उ सब से बदबू आ रहा होगा तभी न अखबार नहीं आदोलन वाला संपादक जेएससीए के अधिकारियों को लिखा होगा कि बड़े अफसरों को पास मत दो, क्योंकि उनके पास पर नौकर, ड्राइवर, बॉडीगार्ड मैच देखने पहुंच जाते हैं
रांची में एक बहुत बड़ा अखबार है। सुना है कि वो अखबार नहीं आंदोलन है। वो ऐसा आंदोलन करता है कि उनके आंदोलन से आम जनता को कितना फायदा होता है, ये तो आम जनता जाने। लेकिन वहां काम करनेवाले ज्यादातर संपादक टाइप के लोग अंतिम क्षणों में परमानन्द को जरूर प्राप्त कर लेते हैं। कोई राज्य में, तो कोई केन्द्र में सूचना आयुक्त बन जाता है, कोई राजनीतिक दल की कृपा से राज्यसभा चला जाता है, बाद में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की कृपापात्र हो जाने से उप सभापति भी बन जाता है।
इनके चाहनेवालों की संख्या भी बड़ी मात्रा में होती है। जैसे ही ये कुछ लिखते हैं। उनके चाहनेवाले उनके पोस्ट पर जाकर, कमेन्टस में जाकर लोटने लगते हैं। शायद यही कारण है कि ये संपादक टाइप के लोग, चाहे उस संस्थान में संपादक रहे अथवा न रहे। उन्हें लगता है कि वे जो कुछ भी कही बोल देंगे या कही लिख देंगे। लोग उनकी जय-जयकार अवश्य करेंगे। सच्चाई भी है, कि उनकी जय-जयकार होती है।
ये आधुनिक टाइप संपादक गोत्र से आनेवाले लोग बॉडीगार्ड, ड्राइवर, घर के नौकरों या कहिये कि चतुर्थ श्रेणी के लोगों को इतना तुच्छ समझते हैं कि वे इन्हें अपने आस-पास फटकते हुए भी देखना नहीं चाहते। अगर इन्हें पता चल गया कि इस टाइप के लोग उसके अगल-बगल से होकर गुजरे हैं। तो ये आसमां सर पर उठा लेते हैं और लगे हाथों उनलोगों को दिशा-निर्देश भी दे देते हैं कि इस प्रकार का माहौल उन्हें दोबारा देखने को नहीं मिले।
ऐसे आधुनिक टाइप संपादक गोत्र से आनेवाले सोच के लोगों का राज्य के विभिन्न राजनीतिक दलों के बड़े-बड़े नेता व झारखण्ड स्टेट क्रिकेट एसोसिएशन के बड़े-बड़े पदाधिकारी बड़ा ख्याल रखते हैं। रांची में भारत के साथ किसी भी देश का मैच क्यों न हो? ये बड़े-बड़े पदाधिकारी इस बात का ध्यान जरूर रखते है कि ऐसे आधुनिक टाइप संपादक गोत्र से आनेवाले लोगों को पर्याप्त मात्रा में मैच देखने का पास मिला या नहीं? यहीं नहीं अगर इनके द्वारा पास की संख्या बढ़ाने का अनुरोध कर दिया गया, तो पासों की संख्या बढ़ाने में इन पदाधिकारियों को कोई दिक्कत नहीं होती, क्योंकि ऐसे पदाधिकारियों को लगता है कि ऐसे ही संपादक उनके जीवन के परमोद्धारक हैं।
इन्हीं परमोद्धारकों में से एक संपादक ने दस अक्टूबर को सोशल साइट पर एक पोस्ट किया। पोस्ट था – भारत-वेस्टइंडीज टी 20 मैच के आयोजन के लिए जेएससीए अध्यक्ष अजयनाथ शाहदेव, सौरभ तिवारी, संजय पांडेय और अन्य पदाधिकारियों को बधाई। बेहतरीन आयोजन था। व्यवस्था भी ठीक। सिर्फ एक आग्रह, बड़े अफसरों को पास देने से बचें। बॉडीगार्ड, ड्राइवर, घर के नौकर उनके पास पर मैच देखने पहुंचते हैं।
अब चूंकि इस संपादक ने ऐसी बात लिख दी है, तो जेएससीए के वरीय पदाधिकारी बात नहीं मानें, यह कैसे हो सकता है? आनेवाले समय में इनके लिखने का प्रभाव अवश्य दिखेगा। बड़े अफसरों के पास पर आनेवाले समय गाज गिरेंगी ही। लेकिन, इसी संपादक के इस वक्तव्य पर, कई लोगों ने उसके पोस्ट पर ही कमेन्ट्स के माध्यम से उक्त आधुनिक टाइप संपादक गोत्र से आनेवाले संपादक की धज्जियां उड़ा दी और उसकी घटिया सोच पर प्रश्न चिह्न लगा दिये।
आप भी उसके पोस्ट पर जाकर वे कमेन्ट्स देख सकते हैं। एक ने लिखा -बॉडीगार्ड और ड्राइवर भी इंसान है सरजी, उनको भी उम्मीद रहता है। इसी पल का कि पास मिल जायेगा, बड़े लोगों के साथ रहकर। एक रांची से ही लोकप्रिय चैनल से जुड़े पत्रकार ने लिखा – अधिकारियों के घर काम करनेवाला गरीब नौकर मैच देख लेता है तो क्या दिक्कत है सर। ये तो और अच्छी बात है। एक ने लिखा कि उ सब से बदबू आ रहा था क्या?
अब बदबू आ रहा होगा, तभी न उक्त संपादक ने ऐसा लिखा होगा। धन्य है ऐसी सोच और धन्य है जेएससीए के अजय नाथ शाहदेव, सौरभ तिवारी, संजय पांडेय जैसे लोग। जो ऐसे लोगों की विशेष खातिरदारी में लगे रहते हैं। जरा सोचिये, जब वे ड्राइवर जो किसी अधिकारी का वाहन चलाते हैं या घरों में नौकरों का काम करते हैं या बॉडीगार्ड होंगे या इन सभी के परिवारों के बच्चों के पास से ऐसे संपादक की इस घटिया सोच का वक्तव्य उनके सामने से गुजर रहा होगा तो उनके उपर क्या बीतती होगी? वे तो यही समझते होंगे कि आज का समाज उन्हें दोयम दर्जें से भी नीचे का आदमी समझता है।
