नहीं रहे ललित मुर्मू, एक सच्चे पत्रकार, एक सच्चे झारखण्ड आंदोलनकारी के रुप में वे सदैव याद किये जायेंगे

आज मैं बहुत व्यथित हूं, इतना व्यथित पहले कभी नहीं रहा। सबेरे उठते ही रतन तिर्की के फेसबुक वॉल से खबर मिली, ललित मुर्मू नहीं रहे। एक ऐसा इन्सान, एक ऐसा पत्रकार, एक ऐसा राजनीतिक कार्यकर्ता, एक ऐसा सामाजिक कार्यकर्ता, जो उसूलों के लिए जिंदगी भर लड़ता रहा, पर कभी अपने उसूलों से समझौता नहीं किया। आज दुनिया में नहीं है। जीना क्या है? कोई ललित मुर्मू से सीखे, बेहद सरल जिंदगी और सब के लिए जीने की कला वे खूब जानते थे।

आज मैं बहुत व्यथित हूं, इतना व्यथित पहले कभी नहीं रहा। सबेरे उठते ही रतन तिर्की के फेसबुक वॉल से खबर मिली, ललित मुर्मू नहीं रहे। एक ऐसा इन्सान, एक ऐसा पत्रकार, एक ऐसा राजनीतिक कार्यकर्ता, एक ऐसा सामाजिक कार्यकर्ता, जो उसूलों के लिए जिंदगी भर लड़ता रहा, पर कभी अपने उसूलों से समझौता नहीं किया। आज दुनिया में नहीं है। जीना क्या है? कोई ललित मुर्मू से सीखे, बेहद सरल जिंदगी और सब के लिए जीने की कला वे खूब जानते थे।

हमारी दोस्ती उनसे तब हुई, जब वे फेसबुक में हमारे द्वारा लिखी जा रही समाचारों को पढ़कर, हमारे सम्पर्क में आये और अचानक रातू रोड के पास, उन्होंने स्वयं मुझे आवाज दी, आप यहां, आप कृष्ण बिहारी मिश्र है , आपको मैं फेसबुक पर खुब पढ़ता हूं, बहुत अच्छा लिखते हैं, और उसके बाद से जो उनसे मित्रता का रिश्ता बना, आज उनके नहीं रहने से टूट गया। उनसे हमारी अंतिम मुलाकात, हमारे घर पर, छह दिन पहले  4 मार्च को हुई थी, ढेर सारी बातें पर, हमें क्या मालूम कि वो इतनी जल्दी हम सभी को छोड़कर चल देंगे, पर सच्चाई तो यहीं है। आज पूरा झारखण्ड ललित मुर्मू के नहीं रहने पर आंसू बहा रहा है, झारखण्ड आंदोलनकारी के रुप में उन्हें भला कौन भूला सकता है?

भाजपा प्रवक्ता प्रवीण प्रभाकर के शब्दों में विश्वास नहीं होता, ललित मुर्मू नहीं रहा। झारखण्ड आंदोलन का एक निश्छल, निस्वार्थ साथी ही नहीं, बल्कि एक अभिन्न मित्र चला गया। हमें स्तब्ध और निःशब्द कर गया ललित, उफ्फ। परसो ही बात हुई थी, बोला कि दिल्ली जा रहा हूं, आकर साथ बैठुंगा, एक सप्ताह पहले हम दोनों साथ ही थे दिनभर। आजसू के आंदोलन  के दिनों से ही हम साथ रहे, साथ घूमे और साथ ही फाकामस्ती किया, फिर साथ में आंदोलन की पत्रिका झारखण्ड खबर निकाली, जिसमें झामुमो रिश्वतकांड पर ललित की लिखी खबर पर हम दोनों के विरुद्ध झामुमो ने लोकसभा में विशेषाधिकार  हनन का मामला चलाया। बाद में वह कांग्रेस और मैं भाजपा, फिर भी प्रगाढ़ मित्रता पर कोई आंच नहीं आई, लेकिन इस तरह हमें छोड़ जायेगा, इस दगाबाजी के लिए उसे माफ नहीं कर सकता।

