लो कर लो बात, ढोल पीटवा दीजिये, लालू प्रसाद फिर राजद के राष्ट्रीय अध्यक्ष होंगे

आज सुबह-सुबह दानापुर पहुंचा। कई अखबारों पर नजर पड़ी। अखबारों में तो ऐसे कई समाचार थे, पर इनमें से ज्यादा आश्चर्य करनेवाला समाचार था – लालू की पॉकेट में रहने वाली राष्ट्रीय जनता दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद पर लालू का निर्विरोध चुने जाने की खबर। आश्चर्य इसलिए कि लालू प्रसाद यादव को अखबारों ने इस प्रकार से पेश किया था, जैसे राष्ट्रीय जनता दल कोई सिद्धांतवादियों का समूह हो, जो सिद्धांतों के आधार पर चलकर राष्ट्रीय या प्रदेश अध्यक्ष पद पर किसी व्यक्ति को स्थापित करता हो। जैसे की वामपंथी पार्टियां और भारतीय जनता पार्टी, जहां कौन राष्ट्रीय अध्यक्ष बनेगा, किसी को पता नहीं रहता, पार्टी फैसला लेती है और जिनको पद संभालना होता है, वे पद संभाल लेते हैं।

राष्ट्रीय जनता दल का क्या कहना, अरे लालू प्रसाद यादव जब तक जिंदा रहेंगे, वे ही इसके निंबंधित राष्ट्रीय अध्यक्ष होंगे। उनके बाद उनकी पत्नी या उनके बेटे या बेटियां या बहुएं होंगी, दूसरा कौन होगा? और किसकी हिम्मत हैं, जो राजद के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद पर बैठने कि हिमाकत कर सकें। रही बात प्रदेश अध्यक्ष की तो इसमें पिछड़ा का मतलब क्या होता है?  जो इस दल में हैं, सभी जानते हैं, प्राथमिकता पिछड़ों में भी, यादव की होगी, बचे तो उसके बाद मुसलमान और उसके बाद कोई रामचंद्र पूर्वे जैसा परमभक्त हो, उसे वो पद मिल जायेगा। तो ऐसे में ये आश्चर्य करानेवाली बात क्या है?  कि अखबारों ने लिख दिया कि  राष्ट्रीय अध्यक्ष पद पर लालू का निर्विरोध चुना जाना तय। ठीक उसी प्रकार कांग्रेस में अध्यक्ष कौन बनेगा, जाहिर हैं जो इंदिरा गांधी के खानदान से आयेंगे, जैसे सोनिया गांधी, राहुल गांधी, प्रियंका वाड्रा आदि। इसमें ज्यादा दिमाग लगाने की क्या बात है।

राजद नेता रघुवंश प्रसाद का ये बयान कि युद्ध के समय घोड़ा नहीं बदला जाता। तो मेरा मानना है कि आपका घोड़ा, आप बदले या नहीं बदलें, ये आपका परिक्षेत्र हैं। आप बीमार और कमजोर घोड़े के सहारे युद्ध जीतने की जो सोच रहे हैं, उसमें सफलता मिलेंगी या नहीं मिलेंगी वो तो समय बतायेगा, पर जो जानकार है, वे मानते हैं कि राजद का मतलब लालू, रावड़ी, तेज, तेजस्वी, मीसा और पता नहीं उनके घर में लोगों के क्या-क्या नाम हैं, नहीं जानता, इसके सिवा दूसरा कुछ नहीं होता, न ही रघुवंश होता हैं और न कोई अन्य। जो मूर्ख हैं, वे ही राजद का झंडा ढोते है, दूसरा कोई नहीं, राजद में सिद्धांत का अर्थ भी लालू ही होता हैं, ठीक वैसे ही जैसे कांग्रेस का मतलब सोनिया-राहुल। ऐसे में राजद के अंदर लोकतंत्र की बात करना, आम जनता की आंखों में धूल झोंकने के सिवा दूसरा कुछ नहीं।