314 करोड़ रुपये फूंक दिये है, और ये जानकारी सूचना के अधिकार के माध्यम से केन्द्र सरकार ने ही एक आरटीआइ कार्यकर्ता अनिल गलगली को उपलब्ध कराई है, जरा सोचिये जो व्यक्ति या सरकार अपना चेहरा चमकाने के लिए 4,314 करोड़ रुपये विज्ञापन पर फूंक सकता है, वह देश को कैसे और किस प्रकार से अपनी सेवा दे रहा है।

आप ये कहेंगे कि आरएसएस के कारण भाजपा पूरे देश में जीत रही हैं तो भाई आप कर क्या रहे हैं? आप भी ऐसी संस्था बनाइये जो उसका जवाब दे सकें, पर आप व्यक्ति विशेष को केन्द्र बनाकर चलियेगा और सोचियेगा कि आरएसएस को जवाब दे देंगे, तो नहीं होगा। भला कौन नहीं जानता की भाजपा आरएसएस की एक राजनीतिक विंग है, और जब भाजपा राजनीतिक विंग है तो कोई भी मातृ संस्था अपने विंग की सफलता के लिए क्यों नहीं कुछ करेगी।

ये मत भूलिये कि कर्नाटक में मुस्लिमों, अनुसूचित जाति-जन जाति के लोगों ने भी भाजपा के पक्ष में वोट किये है, जनता, जनता  होती है, वह किसी की नहीं होती, बड़ी मूडियल होती है, फिलहाल भाजपा के पक्ष में उसका मूड है, उसके मूड को बदलने में लगिये, नहीं तो देश का जो होना है, वो तो हो ही रहा है, आपका भी ठीक नहीं ही होना है।

और अब बात पत्रकारों की…

देश के ज्यादातर चैनल आज भाजपा और कांग्रेस के कार्यकर्ता के रुप में नजर आये। कई भाजपाई चैनल और उनके एंकर इस प्रकार समाचार परोस रहे थे, जैसे लग रहा था कि वे भाजपा कार्यकर्ता हो, दूसरी ओर कई भाजपा विरोधी चैनल और उनके एंकर इस प्रकार समाचार परोस रहे थे, जैसे लग रहा था कि वे कोई शोक समाचार पढ़ रहे हो। ये देश के लिए दुर्भाग्य है। पत्रकारों को इससे क्या मतलब? कौन जीत रहा है या कौन हार रहा है? आप पत्रकार रहिये, देश को समाचार दीजिये, सत्य का दर्शन कराइये, अगर जनता बेहतरी के लिए वोट की है, तो जनता को उसका लाभ मिलेगा और जनता ने किसी लोभ या लालच में आकर अपने वोट की ऐसी की तैसी की तो जनता भुगतेगी, हमें उससे क्या?