अनिल अंशुमन के शब्दों में बहुत ही दुखद, झारखण्ड के चन्द व्यापक बौद्धिक दृष्टि वाले एक्टिविस्ट प्रोजेक्ट जुगाड़ एक्टिविज्म से दूर रहनेवाले, सब के सहयोगी साथी ललित मुर्मू जी का आकस्मिक निधन, हम सब और झारखण्ड के लिए गहरी क्षति है।

रतन तिर्की और थियोडोर किरो के साथ दिल्ली की यात्रा पर निकले, ललित मुर्मू के साथ कल  राजधानी एक्सप्रेस में हुई घटना का बड़ा ही मार्मिक चित्रण रतन तिर्की ने किया है जो इस प्रकार है, जिसे हमने उनके फेसबुक वॉल से लिया है हमारे संघर्ष का साथी ललित मुर्मू नहीं रहा। दिल्ली जाने के क्रम में इलाहाबाद कानपुर के बीच में आज सुबह हृदयाघात से चल बसा। ललित, पूर्व विधायक थियोडोर किरो, वारिस कुरैशी, सौनू लकड़ा और मैं कल दिनांक 9 मार्च 2019 को राजधानी रेल से दिल्ली के लिए निकले। सब कुछ ठीक था। हां ललित थोड़ा असहज था, पर बोला हम ठीक है, बैठे और चल दिये।

बता दूं कल तीन बजे शाम ही रांची स्टेशन पहुंच गया था और मुझे फोन कर कहा कि जल्दी आइये हम पहुंच गये है। गोमो में उसने पेट में गैस की बात कही और कहा थोड़ा दर्द हो रहा है। हमलोगों ने उसे लेट जाने की सलाह दी। वह लेट गया, पर गैस का दर्द बढ़ता गया और मध्य रात्रि में बहुत ही बढ़ गया। हम सभी बैठकर पीठकमर सहलाने लगे, फिर फतेहपुर पहुंचते ही हमने तीन बजे सुबह रेलवे इमरजेंसी 138 फोन से संपर्क किया। रेलवे ने कहा कानपुर में डाक्टर जायेंगे। हमने कहा कि तबीयत बिगड़ रही है। इलाहाबाद रुकना पड़ेगा। रेलवे ने कहा कि चार बज रहा है, पांच बजकर पैतालिस मिनट में आप कानपुर पहुंच जायेंगे और इलाहाबाद स्टोपेज नहीं है।

ललित को हमने बताया तो ललित ने कहा कि जल्दी दर्द बढ़ रहा है, इलाहाबाद से हमलोग काफी नजदीक यानी पैतालिस मिनट का समय लगता कानपुर पहुंचने में। पांच बजे ललित ने कहा कि रतन पानी दो, हम सभी ललित का हाथ पकड़े बैठे थे। सहला रहे थे। मेरी नजर बाहर कानपुर की जगमगाती बत्तियां ढूंढ रही थी और घड़ी पर नजर की कब पांच बजकर पैतालिस मिनट हो, पर ललित सह नहीं पाया और पांच बजकर पच्चीस में अचानक बात करते चुप हो गया।

हमलोगों ने सोचा ललित बेहोश हो गया, सीट पर लिटा दिया, ललितललित कहने लगे, मैं डर गया, बस कानपुर पहुंच गये। दो डाक्टर पहले से खड़े थे, अंदर बॉगी में आये, जांच किया और मुझे बाहर लाया और कहा थोड़ी देर पहले वो नहीं रहा। बस पन्द्रह मिनट पहले स्टेशन तक रुक जाता तो ललित हम सभी के बीच रहता।” 

ललित मुर्मू हम सब के बीच में नहीं हैं, पर उनकी मुस्कान, उनका संघर्ष, उनकी सोच सदैव हमारे साथ रहेगी, हम कभी उन्हें नहीं भूला पायेंगे, मैंने अपना सच्चा मित्र आज खो दिया, जिसका हमें जिंदगी भर मलाल रहेगा।

Krishna Bihari Mishra

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