पं. नेहरु ने दिया, वाजपेयी ने बेचने का प्रयास किया और मोदी एचइसी को बेचे देंगे!

जरा भारतीय जनता पार्टी के नेताओं से पूछिये कि आपके यहां से दो-दो व्यक्ति प्रधानमंत्री बने, इन प्रधानमंत्रियों के शासनकाल में कितने उद्योग धंधे लगे? जो भी उद्योग धंधे लगे है, वे कांग्रेस के ही शासनकाल में। पं. जवाहर लाल नेहरु तो जब भी कल-कारखानों को देखा करते, तो इन्हें मंदिर कहा करते तथा श्रमिकों को उस मंदिर के पुजारी की संज्ञा देते, पर जैसे-जैसे समय बीतता गया, भारतीयों और भारतीय नेताओं में व्याप्त भ्रष्टाचार ने इन कल-कारखानों की सूरत बदलनी शुरु कर दी और एक-एक कर हमारे ये मंदिर रुपी कल-कारखानें घाटे में चलने लगे और स्थिति ऐसी हो गई की वह बंदी के कगार पर पहुंच गई।

आश्चर्य यह भी है कि एक ओर सरकारी कल-कारखाने या भारत सरकार के उपक्रम के रुप में जाने-जानेवाले ये कल-कारखाने बंद होने लगे, वहां की स्थिति बदतर होने लगी, इन कल-कारखानों के कारण जो शहर बसते जा रहे थे, जहा की रौनक देखते बनती थी, वह रौनक इन कल-कारखानों के बंद होते ही श्मशान के रुप में तब्दील हो गई, जो इस रुप को देखना चाहते हैं, वह झारखण्ड के ही सिंदरी में जाकर देख लें, वहां की क्या स्थिति है? यह वही सिंदरी है, जहां देश का पहला कारखाना खाद कारखाने के रुप में जन्म लिया। जहां विदेशी नेताओं का तांता लगा रहता था। जब भी कोई विदेशी नेता भारत आता तो प्रधानमंत्री पं. नेहरु इन कल-कारखानाओं तथा भारत निर्माण के लिए लग रहे इन उद्योगों को शान से दिखाना नहीं भूलते, पर उन्हें क्या पता कि आनेवाले समय में उनकी आनेवाली पीढ़ी इसे संजो कर नही रखेगी। भारत आजादी के 70 सालों में आर्थिक गुलामी की ओर ऐसा बढ़ेगा कि उसकी एक-एक कारखाने विदेशियों के चंगुल में चले जायेंगे।

दुख इस बात का है कि यहीं का व्यक्ति जब विदेशों में या भारत के ही निजी कंपनियों, कल-कारखानों में काम करता है तो वह कंपनियां, कल-कारखाने लाभ पर चल रहे होते हैं और जैसे ही इन पर सरकारीकरण का ठप्पा लगता है, ये कंपनियां और कल-कारखानें दांप निपोर रहे होते है। आज एचइसी को लेकर हो-हल्ला मचा है, ये हो-हल्ला इसलिए मचा है कि भारी उद्योग मंत्री अन्नत गीते ने एचइसी रांची को बेचने की तैयारी कर दी है, ये तैयारी उस वक्त भी हुई थी, जब अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री थे, ये वहीं प्रधानमंत्री थे, जिन्होंने अपने शासनकाल में एक विनिवेश मंत्रालय तक खोल दिया था, इधर फिर एचइसी को बेचने का मामला उठा तो झारखण्ड के सांसदों की नींद टुटी और दस की संख्या में प्रधानमंत्री कार्यालय पहुंचे, पर प्रधानमंत्री के नहीं होने के कारण उनकी मुलाकात नहीं हो सकी, इधर प्रधानमंत्री कार्यालय ने इन दस सांसदों में से पांच सांसदों को प्रधानमंत्री से मिलने की अनुमति दे दी है। संभवतः ये आज मिलेंगे और अपना दुखड़ा रोयेंगे, शायद बतायेंगे कि इससे बेरोजगारी बढ़ेगी, सम्मान व गौरव प्रभावित होगा तथा भाजपा आनेवाले समय में जनता की नजरों से गिर जायेगी।

ऐसे भी भाजपा इन तीन सालों में झारखण्ड और पूरे देश की नजरों में कब की गिर चुकी है। कारण स्पष्ट है, क्योंकि हमारे प्रधानमंत्री जो कल तक मेक इन इंडिया की बात कर रहे थे, आज कल-कारखानों को दूसरे के हाथों में देने का काम कर रहे है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के इस कार्य से राज्य की जनता गुस्से में है, ज्यादातर गुस्से में तो वे लोग हैं, जिन्होंने अपनी जमीन एचइसी को दी, और आज भी वे विस्थापन का दंश झेल रहे हैं, वे तो साफ कहते है कि दूसरों को आप क्यों दोगे? ये जमीन उन्हें वापस लौटाओं, वे उसमें खेती करेंगे, और उनका ये कहना किसी भी प्रकार से गलत भी नहीं।

इधर राजनीतिक दलों तथा विभिन्न श्रमिक संगठनों ने एचइसी को सम्मान के साथ जोड़ लिया, धरना-प्रदर्शन का माहौल है, ऐसे में जैसे-जैसे इस विषय पर देरी होगी, भाजपा और भी जनता की नजरों से गिरती जायेगी, इतना तो तय जरुर हो गया है कि झारखण्ड में भाजपा अब तो किसी भी हालत में नहीं ही आयेगी, चाहे वे भाजपा वाले जितना जोर लगा ले।

One thought on “पं. नेहरु ने दिया, वाजपेयी ने बेचने का प्रयास किया और मोदी एचइसी को बेचे देंगे!

  • February 9, 2018 at 9:47 am
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    हमें लगता है भाजपा अहंवाद से पीड़ित है,उन्हें स्वयं के लाभुक अथवा अंधभक्त के अलावे सबको कुचल कर राज कायम रखने का कुमंत्र मिल गया है..जिसका अंत वही होगा जहां से ये शुरू हुए थे..मल्लब
    पुनरमुश्को भवः। 02 सीट
    ये वही काम करेंगे जिससे इनके निजी चमचे लाभान्वित हो,और उसका कमिसन जिबके झोली में आ जाए।

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