रांची के दो प्रमुख स्थानों पर बड़ी संख्या में रमणिका गु्प्ता को श्रद्धाजंलि देने पहुंचे वामपंथी साहित्यकार-समाजसेवी

रांची के दो स्थानों पर विभिन्न संगठनों के बैनर तले सुप्रसिद्ध साहित्यकार रमणिका गुप्ता के प्रति श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिए बड़ी संख्या में लोग इकट्ठे हुए। पहला कार्यक्रम सीपीएम कार्यालय के सफदर सभागार में हुआ तो दुसरा कार्यक्रम कांटा टोली स्थित ऑडी शो रुम के पीछे अभिलाषा अपार्टमेंट में संपन्न हुआ। दोनों जगहों पर बड़ी संख्या में इक्ट्ठे हुए साहित्यकारों-समाजसेवियों की टीम ने रमणिका गुप्ता को भावभीनी श्रद्धाजंलि दी।

रांची के दो स्थानों पर विभिन्न संगठनों के बैनर तले सुप्रसिद्ध साहित्यकार रमणिका गुप्ता के प्रति श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिए बड़ी संख्या में लोग इकट्ठे हुए। पहला कार्यक्रम सीपीएम कार्यालय के सफदर सभागार में हुआ तो दुसरा कार्यक्रम कांटा टोली स्थित ऑडी शो रुम के पीछे अभिलाषा अपार्टमेंट में संपन्न हुआ। दोनों जगहों पर बड़ी संख्या में इक्ट्ठे हुए साहित्यकारों-समाजसेवियों की टीम ने रमणिका गुप्ता को भावभीनी श्रद्धाजंलि दी।

हिन्दी साहित्य में आदिवासी-दलित -महिला और वंचित-हाशिये के समाज की पीड़ा और संघर्ष को साहित्यिक स्वर देनेवाली जानी मानी वामपंथी जन साहित्यकार श्रद्धेय रमणिका गुप्ता के निधन पर जनवादी लेखक संघ और झारखंड जन संस्कृति मंच के संयुक्त तत्वाधान में स्मृति सभा का आयोजन किया गया। जिसमें  प्रगतिशील व आदिवासी लेखक-बुद्धिजीवियों के अलावे उनके मजदूर आंदोलन के सहकर्मी भी शामिल हुए। सफदर हाशमी सभागार में आयोजित स्मृति – सभा की शुरुआत रमणिका जी को मौन श्रद्धांजलि देकर की गयी। 

अध्यक्षता करते हुए रमणिका जी के देशज साहित्यिक सहकर्मी रहे तथा जाने माने वरिष्ठ आदिवासी लेखक महादेव टोप्पो ने रमणिका जी को देश के साहित्यिक जगत में महिला के साथ साथ विशेषकर आदिवासी और दलित विमर्श को प्रमुखता से स्थापित कराने का श्रेय दिया। आदिवासी विमर्श व उसके लेखन को सामने लाने के अभियानों की सहभागिता की चर्चा करते हुए उन्हें व्यापक हासिटी जगत में सर्वमान्य बताया। उनके साहसी व जीवटता के व्यक्तित्व को रखांकित करते हुए कहा कि वर्तमान पूंजीवादी आदमखोर विकास के खिलाफ युद्धरत आदिवासी और आम आदमी के संघर्ष को साहित्यिक तेवर देने में वे सदैव प्रेरणा की ‘लाइट हाउस’ बनी रहेंगी। नए आदिवासी लेखक प्रतिभाओं  को जानने – समझने व तराशने में उनका अविस्मरणीय योगदान हमेशा याद रखा जाएगा।  

प्रगतिशील लेखक संघ के प्रदेश सचिव प्रो. मिथिलेश ने रमणिका जी को अखिल भारतीय स्तर पर  आदिवासी समाज व साहित्य के साथ साथ उसके साहित्यकारों से व्यापक परिचय कराने वाला प्रमुख साहित्यकार बताते हुए कहा कि उन्होने अस्मितावाद के संघर्ष को एक प्रगतिशील दिशा और तेवर देने का काम किया। 

वरिष्ठ पत्रकार किसलय ने रमणिका जी से जुड़े संस्मरण कि चर्चा करते हुए बताया कि वे हमेशा नए लिखनेवालों को वे सदैव आत्मीय प्रोत्साहन देतीं थीं। उनसे मैंने झारखंड और झारखंडीयत को समझने की प्रेरणा पायी। युवा पत्रकार विनयभूषण ने आज की जटिल और चुनौतीपूर्ण हालात में ‘अंदर की आंच बुझे नहीं’ के लिए रमणिका जी जैसी बहुआयामी संघर्षशील साहित्यिक व्यक्तित्व से प्रेरणा लेने पर ज़ोर दिया। 

