राजनीति

उतावला होकर जब कोई खुद को जगदीश्वर मान लें तो ऐसे ही शब्द निकलेंगेः नामधारी

झारखण्ड के प्रथम विधानसभाध्यक्ष इंदर सिंह नामधारी कल विधानसभा में घटी घटना और मुख्यमंत्री रघुवर दास द्वारा विपक्षी नेताओं के खिलाफ बोले गये आपत्तिजनक शब्दों को लेकर काफी मर्माहत है। कल विधानसभा में मुख्यमंत्री रघुवर दास द्वारा दिये गये आपत्तिजनक बयान और राज्य की अन्य महत्वपूर्ण राजनीतिक बिंदुओं पर विद्रोही 24.कॉम ने उनसे बातचीत की। प्रस्तुत हैं, उसके कुछ अंश…

विद्रोही 24 – जिस प्रकार से मुख्यमंत्री रघुवर दास ने विधानसभा में अपने विरोधियों के लिए आपत्तिजनक शब्दों का प्रयोग किया, इस पर आप क्या कहेंगे?

इंदर सिंह नामधारी – राजनीति में आप कितने गंभीर हैं, ये काफी मायने रखता है। दूसरे की विचारों को सुनना, उन्हें अपनाना कोई सामान्य बात नहीं, पर जब आप उतावला होकर दिल्ली के ईश्वर बनने और जगदीश्वर बनने का ख्वाब पाल लें, तो फिर आप दूसरों की बातें कैसे सुनेंगे, ऐसे में तो वहीं बातें निकलेंगी, जो कल सीएम रघुवर दास के मुख से निकल गई, जो निकलना ही नहीं चाहिए।

विद्रोही 24 –  आम जनता का कहना है कि जो आपत्तिजनक शब्द बाते सीएम द्वारा कही गई और बाद में विधानसभा में महत्वपूर्ण पद पर बैठा व्यक्ति ये कहें कि हमने ऐसा सुना नहीं, इस मामले की जांच करायेंगे, अगर ऐसा हुआ तो सदन की कार्यवाही से उसे बाहर किया जायेगा?  तो जहां पर लाउडस्पीकर लगे हैं, किसी बातों को पुनः सुनने की सारी सुविधाएं उपलब्ध हैं, वहां जब लोग एक दूसरे की बात नहीं सुन रहें तो आम जनता की बातें क्या सुनेंगे?  ये जनता का विचार हैं, आप क्या कहेंगे?

इंदर सिंह नामधारी – आदमी सदन में बैठा है, कुर्सी पर बैठा है, हम स्पीकर है, खड़ा होकर बोले या जैसे भी बोले, कान में बात आ ही जाती है, अगर कुछ स्पष्ट नहीं सुना तो लोगों से राय ले ली जाती है, और उसका परिमार्जन तुरंत कर दिया जाता है। सदन भी एक घर है, सदन मेल-जोल से चलता है, रुठे को मनाना भी चाहिए। कोई विधायक जब अपने इलाके में जाता हैं, तो उसे अपनी जनता के उलाहने सुनने पड़ते हैं, ऐसे में वह जनता की बात कहां करेगा, सदन में ही करेगा, इसलिए सबकी ध्यान से सुनने की आवश्यकता है, लेकिन अफसोस, अब सुननेवाले कम और सुनानेवाले ज्यादा हो गये।

विद्रोही 24 – झाविमो विधायकों के दल-बदल से संबंधित केस लंबा खींच रहा हैं, ऐसे में तो अगला चुनाव का समय नजदीक आ जायेगा, ऐसे में ये लंबी प्रक्रिया नहीं लगता कि जान-बूझकर सरकार को राहत देने के लिए खींची जा रही है?

