अटल ने प्रोजेक्ट को स्वीकृति दी-शिलान्यास किया, मनमोहन सिंह ने रोका, नरेन्द्र मोदी ने पूरा किया

एशिया का दूसरा सबसे बड़ा और भारत का सबसे लंबा पुल बनकर तैयार है, चीन से सटे अरुणाचल प्रदेश तक पहुंचने, सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण और असम तथा अरुणाचल प्रदेश को एक दूसरे से जोड़ने की कड़ी के रुप में बनकर तैयार पुल प्रत्येक भारतीयों के लिए गर्व का प्रतीक हैं, इस पुल की विशेषता है कि इसके उपर थ्री लेन सड़क तथा नीचे दोहरी रेल लाइन भी है, पुल में कही भी रिपीट का इस्तेमाल नहीं किया गया।

एशिया का दूसरा सबसे बड़ा और भारत का सबसे लंबा पुल बनकर तैयार है, चीन से सटे अरुणाचल प्रदेश तक पहुंचने, सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण और असम तथा अरुणाचल प्रदेश को एक दूसरे से जोड़ने की कड़ी के रुप में बनकर तैयार पुल प्रत्येक भारतीयों के लिए गर्व का प्रतीक हैं, इस पुल की विशेषता है कि इसके उपर थ्री लेन सड़क तथा नीचे दोहरी रेल लाइन भी है, पुल में कही भी रिपीट का इस्तेमाल नहीं किया गया और इसे वेल्डिंग द्वारा जोड़कर खड़ा किया गया है, सूत्र बताते है कि स्वीडन और डेनमार्क को एक दूसरे से जोड़नेवाले पूल के सदृश इस पुल को निर्मित किया गया है।

1998 में जब भारत के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी थे, तब उन्होंने इस पुल के प्रोजेक्ट को स्वीकृति दी थी, तथा इसका शिलान्यास उन्होंने 2002 में किया, जैसे ही 2004 में मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बने ब्रिज का काम बंद करवा दिया गया और उनके शासनकाल 2014 तक यह बंद ही रहा, जैसे ही 2014 में पीएम के रुप में नरेन्द्र मोदी ने भारत की बागडोर संभाली, नरेन्द्र मोदी की नजर अटल बिहारी वाजपेयी के इस बहुआयामी प्रोजेक्ट पर गई और इसे उन्होंने अपने प्रधानमंत्रित्व काल में ही इसे पूरा करने का फैसला लिया।

शायद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जानते थे या आशंका था कि अगर फिर कांग्रेस की सरकार आई तो इस प्रोजेक्ट का बंटाधार हो जायेगा, और लीजिये असम और अरुणाचल प्रदेश को जोड़नेवाला, सामरिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण यह पुल बनकर तैयार है, जिसे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, अटल बिहारी वाजपेयी के जन्मदिवस के दिन यानी 25 दिसम्बर को इसका उद्घाटन करेंगे।

सूत्र बताते है कि इस पुल को बनाने में कई चुनौतियां थी, एक तो ब्रह्मपुत्र नदी का बहाव तो दूसरी यहां होनेवाली लगातार बारिश, पर इसके बावजूद इस प्रोजेक्ट को पूरा करने में लगे लोगों ने हार नहीं मानी और देश को ये शानदार, ऐतिहासिक तथा सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण बोगीबील पुल दे ही दिया। बताया जाता है कि इस पुल के शुरु हो जाने के बाद अरुणाचल और असम के बीच की दूरी 400 किलोमीटर तक कम हो जायेगी। यह पुल 4.94 किलोमीटर लंबा, ब्रह्मपुत्र नदी से 32 मीटर ऊंचा और 42 खंभों पर टिका है, इसके निर्माण में 5800 करोड़ रुपये की लागत आई है।

आश्चर्य यह भी है कि सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण इस पुल को रोकने में कांग्रेस सरकार ने क्यों ज्यादा दिमाग लगाई, समझ से परे है, जबकि तत्कालीन पीएम मनमोहन सिंह को भी पता ही होगा, कि यह पुल देश के लिए, खासकर सैनिकों के साजो समान ले जाने के लिए कितना महत्वपूर्ण हैं, फिर भी दस साल तक लगी इस पर रोक ने भारत को कितना पीछे छोड़ दिया, ये समझने की ज्यादा जरुरत है, चलिए, अब बोगीबील पुल बनकर तैयार हैं, खुशी मनाइये कि पीएम नरेन्द्र मोदी इस पुल को, 25 दिसम्बर को देश को समर्पित करने जा रहे हैं, बधाई असम और अरुणाचल प्रदेश के लोगों को, बधाई नार्थ-इस्ट के लोगों को, इस पुल के बन जाने से उनकी परेशानियों में भारी कमी आयेगी।

Krishna Bihari Mishra

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