कार्यक्रम का संचालन करते हुए अनिल अंशुमन ने रमणिका जी के निधन को देश के वामपंथी व जन सांस्कृतिक धारा के लिए आपूरणीय क्षति बताते हुए कहा कि रमणिका जी ने अविस्मरणीय रूप से हिन्दी सहित्य में आदिवासी – दलित और महिला के स्वायत्त अस्मिता के सांस्कृतिक स्वर को मुखरता के साथ स्थापित कर उन्हें संगठित स्वर देने में महत्वपूर्ण सेतु की भूमिका निभाई। जिन्होने ” बीच का रास्ता ” कभी नहीं अपनाया। 

रमणिका जी के कोयला मजदूरों के आंदोलन के समय के सहकर्मी रहे सीपीएम के कॉ. सुजीत सिन्हा ने विस्तार से रमणिका जी के मज़दूर आंदोलनों और वामपंथी राजनीतिक यात्रा की चर्चा करते हुए कहा कि उनके जीवंत लेखकीय साहित्य का आधार ही था इन आंदोलनों में उनकी अगुवा भागीदारी। जिसमें उनपर् कई बार हमले भी हुए थे। 

जलेस की रेणु प्रकाश ने कहा कि रमणिका जी ने व्यावहारिक जीवन की सक्रियताओं से लेकर समग्र साहित्यिक जीवन में नारी की स्वायत्त अस्मिता को सर्वोच्च सम्मान दिया। एआईपीएफ के बशीर अहमद ने उन्हें ज़मीन से जुड़ा और जन संघर्षों का ईमानदार साहित्यिक व्यक्तित्व बताया। स्मृति सभा को जलेस के वरिष्ठ साहित्यकार ओमप्रकाश वर्णवाल, एडवा नेता विना लिंडा, एआईपीएफ के नदीम खान, मिथिलेश अकेला, SFI के युवा नेता संजय, अविनाश समेत कई अन्य वक्ताओं ने भी रमणिका जी से जुड़े संस्मरणों, उनके संघर्षशील लेखकीय व्यक्तित्व की चर्चा की।  

धन्यवाद ज्ञापन करते हुए जलेस के वरिष्ठ साहित्यकार एम ज़ेड खान ने रमणिका जी को देश की प्रगतिशील सांस्कृतिक धारा का अगुआ होने के साथ साथ आदिवासी व दलित विमर्श को प्रमुखता से स्थापित करनेवाला सामाजिक तौर पर आंदोलनकारी साहित्यकार बताया। जिन्होने संप्रदायिकता के खिलाफ संघर्षों को सदैव गति दी। इस दौरान वरिष्ठ  वामपंथी छात्र नेता चंद्रशेखर के शहादत दिवस पर संकल्प श्रद्धांजलि के साथ सभा का समापन किया गया।  

दूसरी ओर कांटा टोली स्थित ऑडी शो रुम के पीछे अभिलाषा अपार्टमेंट में सामाजिक सरोकारों से जुड़े संगठन बिरसा, अखिल भारतीय आदिवासी मंच एवं सफदर के तहत आदिवासी दलित स्त्री विमर्श की महत्वपूर्ण पैरोकार स्वर्गीय रमणिका गुप्ता की स्मृति में काव्य पाठ का आयोजन किया गया, जिसके शहर के महत्वपूर्ण रचनाकारों ने भाग लिया तथा अपनी कविताओं के माध्यम से उन्हें श्रद्धांजलि दी। काव्यपाठ की अध्यक्षता करते हुए साहित्यकार डा. माया प्रसाद ने कहा कि रमणिका गुप्ता के साथ उनका 40 बरसों का संबंध रहा, जिसे भूला पाना उनके लिए संभव नहीं।

श्रद्धांजलि देनेवालों में अरुण नागेशिया, तीर्थ नाथ आकाश, राजीव चोपड़ा, नीरज कुमार नीर, वीणा श्रीवास्तव, डा. सुरेन्द्र कौर, नीलम, रेणु त्रिवेदी मिश्रा, डोली कुजारा टॉक, रश्मि शर्मा, सोनल चोपड़ा, नेहाल हुसैन सैरयावी, दिलशाद निजामी, गिरधारी राम गौंझू, प्रकाश देवकुलिस, डा. हरि उरांव, डा. दमयन्ती सिंह, महादेव टोप्पो, डा. दुष्यंत सिंह, प्रभाकर तिर्की, पुनीत मिंज, आलोका कुजूर,  उमेश नाजिर, रतन तिर्की, डा. वासवी कीड़ो, राहुल उरांव, अजय कच्छप, डा. मीता भाटिया, शिशिर सोमवंशी के नाम प्रमुख रुप से भाग लिया।

Krishna Bihari Mishra

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