दैनिक भास्कर का कमीनापन देखियेः मां गंगा को किया राक्षसी के रूप में पेश
दैनिक भास्कर का कमीनापन या दोगलापन कहिये। आज उसने ऐसी हेडिंग लगाई है। जिस हेडिंग को देख भारत की धर्मप्राण जनता आहत है। लेकिन भारत की धर्मप्राण जनता आहत हो। उससे दैनिक भास्कर को क्या मतलब? उसे तो अपने कमीनेपन या दोगलापन कहिये। उसे प्रदर्शित करने से सिर्फ मतलब है। इस अखबार ने आज अपने प्रथम पृष्ठ पर बिहार में हुई हृदय विदारक खबर को प्रमुखता दी है। जिसकी हेडिंग लगाई है – ‘बिहार में नाव पलटीः भोज में जा रहे 13 बच्चे गंगा का भोग बने।’
अब सवाल उठता है कि जिस देश की जनता, गंगा को मां कहकर पुकारती है। उसे मोक्षदायिनी, मुक्तिदायिनी, भागीरथी, त्रिपथगा, शिवजटानिवासिनी आदि नामों से पुकारती है। जिनके बारे में महाकवि विद्यापति कहते हैं –
बड़ सुख सार पाओल तुअ तीरे।
छोड़इत निकट नयन बह नीरे।।
कर जोरि बिनमओ विमल तरंगे।
पुन दरसन होए पुनमति गंगे।।
उस गंगा को दैनिक भास्कर जैसे नीच अखबार ने मां राक्षसी के रूप में कैसे और क्यों पेश कर दिया? क्या बिहार में घटी इस हृदय विदारक घटना को लेकर उसके पास शब्दों की कमी थी? या शब्द का अकाल पड़ गया था? या इसी समाचार में उसे विद्वता झलकाने की सनक सवार हो गई थी?
इस अखबार में इस न्यूज को देनेवाले रिपोर्टर, न्यूज को देखनेवाले समाचार सम्पादक और अखबार में स्थानीय संपादक की जगह पर अपना नाम छपवानेवाले संपादक की संवेदनशीलता कहां मर गई थी? जिसने बच्चों के शव को गंगा का भोग के रूप में पेश कर दिया।
क्या इस अखबार में काम करनेवाले लोगों की मां नहीं हैं और अगर मां है तो उनकी मां का आहार इसी प्रकार का है? क्या मां ऐसी ही होती है? आखिर इन बेशर्मों को शर्म कब आयेगी? आश्चर्य होता है कि यहां काम करनेवाले ऐसे लोगों को कोई संस्थाएं अपने यहां बुलाकर सम्मानित कैसे कर देती है?
वरिष्ठ पत्रकार ज्ञानेन्द्र नाथ कहते है कि दैनिक भास्कर द्वारा दी गई यह हेडिंग अमानवीय, गैरजिम्मेदार, असंवेदनशील है। जिसने यह हेडिंग लगाई है, वो पत्रकार हो ही नहीं सकता, क्योंकि हर पत्रकार के अंदर मानवीयता, समाज के प्रति जिम्मेदारी व संवेदनशीलता तो होनी ही चाहिए। ऐसे अखबार को सीधे कूड़ेदान में डाल देना चाहिए। आगे वे कहते है कि उन्हें खुशी है कि वे अब पत्रकार नहीं रहे, नहीं तो उन्हें शर्मिंदगी उठानी पड़ती। बदकिस्मती है कि जिस अखबार में इस प्रकार की हेडिंग छपी है, उस अखबार को पत्रकारिता जगत की सूची में नाम लिया जाता है।
वरिष्ठ पत्रकार बैजनाथ मिश्र कहते है कि दैनिक भास्कर ने इस प्रकार की हेडिंग लगाकर गलत किया है। यहां भोग का तारतम्य सही नहीं बैठ रहा, क्योंकि भारत में मां गंगा के लिए इस प्रकार के शब्द सही नहीं बैठते। आश्चर्य यह भी है कि विद्रोही24 ने सामान्य लोगों से भी जब इससे संबंधित सवाल पूछे तो उन सामान्य लोगों के मुख से यही निकला कि दैनिक भास्कर जैसा अखबार इतनी घटिया शब्द का प्रयोग मां गंगा के लिए कैसे कर दिया?