इंदर सिंह नामधारी – हमें लगता है कि केस कब तक चलना चाहिए? इसका समय निर्धारण आवश्यक है।

वास्तव में इस पर संविधान संशोधन आवश्यक हैं। पूर्व में दल-बदल को लेकर एक मौका स्पीकर को दिया गया। इसके बाद हाई कोर्ट जाने का प्रावधान किया गया, लेकिन देखा जा रहा है कि चूंकि स्पीकर दल से संबंधित होता है, सत्तारुढ़ दल से संबंधित होता है, ऐसे में वह खुलकर निर्णय नहीं ले पाता। हमें चाहिए कि इसमें भी समय निर्धारण हो, कि एक स्पीकर को इस मामले को सुलझाने के लिए कितना समय होना चाहिए। इसके लिए एक साल काफी है, और इसे जल्द संविधान में संशोधन करके मामले को सलटाना चाहिए, नहीं तो जिसकी सत्ता होगी, वह अपने हिसाब से दल-बदल के मामले खीचेंगा और सत्तारुढ़ दल को फायदा पहुंचाने की कोशिश करेगा।

विद्रोही 24 – अब सवाल उठता है कि स्पीकर को संविधान के प्रति संवेदनशील होना चाहिए, सरकार के प्रति संवेदनशील होना चाहिए, दल के प्रति संवेदनशील होना चाहिए या अपने नैतिक बल के प्रति संवेदनशील होना चाहिए?

इंदर सिंह नामधारी – हमारे विचार से उसे अपने नैतिक बल और संविधान के प्रति सर्वाधिक संवेदनशील होना चाहिए, तभी वह सदन की गरिमा को बरकरार रख सकता हैं, नहीं तो वहीं होगा, जो आज यत्र-तत्र-सर्वत्र दिखाई पड़ रहा हैं। हमारे समय में भी ऐसा ही मामला दल-बदल से संबंधित एनोस एक्का का आया था, हमें याद  है कि मधु कोड़ा के समय लालू प्रसाद यादव ने हम पर दबाव भी डाला और गलत काम करानी चाही और कहा कि आनेवाले समय में भी स्पीकर आप ही रहेंगे। मैंने स्पष्ट तौर पर लालू प्रसाद यादव को कहा था कि माफ करें, मैं उधार का स्पीकर बनना नहीं चाहता, करुंगा वहीं जो संविधान और हमारी नैतिकता कहती है। मैंने यह भी उन्हें कह दिया था कि अगर आज अर्जुन मुंडा इस्तीफा दे देते हैं, तो हमें स्पीकर के पद से इस्तीफा देने में भी तनिक देर नहीं लगेगी।

विद्रोही 24 – क्या करें, स्पीकर अगर कोई सुने नहीं तो, क्या मार्शल का उपयोग सही हैं?

इंदर सिंह नामधारी – अगर कोई उद्दंडता करता हैं, तो उसे समझाइये, अपने चैंबर में बुलाइये, बार-बार सदन को प्रभावित करता है, सदन को थोड़े समय के लिए स्थगित करिये, उसे बुलाइये चैंबर में, समझाइये, सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच तालमेल बिठाइये, प्रयास करिये, अंतिम विकल्प को प्रथम विकल्प मत बनाइये। हमें याद हैं कि जब भाकपा माले विधायक महेन्द्र प्रसाद सिंह किसी बात को लेकर उत्तेजित होते थे, तो उन्हें हम मनाने की कोशिश करते थे, वे मानते भी थे।

विद्रोही 24 – अपना झारखण्ड किशोरावस्था में पहुंच गया, आप भी कई वर्षों तक सदन की शोभा रहे हैं, कहां पहुंच रहा हैं अपना झारखण्ड?

इंदर सिंह नामधारी – अभी जरुरत हैं विधानसभा में आये जनप्रतिनिधियों को सीखने की। मर्यादा, भाषा, शब्द तथा गहन चिन्तन के माध्यम से राज्य की सेवा करने की सीख की। कई सरकार आये, कई एमओयू हुए, क्या मिला झारखण्ड को?  आज भी लोग जरुरत की चीजों के लिए दूसरों का मुंह देख रहे हैं। कल की ही बात है एक गरीब लड़की, जिसकी केहुनी टुट गई थी, मैंने उसे सदर अस्पताल जाकर केहुनी की इलाज कराने की बात कही, उस लड़की से 30 हजार रुपये की मांग कर दी गई। मैं खुद जब उस अस्पताल में गया और डाक्टर से बात की कि आखिर इस गरीब से 30 हजार रुपये क्यों मांगे गये, तीन-तीन बार हमें दौड़ लगानी पड़ी, जरा बताइये कि उसकी केहुनी टुटी हुई है, उससे शादी कौन करेगा? उसकी जिंदगी तो नरक बन जायेगी, ये स्थिति है, झारखण्ड की, हम क्या करें?  कुछ समझ नहीं आता, फिर भी कोशिश रहती है, कि कुछ ठीक हो जाये।